नया क्या?

रविवार, 15 नवंबर 2009

50-50

पिछले पोस्ट में नीरज त्रिखा ने जो कहा उससे तो बिलकुल सहमत हूँ और हाँ बात सिर्फ कह देने से समाप्त नहीं हो जाती, वरन उस पर अमल होना चाहिए, तभी कही हुई बात लाजवाब हो जाती है अन्यथा बेबात!

अब बारी इस पोस्ट की..




कुछ दिनों पहले मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठे बात कर रहा था कि अचानक किसी ने कहा - "सुनने में आया है कि शूकर इन्फ़्लुएन्ज़ा (स्वाइन फ्लू) भारत में अपने पाँव इसलिए नहीं पसार पाएगा क्योंकि भारतीय विटामिन युक्त और पौष्टिक खाने ने खुद एच १ एन १ विषाणु (वाइरस) के पाँव पसार दिए हैं | विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तुलना में दूसरी जगहों पर देखा जाय तो सर्दियों में यह अभी भी लोगों पर कहर बरपा रहा है जो कि भारत में नाम मात्र रह गया है |"

मेरे दिमाग में इस बात को लेकर दो विचार आये :

1.) अरे जनाब जहाँ भारत की अधिकतम जनता इतने बुरे हालातों में रहती है, वहां ऐसे विषाणु की औकात ही क्या है? लोग नाली में जन्म लेते हैं और वहीँ मर जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उस इंसान के साथ ही उस नाली में जन्मा वो मच्छर.. वहीँ जनमता है और वहीँ गंदगी में उसके प्राण उखड़ जाते हैं.. मैं तो कहता हूँ कि जिन लोगों को एक समय की रोटी मयस्सर नहीं होती है उनको वो पौष्टिक भोजन की कामना करना ठीक उसी सामान है जैसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लोगों को यह बताना की हिन्दी में भी शपथ लिया जा सकता है.. (ऐसा मैं नहीं, भारतीय संविधान कहता है..वैसे इस वाकये पर भी पूरी पोस्ट हो सकती है :) ).. इसके अलावा यह फ्लू तो बड़े लोगों का चक्कर है जो विश्व का चक्कर लगा-लगा कर आते हैं और इस चक्रव्यूह में बेचारे मासूमों को भी चकरा देते हैं | और यह बात भी साफ़ है कि जो पढ़-लिख कर बहुत कमा रहे हैं और कमाने से दूना खर्चा भी कर रहे हैं.. वो वाकई में एक तिनके के सहारे एक उफनते दरिया से बच सकते हैं.. क्योंकि उनकी जान तो घंटों कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे ही निकल जाती है.. बचता है सिर्फ हल्का सा हड्डी का ढांचा जिसे एक तिनका भी सहारा दे कर किनारे पहुंचा सकता है और "डूबते को तिनके का सहारा" वाली कहावत को चरितार्थ कर सकता है...

2.) दूसरी बात यह कि ये अजीबो-गरीब बीमारियाँ सब अमेरिका से ही क्यों पनपता है? (शूकर फ्लू मेक्सिको से ही फैला था जो की उत्तर अमेरिका में स्थित है) बड़ा अचरज होता है और दूसरे ही क्षण होठों पे मुस्कान सी आ जाती है.. अब वहां का रहन-सहन, खाना-पीना, बोल-चाल ऐसी ही है कि अमेरिका को "नए-नए बिमारियों का आविष्कारक" की उपाधि से सम्मानित करना चाहिए.. हमारे जो बुजुर्ग लोग हैं,.. कभी-कभी ऐसी बिमारियों के बारे में सुनते हैं तो डर रहता है - कहीं दिल का दौरा न पड़ जाय!
वहां का अधिकतम खाना सब "खाने के लिए तैयार" रहता है, पता नहीं कितने महीनों पहले पका हुआ खाना खा-खा कर लोग ज़िन्दगी चला (वो जीते नहीं हैं.. चलाते ही हैं) रहे हैं!  कईयों के तो खाने में कबाड़ खाना (जंक फ़ूड :) ) और दारु के अलावा कुछ होता ही नहीं है.. अब जब ज़हर ही अन्दर जा रहा है तो कोई अमृत का काम तो नहीं ही करेगा ना? और यही सब बुरी बातों का जिस प्रकार प्रचार-प्रसार किया जा रहा है उससे पूरे विश्व के लोग भ्रमित हो रहे हैं..
लोगों को यह खाना-पीना इतना पसंद आ रहा है कि अपने पसंद की मौत भी पाना नामुमकिन सा हो रहा है.. क्योंकि पता ही नहीं कब, कहाँ, कौन सी बीमारी उनकी ज़िन्दगी को पसंद करके ब्याह ले और सीधे कब्रिस्तान पहुँच के सु-दाग रात मनाएं!.. अफ़सोस है कि जिस तरह पूरा विश्व भ्रमित हो रहा है, उससे कम-स-कम भारत के बड़े शहर तो उसी गति से कब्जे में आ रहे हैं जिस तरह आजकल भाजपा के सभी नेता एक-दूसरे को तेजी से कुर्सी से नीचे धकेल रहे हैं! हमें भी आजकल तेज़ खाना (फास्ट फ़ूड) खाना तेज़ लोगों की ज़िन्दगी का एक अंग लगता है और हम उसी तेजी से अपने शरीर के तेज को ख़त्म कर रहे हैं...
फिर क्यों ना हम जैसे लोगों को ऐसे उटपटांग बीमारियाँ ग्रसित करे?

प्रश्न खुद हमने खड़े किये हैं जिसके जवाब खुद हमें ही ढूँढने होंगे..

तभी मैं सोच रहा हूँ..

पहले जब किसी की मौत 50 साल की उम्र में हो जाती थी तो लोग अचंभित हो कर कहते थे - "क्या? सिर्फ 50 साल का था? फूटी किस्मत की इतनी जल्दी अल्लाह को प्यारा हो गया! "
और आज से 20-25 साल (या उससे पहले ही शायद.. 5 घटा/बढ़ा लीजिये :)) बाद जब किसी की मौत 50 की उम्र में होगी, तो भी लोग अचंभित ज़रूर होंगे पर उनके कहने का तरीका और शब्द कुछ इस तरह बदल जाएँगे - "क्या? 50 साल जी गया? फुल किस्मत वाला था जो इतने साल तक अल्लाह को वो रास ना आया! "


तो जनाब आप इसी बात पर मंथन करते रहिये.. ऐसे उटपटांग बिमारियों से बचते रहिये (अच्छा खाइए.. पीजिये.. ओढ़िये).. साथ ही साथ लोगों को भी बचाइए.. पर मस्त रहिये..
"चंद लम्हों की जिंदगानी.. जियो जैसे हों उषाणु..
सस्ती ना हो मौत इतनी.. की ले जाय ऐसा विषाणु.."

इस पोस्ट का गाना गुनगुनाते जाइए :
छोड़ दे सारी दुनिया (लता मंगेशकर)

आदाब-ए-अर्ज़..

1 टिप्पणी:

  1. Bohot accha post. Hum is baat se sehmat hai ki bharat mein logon ki samasyaen itni jyaada hai, ki swine flu jaise bimaari ko bhi usme jagah nahin mil paa rahi hai.
    Aaj yahan bukhaar hone par bohot jan doctor ke paas isliye nahin jaate hain ki kharcha bad gaya hai. Unse aap yeh ummed kaise kar sakte hain ki woh Swine flu etc ke baare mein pareshan hoye.

    Aur aap yeh hhi dekh sakta hain ki swine flu ka keher jyaada karke bade shehro mein hi hua hai.

    Bohot hi acccha post hai yeh wala.
    English ki itni aadata ho gayi hai, ki jaldi jaldi hindi padh bhi nahin paate

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