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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

लडकियां बनाम समाज

बस खचाखच भरी थी और लोग जैसे तैसे अपने से ज्यादा अपने जेबों को संभाल रहे थे..
तभी निशा बस में चढ़ी क्योंकि उसे दूसरे बस के जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी..

एक नवयुवक ने नवयुवती को देखा तो झट खड़ा होने को आया..
और कहा - "आप बैठिये, मैं खड़ा हो जाता हूँ |"
निशा ने हाथों से इशारा करते हुआ कहा - "धन्यवाद, पर लड़कियां अब लड़कों की मोहताज नहीं है | आप ही बैठिये |"

लड़का शर्मसार हो गया और उसने अपना सर झुका लिया |
निशा ने अपना ही नहीं परन्तु देश की हर लड़की का सर ऊँचा कर दिया था |
आस-पास के लोग सोच में पड़ गए...

बस चलती रही...

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

कुछ अपने मन की

वो महफ़िल में आये,
और दिल-ए-महफ़िल को चुरा ले गए..
आलम ऐसा हुआ इस महफ़िल का,
हम पानी को शराब समझकर पी गए...



हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने..
हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने..
पर पूरी कायनात में कोई बेगाना ही ना मिला...



इन हसीनों के भंवर में ना पड़ बन्दे,
तू हो जाएगा कंगार..
फिर याद आएगा, पी.एम. ने कहा था..
जितनी लम्बी चादर..उतने ही पैर पसार..



हर इंसान को देख कर दिल कुढ़ा जा रहा है,
हर दिल दिन-दिन मरा जा रहा है..
और आप कहते हैं..
"तुम जियो हज़ारों साल-साल के दिन हों पचास हज़ार?"

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

घूसखोर भगवान

हमारी आदत ही हो गयी है.. जो नेता दिखे - घूसखोर है.. जो पुलिस वाला दिखा - घूसखोर है... जो सरकारी कर्मचारी दिखे - घूसखोर है..
माना की इन सब मामलों में हमारे तुक्के सत-प्रतिशत सही बैठते हैं.. पर कुछ दिनों पहले दुनिया का सबसे बड़ा घूसखोर खोजा मैंने..

हुआ यूँ की एक मंदिर गया था दोस्त के साथ.. काफी नामी मंदिर है.. वैसे तो मेरी मंदिरों से ज्यादा अपने कर्म में ही आस्था है पर यदा-कदा चला जाता हूँ हाजिरी लगाने जिससे भगवान को याद रहे की मैं अभी धरती पर हूँ और जिंदा हूँ..
तो जैसा की हर आम आदमी के साथ होता है, मैं भी आम जनता की तरह आम पंक्ति में खड़ा हो गया.. वही आम बातें चल रही थी की किसके पड़ोसी ने किस तरह सरे-आम कुछ आम लोगों के सामने कुछ हराम बातें कह दी.. वही आम बातें चल रही थी और मैं पूरे तन्मयता के साथ इन आम लोगों की आम बातों की मार एक आम इंसान की तरह झेल रहा था..बीच-बीच में गोपियाँ नज़र आती तो दोस्त से कहा.. वो बोलता "अरे मंदिर में आये हो.. कम से कम यहाँ तो कुछ लज्जा करो.." तो मैंने भी पलट कर जवाब दिया - "गुरु, अपने सखा का ही तो धाम है और फिर क्या उनकी १६००० सखियाँ नहीं थीं? किसी ने कुछ नहीं कहा.. और कौन सा मैं जिसे देख रहा हूँ, उसे सखी बना रहा हूँ.. देखने में कोई पाप थोड़े ही न लगता है.. कृष्ण धाम में हैं तो गोपियों को देखना कोई पाप नहीं!" मेरे जवाब से मेरा दोस्त लाजवाब और अब उसकी शंका भी समाप्त.. खैर जहाँ इतनी भीड़ हो वहां समय कट ही जाता है समझ लीजिये..

कुछ आधे-पौन घंटे बाद अन्दर प्रवेश हुए... क्या ज़माना है.. भगवान को अपनी और हमारी रक्षा के लिए मेटल डिटेक्टर की ज़रूरत पड़ने लगी है.. क्या कहें.. कलयुग आ गया है...
फिर अन्दर की पंक्ति में और १५ मिनट खड़े रहे.. ऐसा लग रहा था की वोटिंग करने आये हैं या किसी बड़े आदमी से मिलने आये हैं.. वरना भगवान से मिलना कौन बड़ी बात है? वो तो हर जगह है.. बस पुकारो मन से और दौड़ा चला आता है... (सब मनगढ़ंत बातें हैं.. कितनी बार बुलाया उसे एक्जाम हॉल में पर कभी नहीं आया.. शायद अजीबों-गरीब प्रशोनों को देख कर उसने प्रकट होना उचित नहीं समझा.. और मेरी माने तो अच्छा ही किया.. वरना डिप्रेशन के शिकार हो सकते थे हमारे भगवान)...

अब आलम ऐसा था की दो-तीन मंदिरों को मिलाकर एक मंदिर बना था.. और आपको हर मंदिर का दौरा करना था... बस बात इतनी सी थी की मुख्य-मंत्री को हवाई जहाज मिलती है और हमें "फ्लोट" चप्पल !!
पर जितनी देर मंत्री किसी बाढ़-ग्रस्त इलाके में रहता है.. बस उतनी ही देर हम भी वहीँ रहे.. कुछ सेकंड ही समझ लीजिये.. अन्दर पंडा बोल रहा था... "चलते रहो, चलते रहो" मानो रात का चौकीदार कह रहा हो - "जागते रहो, जागते रहो"... और मैं भी आम आदमी की तरह उनके आज्ञा का पालन करते हुए आगे बढ़ चला..
बाहर आया तो दोस्त ने कहा - "हाथ काहे नहीं जोड़े भगवान के सामने?"
हमने कहा - "कोई दिखता तो हाथ उठते ना !! जब भगवान तो छोड़ो.. मूर्ती भी नज़र नहीं आई तो ख़ाक हाथ जोड़ता... राजधानी की रफ़्तार से बाहर आ गए.."
जब हम प्रमुख मंदिर में पहुंचे तो वहां तो मेला ही लगा हुआ था... फिर वही भागम-भाग.. पंडा आगे खड़े कुछ लोगों को भगवान का नाम जपवा रहा था.. मैंने सोचा मुझे भी जपवा देते तो कम-स-कम कुछ महीनों का तो पाप धुल ही जाता... बेकार ही इतनी दूर आये.. पाप तो कमबख्त वहीँ का वहीँ है..

खैर सोचा अब निकलते हैं.. दर्शन तो हो ही गए (पता नहीं किसके दर्शन किये !!).. निकलने से पहले हम लोगों को पूरे आधे घंटे चक्कर लगाना पड़ा.. मंदिर के अन्दर बाज़ार खुला हुआ था.. धर्म-ग्रन्थ से लेकर खाने की चीज़ों से लेकर पहनने-ओढने की चीज़ें सब कुछ बिकाऊ थीं.. और वो भी मंदिर प्रांगण में.. दिल देख कर गद्द-गद्द हो उठा.. वाह भगवान आजकल तू भी व्यापर करने लगा है.. अपना पेट पालने के लिए..??

तभी मैंने अपने दोस्त से पूछा - "यार, कुछ लोग रस्सी के उस पार थे.. उनको कोई नहीं भगा रहा था.. आराम से दर्शन कर रहे थे.. और फिर उस पंडा ने भी वैसे ही कुछ लोगों को भगवान नाम रटवाया था.. ये क्या चक्कर है?"

उसने कहा - "देखो गुरु, यहाँ अन्दर घुसने से पहले एक टिकट खरीदना पड़ता है..पैसे दे कर... जिससे आप भगवान को करीब से और अच्छे से जान सको.. तो अगर वो टिकेट खरीदे होते तो आज आम आदमी की ज़िन्दगी नहीं जी रहे होते... तो जिन लोगों ने पैसे देकर भगवान को खरीदा.. वही आम खा पाए.. हम आम लोग गुठलियाँ ही गिनते रह गए !!"

मैंने कहा - "लो कल्लो बात, इससे अच्छा तो मंदिर ना ही आओ... चलो ऐसी चीज़ें देख ली है तो मेरा विश्वास भी पक्का हो गया है.... मंदिरों में अब न जाऊंगा.. लोगों ने यहाँ के भगवान को भी घूसखोर बना दिया है.. जो घूस दे वही बड़ा..हाँ?"
बस यही कहके निकल आये..
तो मेरा पहला विश्वास आज भी कायम है... भगवान मंदिरों में नहीं, दिलों में मिलता है.. अपने कर्मों में मिलता है... एक गाने के बोल याद आ गए (पूरे बोल नीचे दिए हुए लिंक में देखिये).. उसी से इस घूसखोर किस्से को ख़त्म करना चाहूँगा..

"... मंदिर तोड़ो, मस्जिद तोड़ो, इसमें नहीं मुज़ाका है,
दिल मत तोड़ो किसी का बन्दे, ये घर ख़ास खुदा का है..."



इस पोस्ट का गीत : झूमो रे (कैलाश खेर)

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

जिस दिन वीरों का जलसा निकला है

यह कविता २६/११ के नाम.. केवल लिखने के लिए नहीं..
कुछ करने के लिए भी..
आप भी आज ही से सिर्फ अपने बारे में ही न सोचकर उन लोगों के बारे में भी सोचिये जिनके पास आपकी सोच तक भी पहुँचने के सही मार्ग नहीं है...
साक्षरता देश और दुनिया दोनों का उद्धार कर सकता है...



नमन करता हूँ २६-११ के शूरवीरों को,
अपनी माँ का क़र्ज़ अदा किया है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

एक माचिस का डब्बा बन चूका था दिल,
उन नामुरादों ने चिंगारी भेंट में दिया है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

सफ़ेद कुरता पहन के निकले हो,
किसी के कफ़न का हिस्सा लग रहा है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

मोमबत्तियां जला कर, कर रहे हो क्या रोशन?
यहाँ हर एक दिल जला पड़ा है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

लिख रहे हो बढ़-चढ़ करके लेख इस दिन पर,
क्या लिखने से भी आतंकवाद मरा है?
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

दो मिनट मौन धारण की है सबने,
वो आतंकवादी जेल में सोये हुए आप पर हंस रहा है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

भगत सिंह हर किसी की मांग है,
क्या पड़ोस में कोई ऐसा नहीं जन्मा है?
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

शर्म से डूब मरने का कर रहा है दिल,
२२ सालों में देश के लिए कुछ नहीं किया है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

आज से कुछ करूंगा अपनी माँ के लिए,
ऐसा मैंने भी प्रण लिया है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...

आप भी कुछ करेंगे इस धरती के लिए,
बस मेरी दिल से यही दुआ है...
अरे यह शोक मनाने का दिन नहीं है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...
जिस दिन वीरों का जलसा निकला है...



एक ख़ास गीत इस पोस्ट के नाम : चंदा सूरज लाखों तारे (गुरुज़ ऑफ़ पीस) [ए.आर.रहमान/नुसरत फ़तेह अली खान]

आदाब.. सायोनारा..
जय हिंद !!

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

धर्म से कमाई या कमाई का धर्म?



बात चल रही थी कि फलाने मंदिर में लोग ६-७ घंटे भगवान के दर्शन [दर्शन क्या.. एक झलक ही समझ लीजिये] के लिए पंक्तियों में खड़े रहते हैं.. फिर ऊपर से खूब चढ़ावा भी होता है..
सुना था मंदिर वो जगह है जहाँ पूरे दिन का थका हुआ आदमी जाता है तो थकान मिट जाती है.. तन की भी नहीं पर मन की भी..
पर इसे क्या कहा जाएगा जिसमें लोग मन से तो पहले से ही थके हुए हैं और धर्म के लुटेरे उनके तन की शक्ति भी क्षीण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं..
मंदिर/मस्जिद/गिरजाघर/गुरुद्वारा/इत्यादि सब रूपए कमाने के साधन हो गए है..
बड़ी बेगैरत बात है कि जिसकी धुन में इंसान खोने की बात करता था, उसके नाम मात्र पर खुद ही करोड़ों रूपए भुन रहा है..

आज इंसान मंदिर शांति के लिए नहीं जाता है.. बस समाज के कुछ रीति-रिवाज़ मन पे बोझ बनाए हुए चला जाता है..
मैं मंदिर हर दिन नहीं जाता हूँ.. शास्त्र यह नहीं कहते की भगवान ने कहा है - मेरी इबादत हर दिन मंदिर जा कर करो.. इबादत तो तुम तब भी करोगे जब तुम अपने काम में मुझे ढूँढ लोगे..
भगवान को हमेशा याद रखने के लिए मंदिर में नहीं पर अपने मन में बसाना ज़रूरी है..

मैंने कई लोगों को जिनमें बहुत ज़िन्दगी में भी काफी करीब हैं देखा है,
हर दिन मंदिर जाते हैं सुबह-सुबह.. और दिन भर करोड़ों लोगों की बुराई करने में निकाल देते हैं..
हर मौसम की तीर्थ-यात्रा करते हैं और हर मौसम में अपने काले स्वभाव से करोड़ों लोगों से राड़ रखते हैं..
जोर-जोर से भगवान का भजन करते हैं और उतने ही जोर-जोर से अपने पड़ोसी से लड़ाई करने में पीछे नहीं रहते हैं...


सोचता हूँ की जो पुण्य वो सुबह-सुबह कमाते हैं.. दिन भर में खर्च कर देते हैं.. फिर ज़िन्दगी बैंक में क्या बचता हो जो स्वर्ग यात्रा में काम आये?
उनसे भले तो वो हैं जो भले ही हर रोज़ मंदिर न जाते हों पर लोगों की भलाई ज़रूर करते हैं..

सिर्फ मंदिर/मस्जिद का फेरा आपको ज़िन्दगी के फेरे से बाहर नहीं निकाल सकता..
आपका कर्म ही आपके कर्मठता का परिचय है..
आपका मन ही आपके मानवता का द्योता..
आपकी बोली ही आपकी बलवत्ता दर्शाता है और
आपकी दिनचर्या ही आपके दिन का अंत..


तो यह सीख उन लोगों के लिए जो भगवान को मंदिर और मस्जिद में देखते हैं..
"अल्लाह को मस्जिद, राम को मंदिर और ईसा को गिरजाघर में ढूँढना छोड़ दो.. बस यही कहूँगा..
एक दिन दिल से अपने दिल में झांकना, अगर वो न हुआ तो कहना.. मैं दुनिया छोड़ दूंगा.. "


मन की शान्ति अपने आप में ढूँढो क्योंकि दुनिया तो अशांत ही हो चला है..
पर सोचता हूँ अगर इसी तरह अगर हम धर्म के नाम पर लड़ते-कटते रहे तो इस दुनिया से शांत जगह भी कहीं न मिलेगी..

इस पोस्ट का गीत गुनगुनाइए : दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (किशोर कुमार)

तब तक के लिए..
खुदा हाफ़िज़..

रविवार, 15 नवंबर 2009

50-50

पिछले पोस्ट में नीरज त्रिखा ने जो कहा उससे तो बिलकुल सहमत हूँ और हाँ बात सिर्फ कह देने से समाप्त नहीं हो जाती, वरन उस पर अमल होना चाहिए, तभी कही हुई बात लाजवाब हो जाती है अन्यथा बेबात!

अब बारी इस पोस्ट की..




कुछ दिनों पहले मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठे बात कर रहा था कि अचानक किसी ने कहा - "सुनने में आया है कि शूकर इन्फ़्लुएन्ज़ा (स्वाइन फ्लू) भारत में अपने पाँव इसलिए नहीं पसार पाएगा क्योंकि भारतीय विटामिन युक्त और पौष्टिक खाने ने खुद एच १ एन १ विषाणु (वाइरस) के पाँव पसार दिए हैं | विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तुलना में दूसरी जगहों पर देखा जाय तो सर्दियों में यह अभी भी लोगों पर कहर बरपा रहा है जो कि भारत में नाम मात्र रह गया है |"

मेरे दिमाग में इस बात को लेकर दो विचार आये :

1.) अरे जनाब जहाँ भारत की अधिकतम जनता इतने बुरे हालातों में रहती है, वहां ऐसे विषाणु की औकात ही क्या है? लोग नाली में जन्म लेते हैं और वहीँ मर जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उस इंसान के साथ ही उस नाली में जन्मा वो मच्छर.. वहीँ जनमता है और वहीँ गंदगी में उसके प्राण उखड़ जाते हैं.. मैं तो कहता हूँ कि जिन लोगों को एक समय की रोटी मयस्सर नहीं होती है उनको वो पौष्टिक भोजन की कामना करना ठीक उसी सामान है जैसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लोगों को यह बताना की हिन्दी में भी शपथ लिया जा सकता है.. (ऐसा मैं नहीं, भारतीय संविधान कहता है..वैसे इस वाकये पर भी पूरी पोस्ट हो सकती है :) ).. इसके अलावा यह फ्लू तो बड़े लोगों का चक्कर है जो विश्व का चक्कर लगा-लगा कर आते हैं और इस चक्रव्यूह में बेचारे मासूमों को भी चकरा देते हैं | और यह बात भी साफ़ है कि जो पढ़-लिख कर बहुत कमा रहे हैं और कमाने से दूना खर्चा भी कर रहे हैं.. वो वाकई में एक तिनके के सहारे एक उफनते दरिया से बच सकते हैं.. क्योंकि उनकी जान तो घंटों कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे ही निकल जाती है.. बचता है सिर्फ हल्का सा हड्डी का ढांचा जिसे एक तिनका भी सहारा दे कर किनारे पहुंचा सकता है और "डूबते को तिनके का सहारा" वाली कहावत को चरितार्थ कर सकता है...

2.) दूसरी बात यह कि ये अजीबो-गरीब बीमारियाँ सब अमेरिका से ही क्यों पनपता है? (शूकर फ्लू मेक्सिको से ही फैला था जो की उत्तर अमेरिका में स्थित है) बड़ा अचरज होता है और दूसरे ही क्षण होठों पे मुस्कान सी आ जाती है.. अब वहां का रहन-सहन, खाना-पीना, बोल-चाल ऐसी ही है कि अमेरिका को "नए-नए बिमारियों का आविष्कारक" की उपाधि से सम्मानित करना चाहिए.. हमारे जो बुजुर्ग लोग हैं,.. कभी-कभी ऐसी बिमारियों के बारे में सुनते हैं तो डर रहता है - कहीं दिल का दौरा न पड़ जाय!
वहां का अधिकतम खाना सब "खाने के लिए तैयार" रहता है, पता नहीं कितने महीनों पहले पका हुआ खाना खा-खा कर लोग ज़िन्दगी चला (वो जीते नहीं हैं.. चलाते ही हैं) रहे हैं!  कईयों के तो खाने में कबाड़ खाना (जंक फ़ूड :) ) और दारु के अलावा कुछ होता ही नहीं है.. अब जब ज़हर ही अन्दर जा रहा है तो कोई अमृत का काम तो नहीं ही करेगा ना? और यही सब बुरी बातों का जिस प्रकार प्रचार-प्रसार किया जा रहा है उससे पूरे विश्व के लोग भ्रमित हो रहे हैं..
लोगों को यह खाना-पीना इतना पसंद आ रहा है कि अपने पसंद की मौत भी पाना नामुमकिन सा हो रहा है.. क्योंकि पता ही नहीं कब, कहाँ, कौन सी बीमारी उनकी ज़िन्दगी को पसंद करके ब्याह ले और सीधे कब्रिस्तान पहुँच के सु-दाग रात मनाएं!.. अफ़सोस है कि जिस तरह पूरा विश्व भ्रमित हो रहा है, उससे कम-स-कम भारत के बड़े शहर तो उसी गति से कब्जे में आ रहे हैं जिस तरह आजकल भाजपा के सभी नेता एक-दूसरे को तेजी से कुर्सी से नीचे धकेल रहे हैं! हमें भी आजकल तेज़ खाना (फास्ट फ़ूड) खाना तेज़ लोगों की ज़िन्दगी का एक अंग लगता है और हम उसी तेजी से अपने शरीर के तेज को ख़त्म कर रहे हैं...
फिर क्यों ना हम जैसे लोगों को ऐसे उटपटांग बीमारियाँ ग्रसित करे?

प्रश्न खुद हमने खड़े किये हैं जिसके जवाब खुद हमें ही ढूँढने होंगे..

तभी मैं सोच रहा हूँ..

पहले जब किसी की मौत 50 साल की उम्र में हो जाती थी तो लोग अचंभित हो कर कहते थे - "क्या? सिर्फ 50 साल का था? फूटी किस्मत की इतनी जल्दी अल्लाह को प्यारा हो गया! "
और आज से 20-25 साल (या उससे पहले ही शायद.. 5 घटा/बढ़ा लीजिये :)) बाद जब किसी की मौत 50 की उम्र में होगी, तो भी लोग अचंभित ज़रूर होंगे पर उनके कहने का तरीका और शब्द कुछ इस तरह बदल जाएँगे - "क्या? 50 साल जी गया? फुल किस्मत वाला था जो इतने साल तक अल्लाह को वो रास ना आया! "


तो जनाब आप इसी बात पर मंथन करते रहिये.. ऐसे उटपटांग बिमारियों से बचते रहिये (अच्छा खाइए.. पीजिये.. ओढ़िये).. साथ ही साथ लोगों को भी बचाइए.. पर मस्त रहिये..
"चंद लम्हों की जिंदगानी.. जियो जैसे हों उषाणु..
सस्ती ना हो मौत इतनी.. की ले जाय ऐसा विषाणु.."

इस पोस्ट का गाना गुनगुनाते जाइए :
छोड़ दे सारी दुनिया (लता मंगेशकर)

आदाब-ए-अर्ज़..

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

हिन्दी - ठंडा.. पर अंग्रेजी - कूल !!

आज यह लेख पढ़ रहा था.. तो सोचा कि चूँकि मैंने अपने पिछले पोस्ट में अब क्रियाशील होने की बात कही है तो उसे पूरा क्यों ना करुँ भला?

सबसे पहले ये बता दूं पिछले पोस्ट में मुझे यह टिप्पणी मिली.. उसका उत्तर दे देता हूँ..

जनाब 1 बात मेरे अन्दर घर कर गयी है.. जिसे मैं उतना नहीं मानता था पर अब मेरा भी इस पर सत-प्रतिशत विश्वास हो गया है | आपने कहा कि लड़कियों की बातें अगर मैं सुन लेता तो मुझे पोस्ट में लिखने के लिए और भी विषय मिल जाते |
बुजुर्ग जो भी कहते हैं वो उनके बुजुर्गियत का निचोड़ होता है और उन्होंने सच ही कहा है कि औरतों को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है (ये तो डॉन जैसा डायलॉग है :) ).. और यह बात को मैं गाँठ बांधकर चलता हूँ..
अगर आप कहते हैं कि उनके दुःख को समझकर मैं कुछ लिखूं तो मुझे तो बख्श ही दें.. उनके दुःख तो ऐसे बदलते हैं जैसे कोई लड़का अपनी गर्लफ्रेंड बदलता हो (इस बात पर आपको विश्वास करना ही होगा.. बड़े शहरों का तो खेल है ये) !! आज वो इसलिए दुखी हैं.. और कल किसी और के लिये.. बेचारा दुःख भी उनसे दुखी हो चुका है..
तो मैं बेहद खुश हूँ कि मैंने उनकी दुःख भरी बातें नहीं सुनी.. और ना ही लोगों को दुखी किया (अगर सुनकर पोस्ट कर देता तो कितने लोगों की बददुआएं लगती.. सोचिये !!).. तो यही मेरा उत्तर है..

अब इस पोस्ट के शीर्षक की बातें करूँ?
हिन्दी हमारी मातृभाषा होते हुए भी.. पता नहीं अन्दर 1 गाँठ सी पड़ी है.. लोगों को ये इतनी गिरी हुई भाषा क्यों लगती है? अंग्रेजी में कहें तो - "सो मिडिल क्लास टाइप".. जब तक जबान पे अंग्रेजी की खिट-पिट शुरू नहीं होती तो लोगों को ऐसा लगता है मानों कोई गंवार बक-बक कर रहा था..

आखिर ऐसी क्या बात है कि हिन्दी में बात करना हमारे लिए "कूल" नहीं होता है? ठीक है माना कि हम शुद्ध हिन्दी नहीं बोल सकते (अगर ऐसा हुआ तो भारत की आधी जनता आत्महत्या कर सकती हैं यह मेरा दावा है !!)..पर हिन्दी की दुर्गति (बोले तो वाट्ट) क्यों कर रहे हो महानुभावों? ऊपर वाले लिंक में जनाब ने कहा कि हमें कट्टर नहीं होना चाहिए.. हम ट्रेन को लौहपथगामी नहीं कह सकते.. ठीक है माना.. पर ऐसा कहने को कौन बोल रहा है? हम कट्टर तो नहीं है पर कम-स-कम साफ़ हिन्दी तो बोलो | हर 2 शब्दों के बाद जो अंग्रेजी अपना चेहरा सामने ले आती है उसका कारण यही है कि हम कट्टर नहीं हैं.. वरना पता चला कि हम तालिबानियों की तरह हो गए और 1 अंग्रेजी शब्द निकलते ही काम तमाम ! हा.. ऐसा तो हम कह ही नहीं रहे हैं |

भारत में मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आधी जनता को हिन्दी आती ही नहीं है.. और क-ख-ग वाली अक्षरावाली तो कम से कम 90% लोग पूरा सही बोल ही नहीं पाएँगे (और इसपर शर्म की बजाय गर्व से कहेंगे - "दैट इज सो मिडिल क्लास टाइप").. और अभी पूछो - "बेटा A-B-C बोलो.." तो वो दो साल का छुटकू सा बच्चा फर्र से बोल लेगा..
गलती उन लोगों की नहीं है जो हिन्दी बोलते, लिखते हैं और पूजते हैं.. गलती तो हम बच्चे के बचपन से ही करते हैं..

मैं तो कहता हूँ की A-B-C सिखाने से पहले उसे क-ख-ग सिखाया जाय.. देखें की वो आगे चलकर कम-स-कम साफ़ हिन्दी बोल पाता है कि नहीं..

हम शुरू से ही उस मासूम के आस-पास ऐसा परिवेश तैयार कर देते हैं जिससे उसमें हिन्दी के प्रति हीन भावना जागृत हो उठती है.. मैं जिन सामाजिक नेट्वर्किंग साइट्स में शामिल हूँ, उनमें से शायद 1 या 2 लोग ही हैं जिन्होंने हिन्दी उपन्यास पढ़े हों.. अंग्रेजी पढ़ना कोई बुरी बात नहीं है.. पर हिन्दी को भी उतनी ही प्राथमिकता देने की ज़रूरत है..

अंग्रेजी स्कूलों में अंग्रेजी पहली भाषा होती है विषय के तौर पर और हिन्दी दूसरी भाषा है.. क्या यह आश्चर्य और दुःख की बात नहीं है कि जिस राष्ट्र की मातृभाषा हिन्दी है, उसी राष्ट्र के 50 से ज्यादा प्रतिशत स्कूलों की पहली भाषा हिन्दी नहीं है? !
सरकारी स्कूलों के बारे में मुझे सही-सही मालूमात नहीं है पर वही भेड़-चाल हर जगह अपने पैर घर कर चुकी है.. वहां भी हिन्दी से ज्यादा अंग्रेजी का ही बोलबाला है..

*इस पोस्ट में 1 ऐसी बात है जो मैं अंत में आप सबके सामने रखूँगा और आपको वह पढ़कर बिलकुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि सच आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं वरन आँखें खोलने के लिए होती है..

साथ ही साथ दुःख की बात यह है कि बिट्स पिलानी जैसे श्रेष्ठतम कॉलेज में भी हिन्दी लिखने वाले बहुत कम है.. और जहाँ तक मेरी जानकारी है, कैम्पस के जिन्दा(जो कम-स-कम महीने में एक बार अद्यतन होते हैं) हिन्दी ब्लॉग में केवल 1 या 2 लोगों का ही नाम आ सकता है..

तो यह तो हिन्दी का दुर्भाग्य ही है कि राष्ट्र भाषा होते हुए भी सड़कों के आवारा पशुओं की भाँती उसे देखा, सुना जाता है..
पर इसमें उसकी भी क्या गलती है.. गलती तो हम जैसे "सो कॉल्ड" यूथ की है जिन्हें हिन्दी बोलना/लिखना ठंडा पर अंग्रेजी बोलना/लिखना उतना ही कूल लगता है !!

तो ना ही हम कभी कट्टर रहे और न ही कभी रहेंगे और शायद यही 1 बिंदु है जो हिन्दी की दुर्गति को कभी रोक नहीं पाएगा.. अब फैसला तो आप पर है.. क्या कट्टर हो कर हिन्दी को बचाएं? या नर्म रह कर हिंगलिश को बढ़ावा दें?
तो आप इस कट्टर प्रश्न पर मंथन करते रहिये और हम इस विराट सागर में एक बूँद पानी का योगदान ऐसे छोटे-छोटे लेखों से करते रहेंगे..

जाते जाते एक किस्सा सुनाना चाहता हूँ :
आशुतोष राणा जो कि हिन्दी फिल्म जगत के जाने-माने कलाकार हैं, 1 बार किसी विदेशी से भारत में मिले..
विदेशी : How are you?
आशुतोषजी : मैं बढ़िया हूँ.. और आप?
(किसी ने अंग्रेजी में बताया कि वो क्या कह रहे हैं..)
इस पर उस विदेशी को बड़ी हैरत हुई की इन्होने हिन्दी में जवाब क्यों दिया...पर कुछ पूछा नहीं..

कुछ महीनों बाद आशुतोषजी उसी विदेशी के शहर पहुंचे..
इस बार :
विदेशी : आप कैसे हैं? (उसने हिन्दी ख़ास आशुतोषजी के लिए सीखी थी !!)
आशुतोषजी : I am doing fine. What about you? क्यों अचंभित हुए कि मैंने इस बार भी उल्टे भाषा में जवाब क्यों दिया? बताता हूँ : पिछली बार जिस तरह आपने अपनी भाषा का सम्मान किया, उसी प्रकार मैंने भी अपनी भाषा का सम्मान किया और इस बार जिस तरह आपने मेरी भाषा का सम्मान किया, ठीक उसी तरह मैं भी आपकी भाषा का सम्मान करता हूँ..

तो ऐसे लोग भी हैं जो कट्टर न होते हुए भी लोगों को जीत लेते हैं... ऐसे लोगों को हमेशा नमन..

हाल फिलहाल प्रेमचंदजी की गोदान और गबन पढ़ी.. अन्दर से हिल गया बिलकुल...
वो आदमी को अन्दर से प्रस्तुत करते हैं और ऐसा लगता है मानों पूरे समय कोई फिल्म चल रही हो ठीक आपके सामने..
ऐसे लेखक को सौ बार नमन है..

*इस पोस्ट की ख़ास बात : मैंने सभी अंकों को अंग्रेजी में ही रख छोडा है क्योंकि मुझे पूर्ण भरोसा है कि १,२,3,४,५,६,७,८,९.. यह भी भारतीय जनता के लिए याद रख पाना समुद्र में से मोती ढूँढ निकालने के बराबर का काम है.. :)

इस पोस्ट का गाना पढ़ते जाइये :
ब्रेथलेस (बेदम.. अगर मैं कट्टर हो जाऊं तो :) )
शंकर महादेवन का एक बेहतरीन गाना..

आदाब.. खुदा हाफिज़..

बुधवार, 4 नवंबर 2009

बेवकूफ लड़कियां..नींद की कड़कियां

लग रहा है कि बहुत सालों बाद इस ब्लॉग पर कुछ डाल रहा हूँ.
वैसे मेरा ही लफ्जों का खेल वाला ब्लॉग तो हमेशा ही अद्यतन होता रहता है..
और कल ही यहाँ पर भी कुछ डाला है..
पर मेरा खुद का ब्लॉग ही सूना पड़ा है..

तो आज इसका रुदन दिल तक पहुंचा और मैं आ गया फिर से ब्लॉग पर थोड़ा क्रियाशील होने..

वैसे आप सबको बता दूं कि एक पोस्ट तो मैं काफी दिनों से लिख रहा हूँ पर यहाँ छप नहीं पा रहा है क्योंकि विषय ही कुछ ऐसा है जिसपर सोच समझ के ना लिखा जाय तो जूतियाँ पड़ सकती हैं..

खैर आज मैं अपना एक निजी अनुभव आपके साथ बांटना चाहता हूँ और आपकी राय भी सुनना चाहता हूँ...
तो आशा करता हूँ कि आप इतने दिनों बाद भी इस नाचीज़ को ना भूले होंगे..

कुछ दिनों पहले यात्रा करने का मौका मिला और सफ़र करने का आनंद जो ट्रेन में है वो कहीं और हो.. ऐसा हो ही नहीं सकता..
और फिर किस्मत देखिये.. सफ़र लम्बा हो तो हमसफ़र भी अच्छा चाहिए.. 
घर से तो अकेला ही निकला था पर अपनी सीट पर जा कर देखता हूँ तो हमारे कम्पार्टमेंट को छोड़कर पूरे डब्बे में किशोरियां..
हमने सोचा.. लो भैया तुम तो एक हमसफ़र की तलाश में थे और यहाँ तो जमात है पूरा..

खैर जहाँ इतनी लडकियां हों वहां सब कुछ ठीक कहाँ हो सकता है?
तो अपने दिल के उछलने का सबब हमें नींद में ही मिल गया..

ऐसा लग रहा था मानों ये लड़कियां पहली बार ट्रेन में सफ़र कर रही हैं.. चूँकि ट्रेन रात को चली थी तो अपना काम था.. पैर पसारकर लम्बी वाली नींद लेना.. पर जनाब जहाँ बेवकूफों से भरा इतना बड़ा दल हो वहां मेरे जैसे लोग दलदल में फंसेंगे ही..
रात..(या यूँ कहें..बस पौ फटने ही वाला था) के करीबन ४ बजे.. खुसुरफुसुर की आवाज़ कानों के ज़रिये दिमाग में पहुंची और नींद को आंधी की तरह उड़ा ले गयी..
पास वाले कम्पार्टमेंट से जोर-जोर (अब समझ आया.. वो खुसुरफुसुर नहीं था !!) से ये मंदबुद्धि लड़कियां अपने घर-घराने की बातें कर रही थीं..

किसी की माँजी उनके पिताश्री से बड़ी हैं... तो किसी की बहन को उनसे प्यार नहीं है.. किसी लड़की ने आज ही किसी को आत्महत्या करने के कई नुस्खे सुझाए हैं... तो किसी को लम्बे बाल पसंद नहीं हैं (वहीँ मैं सोच रहा था.. लड़कियों की बातों में श्रृंगार कहाँ गुल हो गया? )..

मन तो कर रहा था कि इनको खरी-खोटी सुनाऊं.. अरे भाई तुम्हारे घर-बार में क्या हो रहा है.. वो अपने पास ही रखो ना.. यहाँ दुनिया पड़ी है नींद में.. उन्हें जगा-जगा के बताना काहे चाहती हैं? और अगर आपको आत्महत्या करनी ही है तो आप बिलकुल सही जगह हैं.. कहिये तो मैं दरवाज़ा खोल दूं?.. रात के.. माफ़ करियेगा.. सुबह के चार बजे आप फुल वॉल्यूम में अपना पिटारा काहे बजा रही हैं...

पर फिर मैं अच्छे बच्चे की तरह उठा और उनसे जा कर सिर्फ इतना ही पूछा - "क्या मुझे रुई के २ टुकड़े मिल सकते हैं? अपने कानों में ठूसने के लिए?"
मुझे यह कहता सुनते ही सब शांत.. सबको सांप सूंघ गया और मैं... सांप और उनको वहीँ छोड़कर अपनी बर्थ पर आकर फिर से लेट गया...


तभी मुझे विज्ञान पर बड़ा नाज़ हुआ और मैंने अपना mp3 प्लेयर निकाला और दोनों कान-चोगों (ईअरफ़ोन) को जितना अन्दर हो सके.. ठूंस दिया और फिर मस्त भरी नींद सोया..

पर आज भी सोचता हूँ तो ऐसी लड़कियों पर रोना आता है कि.. इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद उन्हें इतना बताना पड़े कि भैया..माफ़ कीजियेगा.. बहनों.. ये सार्वजनिक जगहों पर ध्वनि-विस्तारक (लाऊडस्पीकर) को थोड़ा शांत रखें और बाकी लोगों का शांति भंग ना करें..

खैर अंत भले का भला..
अगले दिन खूब मस्ती की और पूरा भ्रमण काफी अच्छा रहा..
जल्द ही आपके समक्ष उस पोस्ट के साथ आऊंगा जिसपर लिखते हुए दिल बैठा जा रहा है और वो कम्मकल पूरा भी नहीं हो रहा है...

तब तक आप इस पोस्ट का गाना :
आवारा हूँ (मुकेशजी का गाया हुआ और आवारा फिल्म से) यहाँ से पढ़िये..
और अपने टिप्पणियों से इस भूले-बिसरे ब्लॉग को आबाद करते जाइए..

तब तक के लिए..खुदा हाफिज़.. सायोनारा..

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

जय हिन्दी हो !!


तो जनाब हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हम वो थोड़े ही ना हैं जो हिन्दी केवल हिन्दी दिवस वाले दिन ही पढ़ते, लिखते या बोलते हैं... अब जब भारतीय फिरंगियों को (जिन्हें हिन्दी आती ही नहीं) रत्ती भर इस बात का गम नहीं है कि अपनी मातृभाषा ही नहीं आती है तो हम भी कम नहीं... हमें भी उतना ही गर्व है कि हिन्दी शान से बोलते, लिखते और पढ़ते भी हैं..
अब संयोग कि बात ही देख लीजिये.. कल हिन्दी दिवस गया और मैं अपनी ज़िन्दगी का पहला हिन्दी उपन्यास पढ़ रहा हूँ.. बस यह समझ लीजिये की एक-दो दिन में ख़तम ही होने वाली है..
आपको अचरज हो रहा होगा कि बालक पिछले साल भर से हिन्दी ब्लॉगिंग कर रहा है और आज तक इसने एक भी हिन्दी उपन्यास के पन्ने न झाड़े? अब इसे आप मेरे किस्मत के खाते में डालें या फिर मेरे आलस पर थोपें पर सत्य वचन तो यही है कि यह उपन्यास मेरी पहली है और मैं इसका ऐसा कायल हो गया हूँ कि अब तो हर हफ्ते एक न एक नया उपन्यास पढूं... पर देखिये कितना संभव हो पाता है..

रंगभूमि
प्रेमचंद जैसे महान लेखक और हिन्दी के उपासक की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही है.. मैंने अपने स्कूल के समय एक-दो कहानियां ज़रूर पढ़ी थीं और लोगों के मुख से इनके बारे में बहुत सुना भी था पर यह न पता था कि इनकी एक किताब मुझे इनका दीवाना बना देंगी..
रंगभूमि जीवन के हर वर्ग को अपनी आगोश में लेता है.. वह हर तरह के चेहरे को बेनकाब करता है.. वह हर तरह के भाव को अपने में समेटे हुए है..

जहां एक अँधा अपनी लड़ाई अकेले ही लड़ रहा है वहीं पर इज्ज़तदारों की नींद एक साथ ऐसी उडी हुई है मानो एक बालक किसी गबरू जवान को उठा कर पटक दे.. सूरदास अँधा है पर निर्बल नहीं.. वह शरीर और मन दोनों से पूरे गाँव का दिल जीते हुए है और शायद यह जीत अंत तक बनी रहेगी (अब मैंने भी पूरा पढ़ा नहीं है और आपको बता दूं तो रोमांच कहाँ रह जाएगा?)..

वहीँ दूसरी ओर गहन चिंतन और मनन करने वाले कुछ नौजवानों की अपनी अलग ही ज़िन्दगी चल रही है जिसे वो अपनी विस्तृत और संकीर्ण सोच से इसे खेल रहे हैं.. यहाँ मौत भी है और ज़िन्दगी भी.. यहाँ प्रेम भी है और नफरत भी.. यहाँ सम्मान भी है और तिरस्कार भी..
इनकी कहानी हम जैसे युवकों/युवतियों से ज्यादा जुड़ी हुई है.. इसलिए नहीं कि हमारे और इनके राह एक हैं पर इसलिए कि ये जैसा सोचते हैं वैसे ही हम भी करते हैं..

तो रंगभूमि मेरे मन को इस तरह रंग चूका है कि छूटे ना छूटे.. जहाँ ज़िन्दगी के हर रंग को प्रेमचंद ने अपनी कलम से इतने गहरे और सुव्यवस्थित तरीके से सराबोर किया है.. मानिए मेरी.. अगर आप भी न रंगे तो यह पोस्ट ही मिथ्या समझियेगा..

जितना प्रेमचंद के बारे में सुना था आज बोल भी रहा हूँ.. और आशा करता हूँ कि उनके द्वारा रचित और भी लेख/उपन्यास मेरी आँखों तले गुजरेंगे और मैं उसका रसपान करने में सफल रहूँगा..

यह हिन्दी दिवस प्रेमचंद को समर्पित और हर उस रचना को, जिसने हिन्दी को और भी सशक्त और उच्च भाषा का ओहदा प्रदान किया है..

जय हिन्दी हो !!
जय हिन्दी ब्लॉगर्स की !!

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

YSR - जीवित या मृत ?

 
श्रद्धांजलि और नमन
पोस्ट का शीर्षक पढ़कर चौंकिए मत..
मैं कोई जासूसी भरी पोस्ट नहीं कर रहा हूँ.. क्योंकि जासूसी आती नहीं और कोशिश की थी तो मुंह की खानी पड़ी थी (पूछियेगा मत किस तरह की जासूसी)

पिछले हफ्ते बहुत हल्ला हुआ.. हर जगह, हर टीवी चैनल, हर अख़बार बस एक ही बात उगल रहे थे.. वाई॰एस॰आर॰ कहाँ हैं? आखिर उनका उड़नखटोला कहाँ गया? और एक दिन बाद ही यह दुखद समाचार पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गयी कि एक महान राजनीतिज्ञ की अकस्मात मृत्यु हो गयी है..

मैंने भी इस खबर को अच्छी तरह से अनुसरण किया था और इस सिलसिले में ऑफिस के लोग भी शामिल थे..
जो लोग यहाँ आंध्र से हैं, उनसे जब पूछा कि आपको दुःख है? क्या आप वाई॰एस॰आर॰ को बहुत मानते थे? तो जवाब ५०-५० था.. कोई कहता कि वो सही में एक महान इंसान थे तो कोई कहता कि उन्हें लगता है कि वाई॰एस॰आर॰ दूसरे भ्रष्ट नेताओं की श्रेणी में आते थे (माफ़ कीजियेगा.. मैं यहाँ अपनी राय नहीं दे रहा हूँ और न ही मैं किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूँ.. और मेरे ख्याल में वाई॰एस॰आर॰ बहुत ही उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ थे..)

जब घर आया तो वहां पर भी दोस्तों से भी यही बातचीत हुई..
पता नहीं कितने लोगों ने गौर किया कि नहीं.. पर न्यूज़ में इस देहांत के साथ-साथ यह भी बताया जा रहा था कि आंध्रप्रदेश में एक दिन के लिए सभी स्कूल, बैंक, सरकारी दफ्तर और अन्य सभी दफ्तर बंद रहेंगे..
अब मेरा प्रश्न ये है - क्या एक महान आत्मा के इस संसार के चले जाने पर हम अपनी सहानुभूति एक दिन काम न करके दिखाना चाहते हैं? माना कि शोक सबको है..(आजकल तो एक कुत्ता भी मर जाता है तो पूरा परिवार महीने भर के शोक में चला जाता है.. वो बात अलग है कि सामने बैठा भिखारी अगर भूख या ठण्ड से मर जाए तो वही लोगों के कान में जूं तक न रेंगेगी).. 

पर शोक का मतलब यह है क्या कि एक दिन हम काम नहीं करेंगे पर सिर्फ रोएंगे? एक कर्मठ इंसान की मृत्यु पर ऐसा होना ही उस इंसान की कर्मठता को नकारता हुआ नज़र आता है.. बहुत दुःख की बात है कि राजनीति अपने पाँव किसी के मृत्यु पर भी पसार लेती है.. पता नहीं इस एक दिन में पूरे देश को कितने करोड़ रुपयों का नुक्सान होगा.. पता नहीं कितने उस दिन भूखे पेट सोएंगे.. पता नहीं कितने बच्चे उस एक दिन की पढ़ाई से वंचित रह जाएँगे.. और पता नहीं हम अनजाने में ही उस महान आत्मा की प्रतिष्ठा में कितने छेद करेंगे..
जो इंसान हर दिन जी-जान से राज्य को और साथ-साथ देश को आगे बढाने में लगा हुआ था, आज उसी के निधन पर देश कितना पीछे हो जाएगा..
बात बड़ी मामूली सी लगती है पर अगर हम सच्चे दिल से उस शख्स को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो उस दिन हमें एक संकल्प लेना चाहिए था कि
आज से हम एक..सिर्फ एक अच्छा काम अपनी ज़िन्दगी में करेंगे...
आज हम अपने अन्दर से एक बुराई को मिटा देंगे..
आज से हम सिर्फ एक ही सही... पर बुराई के खिलाफ लड़ेंगे..
पर नहीं यह कोई नहीं कर सका.. करोडों के लिए वो एक दिन सिर्फ छुट्टी मात्र थी.. और मेरी मानिए... उनमें से हजारों को तो यह भी नहीं पता होगा कि छुट्टी क्यों मिली है या वाई॰एस॰आर॰ कौन थे? यह देश की विडम्बना ही समझिये या लोगों की मुर्खता पर मैं यह आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूँ - जब बंगलोर में स्वाइन फ्लू से कई लोगों की मौत हुई तो मैंने अपने ऑफिस में एक व्यक्ति के दूसरे से यह पूछते हुए सुना - "ये स्वाइन फ्लू क्या है?" मैं उस समय न तो हंस सका कि ऐसे लोग भी है.. और न ही रो सका कि आजकल के लोग कितनी छोटी सोच के होते जा रहे हैं..(ठीक जिस तरह कंप्यूटर हो रहा है.. एक अच्छा उदाहरण है)
और इसपर एक और बात.. आंध्र का एक स्थानीय चैनल वाई॰एस॰आर॰ की शैया का सीधा प्रसारण कर रहा था | लोगों की भीड़ उमड़ रही थी और लोग उनपर फूल मालाएं चढ़ा रहे थे.. तभी टीवी के परदे पर नीचे ही नीचे एक ऐड आया : उसमें यह पूछा जा रहा था - क्या आपको लगता है जगन (जो कि वाई॰एस॰आर॰ के पुत्र हैं) अगला मुख्यमंत्री बनेंगे? हाँ/ना में उत्तर xxxxxx नंबर पर एस.एम.एस करें |
यह देख कर तो मन जैसे फट सा गया हो.. मोबाइल कंपनियों के लिए तो यह देहांत भी पैसे बनाने का जरिया बन गयी है.
बहुत ही दुःख हुआ पर कर भी क्या सकते हैं?
नहीं..
हम बहुत कुछ कर सकते हैं..
उस दिन से मैंने प्रण लिया है कि अब हर पोस्ट के साथ एक ऐसा संकल्प लूँगा जो मुझे एक अच्छा इंसान बनेगा..
और इसी सिलसिले में मैं आज यह छोटा सा प्रण लेता हूँ :
आज से मैं अपने आसपास के इलाकों को गन्दा नहीं करूंगा.. मैं जहाँ-तहां चीज़ें फेंककर वातावरण को दूषित नहीं करूंगा |


है यह एक छोटा सा काम पर मुझे पता है.. कम से कम मेरी वजह से गन्दगी तो नहीं फैलेगी..
अगर आप भी इस छोटे से काम में मेरे साथ हैं तो मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है..
कहते हैं - एक-एक कतरा ही पहाड़ बनाता है..
तो क्या आप वो राई बनना चाहते हैं जो एक सदृढ़ और सशक्त "अच्छाई के पहाड़" को जन्म देगा ?
अगर आपका उत्तर हाँ है तो स्वागत है..और आप दूसरे लोगों को भी इसमें शामिल करें..
और अगर ना है तो...फिर कभी.. वो कहते हैं ना..ये ज़िन्दगी बहुत लम्बी है - जब तक वाई॰एस॰आर॰ की तरह मौत अचानक से बुलावा न दे तब तक..
तो आप ज़िन्दगी और मौत से खेलते रहिये.. तब तक मैं समाज सुधार में थोड़ा हाथ बढ़ाता हूँ..
और आप यूँ ही मंथन करते रहिये.. क्या वाई॰एस॰आर॰ की मृत्यु हो गयी है? या वो आज भी अपने अच्छे काम से हम सभी के बीच जीवित हैं और हम सभी को प्रेरणा दे रहे हैं?

तब तक के लिए खुदा हाफिज़.. नमस्कार..


इस पोस्ट का गाना : अनजानी राहों में तू क्या ढूंढता फिरे (लकी अली)
गानों के बोल आप यहाँ देख सकते हैं..

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

हिंगलिश को भूल जाइए

आज एक तकनीकी पोस्ट कर रहा हूँ..

वैसे तो बहुत दिन हुए ढंग से ब्लॉगिंग किये हुए पर देर आये दुरुस्त आये..
दिमाग में बहुत हलचल मची हुई है और मन कुड़-बुड़ कुड़-बुड़ कर रहा है... तो जनाब अपना धैर्य ठीक उसी तरह बनाए रखिये जैसे हमने राखी का स्वयंवर देखते हुए रखा था..

दरअसल यह पोस्ट उन लोगों के लिए है जिन्हें किसी भी हिंगलिश में लिखे पोस्ट को पूरी तरह से हिन्दी में बदलना है और वो भी ज्यादा से ज्यादा 5 सेकंड में..

बात को थोड़ा और स्पष्ट करता हूँ..
मान लीजिये मैंने कुछ ऐसा लिखा है :

aaj ek takniki post kar raha hoon..
waise to bahut din hue dhang se blogging kiye hue par der aaye durust aaye..
dimaag mein bahut halchal machi hui hai aur man kud-bud kud-bud kar raha hai to janab apna dhairya theek usi tarah banaae rakhiye jaise humne rakhi ka swayamvar dekhte hue rakha tha..

हिन्दी पर पूरी तरह से अंग्रेजी में..
अब मुझे लगा की शायद यह हिन्दी में हो तो बेहतर लगेगा..
पर अगर आप गूगल इंडिक ट्रांसलिटरेशन का इस्तेमाल करेंगे तो हर शब्द के बाद स्पेस दे दे कर थक जाएंगे और हार कर छोड़ देंगे..

कुछ महीनों पहले मैंने अपने Gtalk पर एक ईमेल ID को जोड़ा था और कुछ ही दिनों में मुझे ये मिला..

आप पहले : en2hi.translit@bot.talk.google.com अपने Gtalk पर जोड़िये..
उसके बाद आपको जैसे हम Gtalk पर अपने दोस्तों से बातें करते हैं, बिलकुल वैसे ही इससे भी बात करनी है.. फर्क इतना कि जो आप अंग्रेजी में लिख कर इसको देंगे, उसे यह हिन्दी में बदल कर वापस लौटाएगा...

तो यह बॉट ऊपर लिखे परिच्छेद को कुछ ऐसे बदलेगा :

तो अगर आप 10 पन्ने अंग्रेजी में लिख चुके हैं तो गूगल इंडिक पे जा कर स्पेस से टुकुर टुकुर ना करियेगा..
बस पूरे पोस्ट को कॉपी-पेस्ट कर दीजिये इस बॉट के सामने॥

और यह करीबन कुछ सेकंड (आपके लेख की लम्बाई पर निर्भर है की यह कितना समय लेगा और अगर आपका लेख काफी बड़ा है तो उसे कुछ हिस्सों में तोड़ कर बदलें) बाद ही आपको पूरी कहानी हिन्दी में दे देगा..

पर पर पर..
चीज़ें इतनी आसान नहीं हैं..
यह परिवर्तन तो कर देता है पर इसमें कुछ खामियां हैं (जैसे सही तब्दीली ना हो पाना), जहाँ गूगल इंडिक आपके काम आएगा..
जो भी पोस्ट आपके सामने हिन्दी में है, उसे आप कॉपी-पेस्ट कर के गूगल इंडिक पर ले आइये और जो शब्द गलत परिवर्तित हुए हैं, उन्हें झट से यहाँ बदल लीजिये..

इससे आपका बहुमूल्य समय काफी हद तक बच सकता है...

यह तरीका उन लोगों के बहुत काम का है
१.) जो हिन्दी प्रेस में हैं
२.) जो लम्बी टिप्पणी हिंगलिश में लिखने के बाद हिन्दी में पोस्ट करना चाहते हैं
३.) जो किसी हिंगलिश मेल को हिन्दी में बदल कर भेजना चाहते हैं...
इत्यादि इत्यादि..

यह पूरा पोस्ट मैंने नोटपैड में हिंगलिश में ही लिखा है और फिर उस बॉट ने मेरा पूरा काम किया है..

तो बताइयेगा कैसा लगा आपको यह तरीका..
अगले पोस्ट का इंतज़ार जितना आपको है उतना ही मुझको.. :P

पर एक बात और :
इस महीने का सर्वश्रेष्ठ गाना सुनना मत भूलियेगा : आओ जी (कैलाश खेर - कैलासा चांदन में)
गाने के बोल आप यहाँ पर देख सकते हैं...सुंदर बोल और उतनी ही खूबसूरत गाइकी...

सायोनारा !!

आदाब..

सोमवार, 17 अगस्त 2009

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

दिल में जोश भरे बढ़ रहे हैं
हम मतवाले लक्ष्य की ओर..
देखो ज़रा संभल के चलना
कोई काटे न यह एकता की डोर..

अपने साथ-साथ इस देश को भी
सुन्दर और भव्य बनाना है..
हर बुराई को दूसरों से पहले
खुद में से मिटाना है..

जब ज़हन में हर वक़्त रहेगी
स्वच्छता की बात..
तो स्वतः ही झलकेगी
देश भक्ति की सौगात..

आज प्रण लो, इस देश को,
संसार में सर्वोपरि बनाना है..
और बता दो इस दुनिया को
ये हम भारतीय युवाओं का ज़माना है..

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

जन्माष्टमी की शुभकामनाएं

krishna_3.jpg

जब जनम हुआ इस नटखट का |
तब जहां पूरा खिलखिलाया ||

इसके चंचल बचपन में |
पूरा गोकुल भरमाया ||

मीरा राधा खो गयी |
ऐसी प्रीत लगाई ||

हर बुराई का नाश किया |
दुनिया को सीख सिखाई ||

तुम चंचल, प्यारे, निडर बनो |
बस यही गीता का सार ||

मुबारक हो आपको जन्माष्टमी का त्यौहार ||
मुबारक हो आपको जन्माष्टमी का त्यौहार ||

रविवार, 28 जून 2009

A Stupid Common Man

तो जनाब सब कैसे हैं ?
पता नहीं अब यह ब्लॉग कोई पढ़ेगा भी या नहीं..
बिलकुल ठप्प पड़ा है.. जैसे कोई सरकारी कार्यालय हो..
करें भी क्या ? परीक्षाओं के बाद घर पहुँच गए और फिर वहां इतना आराम फरमाया है साहब जैसे की खरगोश आधे साल काम कर के सोने चला गया हो.. खैर घर पर खाना, पीना, सोना और घूमना, इसके अलावा तो शायद ही कुछ किया हो | और अब कुछ ही दिनों में फिर से काम पर पहुँच जाएँगे |

अब आज के पोस्ट की बातें शुरू करता हूँ |
मैं आज इस पोस्ट को पढ़ रहा था और यहीं पर एक सोच इस पोस्ट के रूप में बन कर उभरी है |
कसाब | आज एक ऐसा नाम हो गया है जो जन-जन के होठों पर आ गया है जैसे अमिताभ बच्चन ही हो | वाह ! भाई क्या किस्मत[?] पायी है, इतनी छोटी उम्र में इतना नाम ? हंसी आ रही है और रोना भी | हंसी इसके लिए की यह नाम वो "प्रख्यात" वाला नहीं है पर "कुख्यात:" वाला है और रोना इसलिए कि आज लगभग मेरी ही उम्र का इंसान एक ऐसी स्थिति में फंस गया है जहाँ से उसे खुदा भी नहीं निकाल सकता है |
अभी-अभी मैं अंतरजाल पर कसाब के बारे में और भी कुछ पढ़ रहा था तो उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल हुई | कसाब केवल २२ साल का नौजवान है और जिसे आतंकवादी जेहाद कहते हैं, उसके बारे में भी उसे कुछ नहीं पता है | हिरासत में जब उससे पूछा गया कि क्या वो कुरान (जो की मुस्लिमों की पवित्र ग्रन्थ है) में से कोई छंद जानता है ? तो उसका जवाब नकारात्मक था जो कि यह दर्शाता है कि जिसे आतंकवादी जेहाद के नाम पर अनजान युवकों पर थोप रहे हैं, वो असल में कुछ और ही है | उन्हें असली बात का पता चलने से पहले ही किसी और तरह से शिक्षित, माफ़ कीजियेगा अशिक्षित किया जा रहा है | बड़े अफ़सोस की बात है कि आज पाकिस्तान में ही नहीं पर दुनिया में हर देश, हर साम्राज्य में यही हो रहा है | हर असामाजिक तत्त्व, अपरिपक्व युवाओं को उसके असली मकसद से बहका रहे हैं और इन घिनौनी हरकतों में ढकेल रहे हैं |

मैं जब कसाब के बारे में पढ़ रहा था तो यह भी पता चला कि जब उसने अपने आस-पास खून से लथपथ लाशों को जहाँ-तहां पड़े हुए देखा तो उसकी हिम्मत भी धाराशाई हो गयी | असल बात यह है कि एक युवा मन इतना स्थिर नहीं होता की अपने सामने किसी लाश को खून से लथपथ देख सके | ऐसा तो तब भी देखा जाता है जब कोई अपना सामान्य स्थिति में अपनी आखों के सामने ही इस दुनिया को छोड़ के चला जाता है | उस समय घर के बुजुर्ग ही उस नौजवान को संभालते हैं | फिर यहाँ तो बात ही कुछ और थी | कसाब ने जब देखा की उसने अपने हाथों से इतने मासूमों की जान ली है तो हार कर कहने लगा कि उसे पाकिस्तान, अपने घर जाना है | उसे और नहीं जीना है | ऐसा पढ़ कर ही इतना दुःख होता है कि आज हमारा हम-उम्र ऐसे जाल में फंसा हुआ है जहाँ ज़िन्दगी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो चुकी है | केवल और केवल दुनिया में छाई अशिक्षा के कारण |

दो दिन पहले दूसरी बार "अ वेडनेज़डे" देख रहा था | लगा कि अब समय है कुछ करने का | आखिर क्यों हम एक आम मुर्ख मनुष्य - "अ कॉमन स्टुपिड मैन" बनकर ही इस ज़िन्दगी को जीकर ख़त्म कर देना चाहते हैं | आखिर ऐसी क्या बात है कि फिल्म को बहुत सराहने के बाद भी हम सिर्फ स्थिति में अपने आपको ढालना सीख जाते हैं | क्यों नहीं हम उस स्थिति का मुकाबला कर उस पर जीत हासिल करते हैं ? ऐसा क्या है जो हमें रोकता है ?

डर ?

अरे जनाब डरता तो एक बच्चा एक बिल्ली से भी है | जब तक यह आम आदमी अपने इस भीरु बिल से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक वह बाहर की विशाल सुरमई, आनंदमयी और तेजस्वी दुनिया को कैसे देख पाएगा | जब मुंबई पर हमले हुए तब सबने लिखा और बहुत लिखा | इतना की आदमी पढ़ते-पढ़ते उम्र गुजार दे | मैंने भी एक पोस्ट लिखा और आज देख लीजिये सब ठप्प | वो कहते हैं ना - "हमें हर स्थिति में ढलने की मानो आदत सी हो गयी है" | कौन सा अपना कोई मारा है उस बेरहमी हमले में ? कौन सा ताज मेरा होटल था ? कौन सा मैं लोकल ट्रेन से सफ़र करता हूँ ? कौन सा मैं मुंबई में रहता हूँ ?
ठीक है जब हमारे ऊपर कोई AK-47 ले कर आएगा तब देखेंगे | अभी तो बस कमाओ और मौज करो |
और यह बिमारी केवल आपके साथ ही नहीं है पर मेरे साथ भी है | यहाँ पर हर एक इंसान की सोच बस इतनी संकीर्ण ही है | आज चाहते तो हम कुछ कर सकते थे | करीबन 7 महीनों के बाद भी भारतीय पुलिस कुछ नहीं आर पायी है, बजाय इसके की एक आतंकवादी को पकड़ना | पर कुछ नहीं होगा | फिर कल कोई विमान अपहृत हो जाएगा और फिर कोई इस आतंकवादी को छुड़ा कर ले जाएगा | और फिर ऐसे हजारों कसाब पैदा होंगे और हम दर-दर रोते फिरेंगे | तब हमें हमारी भूल का एहसास होगा और यही कहेगी ये निर्दयी दुनिया - "अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गयी खेत"

अपने आप को विकसित देश बताने से पहले इस विकास में अपने योगदान के बारे में चिंतन-मनन कीजियेगा और तब आप और मैं इस शर्म में डूब जाएंगे की हम तो अपने पूर्वजों के वजूद और रत्नों पर जी रहे हैं | न हमारा वजूद है और न ही हम विकसित |

और तब कहीं दूर से किसी धमाके की आवाज़ में आवाज़ आएगी - "अ वेडनेज़डे" |

गुरुवार, 14 मई 2009

प्यार, यार, वार !!

पिछले एक पोस्ट में मैंने बिट्स में भारतीय संस्कृति को बचाए रखने पर यहाँ के छात्रों की तल्लीनता पर प्रकाश डाला था पर आज अफ़सोस कि एक अँधेरा सा छा रहा है उस पोस्ट पर, इस संस्कृति पर और हमारी काबिलियत पर |
आज हमारे फाईनल एक्ज़ाम ख़त्म हुए हैं और तभी फुर्सत में ये पोस्ट आपके सामने आ रहा है |

एक्ज़ाम ख़त्म होने की ख़ुशी में और विद्युत अभियंता बनने का सुरूर तो हम सब पर चढ़ा ही है और इसी को जश्न में तब्दील करने के लिए हम हमारे कैम्पस में कनॉट में खाना खाने गए | बातें चल रही थी और जो बातें आजकल सबसे ज्यादा आम है, लड़का-लड़की, दोस्त-दोस्ती, वही सब चल रहा था | कोई किसी का किसी के साथ होने पर खुश था और कोई किसी की कुछ अनसुनी बातें बुझा रहा था | बात इतनी आम हो चुकी है कि राह चलते भी बस यही बातें | मौका मिले और हम शुरू हो जाएं | अब साहब इस उम्र में नहीं तो फिर कब करेंगे ? पर हाँ एक बात तो तय है | हमें आजकल ऐसी बातें करने में ज्यादा मज़ा आता है और जब भी कोई गंभीर विषय की बात होती है तो वहां से किनारा काटने में ही अपनी भलाई समझते हैं |
कुछ लोग कैम्पस में बढ़ते गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड ट्रेंड को लेकर चिंतित थे | बात यह नहीं की यह ठीक नहीं है पर उनका कहना है कि हर किसी रिश्ते में एक सीमा और मर्यादा होती है जिसे लांघना न केवल उस रिश्ते को पर पूरे समाज की स्थिति को भी धूमिल करता है |

कैम्पस के कुछ ऐसे वाकये सामने आए जो मैंने भी पहले नहीं सुने थे और सुनकर तो मैं भी शर्मसार हो उठा | लोगों के लिए यह एक फैशन बन गया है और इस फैशन की चका-चौंध में आँखें सभी की चुंधिया गयी हैं | इन 20-22 साल के थोड़े परिपक्व और तेज़ युवाओं ने हर सीमा का उल्लंघन करने का शायद मन बना लिया है | इनमें से ज्यादातर लोगों को यह भी पता नहीं चलता है की इस चुन्धियाने वाले फैशन में वो सार्वजनिक जगहों पर कुछ ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें फंकी लगता है और जो उन्हें यह झूठा एहसास दिलवाता है कि उनका स्तर बाकी लोगों से ऊंचा है |

जब मेरे दोस्तों ने 2-3 ऐसे किस्से सुनाए तो लगा की अभी तो ना जाने कितने अनकहे-छुपे किस्से हमें नहीं पता है और इन 2-3 किस्सों ने ही दिल को जैसे झकझोर कर रख दिया है | माफ़ कीजियेगा मैं उन सब वाकयों को यहाँ सबके समक्ष लाकर खुद को शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ |
वैसे इस पोस्ट को पढ़ने वाले यह सब तो समझते ही होंगे की मैं कैसे अंधेपन की बात कर रहा हूँ जो इस युवा पीढ़ी को विवेकशून्य बना रही है | आज जब मैं कॉलेज में अपने प्रथम वर्ष और इस तृतीय वर्ष के अंत को तुलनात्मक रूप में देखता हूँ तो लगता है कि मैं वैसे ही ठीक था और यह कॉलेज भी |
प्यार-मोहब्बत-इश्क तो खुदा की एक हसीन देन है जो उस मासूम बच्चे की हंसी समान मधुर और सौम्य है | फिर क्या हुआ ? हम क्यों बदल गए ? आखिर ऐसी क्या बात है जो हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे तो जा रहे हैं पर सांस्कारिकता और व्यावहारिकता के दौड़ में सबसे पीछे आने की कोशिश में लगे हैं |

मेरे ख्याल में जो अहम् की भावना है, उसकी इसमें मुख्य भूमिका है | मेरे दोस्त ने कुछ दिन पहले बताया था कि एक लड़की को ऐसा लगता था की उसकी रूममेट को लड़के ज्यादा पसंद करते हैं या उसपर ज्यादा ध्यान देते हैं और इसी कारण वह उदास रहने लगी और अपनी पढ़ाई भी खराब की | काफी छोटी सी बात | पर जब सुनने में यह भी आता है कि फलानी लड़की ने फलाने लड़के के लिए आत्महत्या कर ली या फलानी लड़की का कत्ल कर दिया तब दिमाग ठनकता है | कहीं यह लड़की भी उस उदासीनता की शिकार तो नहीं थी ? कहीं उसे भी ऐसा तो नहीं लगता था कि अगर उसका बॉय-फ्रेंड नहीं हुआ तो उसकी बाकी सभी दोस्तों में उसकी पूछ कम हो जाएगी ? अगर जवाब ढूंढे तो काफी हद तक सही लगता है | और मेरे ख्याल में यह अहम् की भावना लड़कियों को ज्यादा प्रभावित करती हैं क्योंकि कहते है ना - लडकियां इमोशनली थोड़ी कमज़ोर होती हैं और इसी कारण सहनशीलता भी उनकी कम होती है (माफ़ कीजियेगा लड़कियों, यह कोई तथ्य नहीं है पर अभी तक जो मैंने अवलोकन किया है, उसी के अनुसार बता रहा हूँ) |
पर बात मैं केवल लड़कियों तक ही सीमित नहीं रखना चाहता हूँ | बात तो हर उस लड़के पर भी लागू है जो इस भ्रम में जी रहा है कि एक गर्ल-फ्रेंड होना इस दुनिया में जीवित रहने के लिए एक एक्स्ट्रा तत्त्व है (5 मूलभूत तत्त्वों के अलावा) |
परेशानियां, दिक्कत्तें और अहम् तो हर जगह अपना रंग दिखाएंगे | आखिर कब तक हम इनके सामने अपना सर टिका कर झुक जाएंगे ? आखिर कब तक हम हार मानते रहेंगे ? आखिर कब तक हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ेंगे और विवेकशीलता की दौड़ में पीछे ? आखिर कब तक हम अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों और अपने आदर्शों से मुंह छुपाकर भागते फिरेंगे ? आखिर कब तक ?
कभी तो हम हार ही जाएंगे | इस आधुनिकता में, इस विवेकशीलता से, इस संस्कृति से, इन मूल्यों से और इन आदर्शों से | अंततः हमारा सर झुका ही रहेगा जैसे आज इस दौड़ में है | पर सोचिये की वो सर शान से झुका है उसके सामने जो इस संस्कृति का निर्माता है, जिसने इन मूल्यों को एक सुन्दर माला में पिरोकर हम सबको पहनाया है और जिसने हमें जीना सिखाया है | काश हम सब का सर ऐसे झुके और हम शान से कहें - "इस संस्कृति के लिए, इस जहां के लिए, इस ज़िन्दगी के लिए, तुम्हारे लिए ऐ दोस्त जिसे में प्यार करता हूँ, जिसे मैं चाहता हूँ" | उस क्षण को महसूस करिए और आपको सही और गलत का अंदाजा ज़रूर पता चलेगा |

यह तो अब हमारे ऊपर ही निर्धारित है की हम कैसे जीना चाहते हैं | इस कीचड़ में एक दूसरे पर कीचड़ उछलकर या उन लोगों की श्रेणियों में जहाँ इन मामूली से विवेकहीन मनुष्य का पहुंचना या कीचड़ उछालना बस, ना के समान है |
प्यार करें, मोहब्बत करें पर सीमाओं के अन्दर जहाँ आप भी आराम से अपनी ज़िन्दगी जी रहे हों और समाज में हम जैसे कुछ लोगों को भी आप पर इस पोस्ट के जरिये कुछ कहने पर मजबूर न कर रहे हों | तब देखिये दुनिया बड़ी हसीन हो जाएगी और वो मासूमियत फिर से लौट आएगी |

अंत में मैं सभी को छुट्टियों की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ | आशा करता हूँ की मैं आप से जल्द-स-जल्द रूबरू होऊंगा और आपकी टिप्पणियाँ मुझसे |
तब तक के लिए टाटा, नमस्कार, आदाब, सायोनारा...

230, मालवीय भवन, बिट्स पिलानी से आखरी पोस्ट इस साल के लिए |

P.S. - मेरे ब्लॉग की सालगिरह 16 अप्रैल को चली गयी | व्यस्तता के कारण कुछ पोस्ट नहीं कर सका | खेद है | पर अच्छा लग रहा है इस ब्लॉग जगत का हिस्सा बनकर और कुछ अजनबियों से रूबरू हो कर |

धन्यवाद

गुरुवार, 7 मई 2009

बेईमान तूफ़ान

बिखरते पत्तों का चेहरे पर लगना,
ठंडी हवा का ज़ुल्फों को चूमना,
खुशबू मिट्टी की तन में उतरना
और हमारा सड़कों पर बेफिक्री से भीगना....
आज मौसम बड़ा बेईमान है, आया यहाँ कोई तूफ़ान है...

ढलता सूरज नहीं,
यह तो बादल का आंचल है,
यह सन्नाटा सुनसान नहीं,
बस आंधी की आहट है,
आज मौसम बड़ा बेईमान है,
आया यहाँ कोई तूफ़ान है...

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

ओ माझी रे - विडियो

यहाँ आज इन्टरनेट स्पीड इतनी अच्छी आ रही है की पहला विडियो अपलोड करने में कामयाब हुआ हूँ..
यह मेरे द्वारा गाया गया गाना है जो कि बॉंग कनेक्शन फ़िल्म से है और गाने का नाम : माझी रे है | मूलतः शान ने इसे गाया है | आशा करता हूँ की यह आपको पसंद आएगा |
यह पूरी तरह से कैरिओके नहीं है.. पृष्ठभूमि में मूल गाना भी चल रहा है...

video




यह विडियो पूरी तरह काराओके है... शायद यह आपको ज़्यादा पसंद और समझ [कि मैं कैसा गाता हूँ] आएगा... राय टिपण्णी दे कर बताएँ..


video

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

हाँ माँ तुम ही हो

यह छोटी सी कृति मेरी माँ के जन्मदिन पर लिख रहा हूँ...
बस अपने भावों को कुछ शब्द देने की कोशिश कर रहा हूँ...
बहुत मुश्किल है उस अन्दर छुपे अनंत भाव को शब्दों में बदलना...
बस एक कोशिश है...

सूरज की गर्मी और भव्यता हो तुम
आसमान की नीलाई और विशालता हो तुम

सागर की गहराई और अथाह हो तुम
ओंस की शीतलता और ठंडक हो तुम

धरती की सहनशीलता और सघनता हो तुम
पहाड़ की उंचाई और स्थिरता हो तुम

पंछी का कलरव और आज़ादी हो तुम
पेड़ों की छाँव और जीवन हो तुम

यह बता दो कौन नहीं हो तुम ?
यह बता दो किसमें नहीं हो तुम ?

जब हर ज़र्रे में हो तुम
जब हर बात हो तुम

तभी हमारी इबादत हो तुम
तभी हमारा सम्मान हो तुम

हाँ माँ,
तुम्हारे सामने ये मस्तक हैं नम..
तुम्हारे सामने ये मस्तक हैं नम..

आप मेरी माँ की कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं |
जन्मदिन की शुभकामनाएं सबसे नवीनतम पोस्ट पर दें |

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

जंग का मैदान, मन है शैतान

हाँ मुझे पता है इस बार काफी देर हुई है कोई पोस्ट करने में | मैं आलसी नहीं हूँ पर क्या करुँ बीच में हमारा तकनीकी महोत्सव, अपोजी आ गया और सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि कोई विषय ही नहीं मिल रहा था | पर आज अंततः मेरी और मेरे प्रिय दोस्तों की एक ना छूटने वाली आदत ने मुझे इस विषय पर लिखने को उकसाया [उकसाया ? हाँ सही शब्द है :)] है |
तो पढिये और जंग लड़ते रहिये अपने दिल और मन के बीच |

यह जंग रात को सोते ही शुरू हो जाती है | यह जंग वो जंग है जो हर छात्र को लड़ना पड़ता है [ अपवाद हर जगह हैं और यहाँ पर अपवाद में घोटुओं को शामिल करता हूँ ]
हाँ तो यह जंग क्या है ? क्यों है ? कैसे शुरू होता है ? कैसे ख़तम होता है ? यह सब मैं अभी बताता हूँ | आप तो अभी से ही मेरे पोस्ट के साथ लड़ाई करने लगे | सब्र का फल मीठा होता है.. हौले हौले चलिए ज़रा |

रात को सोते ही.. ओह्ह माफ़ कीजियेगा.. जब हम सोते हैं वो रात नहीं, सुबह मानिए बस पौ फटने को आतुर ही होता है और हमारी आँखें मानों गुस्से से हमारे कंप्यूटर को घूरते हुए कह रही हो, " अरे निकम्मे, जब तू नहीं था तो कम से कम मेरा टाइम-टेबल सही तो चलता था | मुआ तेरे आते ही यह इंसान आलसी, निशाचर और बावरा हो गया है | हह, अपने आपको टेक्नोलॉजी फ्रीक बताता है | मैं तो बोलती हूँ की पूरा फ्रीक है, पर टेक्नोलॉजी में नहीं दिमाग से | काश तू ना होती तो कितना सुकून होता | कोई लौटा दे.. कोई लौटा दे |"

बस इतनी लम्बे भाषण के बाद तो कंप्यूटर भी शर्म के मारे कुछ नहीं बोलता है और स्लीप मोड में पहुँच जाता है | और जैसे ही उसकी आँखें हुई बंद, यहाँ इस शरीर का सिस्टम भी शट डाउन हो जाता है | और किसी तरह सुबह( हाँ, अब तो मैंने भी सही शब्द का इस्तेमाल किया है ! ) के 4-5 बजे हम नींद के भवसागर में गोता लगा चुके होते हैं |
जनाब ये तो हर कॉलेज की आम और मेन्टोस ज़िन्दगी है | यहाँ दोनों में कोई अंतर नहीं है | चाहे कितना भी मेन्टोस खा लें, दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आएगा हाय यह पापी कंप्यूटर !!

खैर जंग तो अब शुरू होती है | नींद लगी नहीं की यह वार्तालाप शुरू हो जाता है | अंत तक एक युद्ध में बदल कर एक लम्बी विराम बन जाता है : ( वार्तालाप दिल और मन के बीच हो रहा है, आइये देखें कौन जीतता है | )

दिल - ओये यार, सुबह 9 बजे तो लेक्चर है |
मन - तो ?
दिल - अरे, तो मतलब ? जाना नहीं है ?
मन - ओये रुक एक मिनट, कान से किटर-पिटर निकालने दे | सही से सुनाई नहीं दे रहा है |
[ कुछ छिकिर-छिकिर के बाद ]
मन - हाँ, अब बता लाले क्या कह रहा था |
दिल - मैं यह याद दिला रहा था कि कल सुबह 9 बजे लेक्चर है, तो जाना है ना ?
मन - ओये तू हाथी** का डेटाबेस ले कर चलता है क्या ? जो तुझे हर लेक्चर का टाइम याद है ?
दिल - अरे तू इतना गुस्सा क्यों हो रहा है ?
मन - अरे छड्ड यार, मतलब याद दिलवाने को भी तेरे पास ये है ? अगर किसी का जन्मदिन याद दिलवाता तो कितना अच्छा होता | वैसे भी हाथों ने कल ही कहा मेरे को कि बहुत खुजली मच रही है | किसी को मारना है उसे | तुझे कितनी दुआएं मिलती | कम-स-कम टेस्ट के समय तो वो दुआएं लगती और तू चलता और इस मुए आलसी शरीर के कुछ नंबर-शम्बर आ जाते |
दिल - अरे यार तू तो अभी से ही बद्दुआएँ दे रहा है | मैंने क्या गलत कहा ? अब यहाँ पर पढने नहीं आये तो क्या मच्छर सेकने आये हैं ?
मन - ओये तू मेरा दिमाग ना खा | वैसे भी कमबख्त नींद आ रही है | वो आँखें रो रही हैं | सुनाई नहीं देता क्या ? सुबह उठ कर देखते हैं | मिलकर फैसला कर लेंगे की क्या करना है | अभी अपनी बत्ती बुझा और लाईट ले कर सो जा | शुभरात्री | शब्बाखैर |

और इन्हीं यादों में एक छात्र के नींद को आराम मिलता है | और यह सपना उसके लिए सुबह तक [अब 4 से 9 में क्या सुबह ? क्या रात ? हाँ ] चलता रहता है |

सुबह आँखों के दरवाज़े पर अलार्म घड़ी की दस्तक होती है | आँख मन ही मन !@#$%^& देता हुआ कहता है - "कमबख्त, फिर से गया | लगता है नेहरुजी के वचनों पर चलता है "आराम हराम है" | अब अगर है तो अपने आराम को हराम रखो ना | नेहरूजी ने यह थोड़े ही कहा था कि दूसरों का आराम हराम है |
खैर कुछ ज्यादा कीच-कीच ना करते हुए वो खुलता है और हाथों को इशारा करते है, "कमबख्त के सर पर एक मारो ज़रा |" हाथ आज्ञा का पालन करते हुए धीमे से मारता है और फिर से चद्दर के अन्दर छुप जाता है |

पर रुकिए मेरे दोस्त "जंग अभी बाकी है"

अब चूँकि नींद थोडी उड़ चुकी होती है तो दिल और मन फिर से अपनी राम कहानी शुरू करते हैं |
दिल - चलें ?
मन - नहीं रे | अभी नहीं लगी है |
दिल - लगी है ? क्या ?
मन - हाँ ? संडास जाने की बात कर रहे हो ना ?
दिल - ओये बेवकूफ | मैं वहां नहीं लेक्चर जाने की बात कर रहा हूँ |
मन [अचंभित, शर्माते और गुस्से में] - ओह्ह नहीं फिर से सपने वाला राग मत अलापो | सोने दो |
दिल - कहा था ना मैंने, यहाँ पर पढने के लिए आये हैं | न कि सोने के लिए | और याद है टेस्ट-1 ? कितने नंबर ला पाए थे ?
मन - टेस्ट-1 ? कौन सा ? किसका ? मुझे कुछ याद नहीं है |
दिल - कोई नहीं | मैं अपना डेटाबेस खोल के बताता हूँ |
मन - अरे नहीं-नहीं रहने दो | यहाँ पब्लिक पढ़ रही है | बदन पर जो कुछ बचा है उसे मत उतारो |
दिल - हाँ अब आये ना लाइन पे | तो चलें ?
मन - हम्म | एक मिनट | टाइम क्या हुआ है ?
दिल - अभी 8:40 हुए हैं | अभी भी 20 मिनट बाकी है |
मन - क्या ??????? सिर्फ 20 मिनट ?
दिल - क्यों क्या हुआ ?
मन - अब तो लाईट ले लो | 20 मिनट में इस हॉस्टल से लेक्चर हॉल नहीं पहुँच सकते |
दिल - क्यों नहीं ?
मन - अरे कितना काम करना पड़ेगा | उठो, मंजन करो, मुंह धोओ, "वहां" जाओ, नाश्ता करो और फिर चलकर [साइकिल पहले साल में अंतिम बार ठीक करवाई थी | अब तो लोहे के भाव ही बिकेगा बेचारा] लेक्चर हॉल | नहीं पहुँच पाएँगे
दिल - ये क्या बात हुई ? अगर आज टेस्ट होता तो 8:55 पर उठकर भी पहुँच जाते |
मन - वही तो | आज टेस्ट नहीं है ना | मस्त रहो |
दिल - नहीं | कुछ बहाने बाजी नहीं चलेगी | चलो |
मन - लेकिन फायदा क्या है ?
दिल - अरे फायदा ? अच्छा विषय चल रहा है | चलो |
मन - हाँ पिछले बार भी नहीं गए थे | तो इस बार भी कुछ नहीं समझ आएगा | छोड़ो यार |
दिल - देखो तुमने 5 मिनट बेकार में ही गँवा दिए | अब ज्यादा चूं-चपड़ मत करो और चलो |

अब जैसे ही मन ने सुना कि 5 मिनट ख़राब हो गए हैं, उसे तो जैसे लगा की अब कोई हालत में लेक्चर नहीं जाया जा सकता है और यह सोचते हुए :
मन - देखो अब तो पहुँच ही नहीं सकते हैं | ऐसा करते हैं, अगले घंटे वाले लेक्चर में चलते हैं | अभी बहुत नींद आ रही है | और इतना कहते हुए ही वह झट बिस्तर के अन्दर रफूचक्कर हो गया |
और बेचारा :
दिल - मन मन मन मन चलो चलो चलो !!!!!!
यही कहता हुआ वह भी निढाल पड़ गया |

और अगले घंटे वाली क्लास के लिए आँखों ने धोखा दे दिया | 2 घंटे बाद वो खुली और शरीर मेस की ओर दिन का खाना खाने को चल पड़ा |

**हाथी, मेरा एक दोस्त है जिससे सब इसलिए परेशान हैं क्योंकि उसे सबके मोबाइल नंबर, रूम नंबर. गर्ल फ्रेंड [दूसरों के जनाब] के मोबाइल नंबर, इत्यादि, इत्यादि [ओह्ह यह इत्यादि वाली लिस्ट बहुत लम्बी है इसलिए यहीं पर ख़तम कर रहा हूँ ] बहुत याद रहते हैं | अब आप पूछ रहे होंगे की इसमें परेशानी क्या है? कोई परेशानी नहीं | पर जब बात किसी के जन्म तिथि की आती है तो वह भी हाथी के डेटाबेस में सालों-साल तक सुरक्षित है और यहीं पर पंगे हो जाते हैं | क्योंकि आपको खबर होगी की कॉलेज वगैरह में जन्मदिन पर ही इंसान सबसे दुखी हो कर सोचता है कि "फूटी किस्मत, आज ही जन्म लेना था |" साहब इतनी मार पड़ती है पिछवाड़े में, की दो दिन इंसान करवटें बदल बदल कर भी नहीं सो पाता है | तो इसलिए हाथी से सब परेशान हैं |