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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

हिन्दी - ठंडा.. पर अंग्रेजी - कूल !!

आज यह लेख पढ़ रहा था.. तो सोचा कि चूँकि मैंने अपने पिछले पोस्ट में अब क्रियाशील होने की बात कही है तो उसे पूरा क्यों ना करुँ भला?

सबसे पहले ये बता दूं पिछले पोस्ट में मुझे यह टिप्पणी मिली.. उसका उत्तर दे देता हूँ..

जनाब 1 बात मेरे अन्दर घर कर गयी है.. जिसे मैं उतना नहीं मानता था पर अब मेरा भी इस पर सत-प्रतिशत विश्वास हो गया है | आपने कहा कि लड़कियों की बातें अगर मैं सुन लेता तो मुझे पोस्ट में लिखने के लिए और भी विषय मिल जाते |
बुजुर्ग जो भी कहते हैं वो उनके बुजुर्गियत का निचोड़ होता है और उन्होंने सच ही कहा है कि औरतों को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है (ये तो डॉन जैसा डायलॉग है :) ).. और यह बात को मैं गाँठ बांधकर चलता हूँ..
अगर आप कहते हैं कि उनके दुःख को समझकर मैं कुछ लिखूं तो मुझे तो बख्श ही दें.. उनके दुःख तो ऐसे बदलते हैं जैसे कोई लड़का अपनी गर्लफ्रेंड बदलता हो (इस बात पर आपको विश्वास करना ही होगा.. बड़े शहरों का तो खेल है ये) !! आज वो इसलिए दुखी हैं.. और कल किसी और के लिये.. बेचारा दुःख भी उनसे दुखी हो चुका है..
तो मैं बेहद खुश हूँ कि मैंने उनकी दुःख भरी बातें नहीं सुनी.. और ना ही लोगों को दुखी किया (अगर सुनकर पोस्ट कर देता तो कितने लोगों की बददुआएं लगती.. सोचिये !!).. तो यही मेरा उत्तर है..

अब इस पोस्ट के शीर्षक की बातें करूँ?
हिन्दी हमारी मातृभाषा होते हुए भी.. पता नहीं अन्दर 1 गाँठ सी पड़ी है.. लोगों को ये इतनी गिरी हुई भाषा क्यों लगती है? अंग्रेजी में कहें तो - "सो मिडिल क्लास टाइप".. जब तक जबान पे अंग्रेजी की खिट-पिट शुरू नहीं होती तो लोगों को ऐसा लगता है मानों कोई गंवार बक-बक कर रहा था..

आखिर ऐसी क्या बात है कि हिन्दी में बात करना हमारे लिए "कूल" नहीं होता है? ठीक है माना कि हम शुद्ध हिन्दी नहीं बोल सकते (अगर ऐसा हुआ तो भारत की आधी जनता आत्महत्या कर सकती हैं यह मेरा दावा है !!)..पर हिन्दी की दुर्गति (बोले तो वाट्ट) क्यों कर रहे हो महानुभावों? ऊपर वाले लिंक में जनाब ने कहा कि हमें कट्टर नहीं होना चाहिए.. हम ट्रेन को लौहपथगामी नहीं कह सकते.. ठीक है माना.. पर ऐसा कहने को कौन बोल रहा है? हम कट्टर तो नहीं है पर कम-स-कम साफ़ हिन्दी तो बोलो | हर 2 शब्दों के बाद जो अंग्रेजी अपना चेहरा सामने ले आती है उसका कारण यही है कि हम कट्टर नहीं हैं.. वरना पता चला कि हम तालिबानियों की तरह हो गए और 1 अंग्रेजी शब्द निकलते ही काम तमाम ! हा.. ऐसा तो हम कह ही नहीं रहे हैं |

भारत में मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आधी जनता को हिन्दी आती ही नहीं है.. और क-ख-ग वाली अक्षरावाली तो कम से कम 90% लोग पूरा सही बोल ही नहीं पाएँगे (और इसपर शर्म की बजाय गर्व से कहेंगे - "दैट इज सो मिडिल क्लास टाइप").. और अभी पूछो - "बेटा A-B-C बोलो.." तो वो दो साल का छुटकू सा बच्चा फर्र से बोल लेगा..
गलती उन लोगों की नहीं है जो हिन्दी बोलते, लिखते हैं और पूजते हैं.. गलती तो हम बच्चे के बचपन से ही करते हैं..

मैं तो कहता हूँ की A-B-C सिखाने से पहले उसे क-ख-ग सिखाया जाय.. देखें की वो आगे चलकर कम-स-कम साफ़ हिन्दी बोल पाता है कि नहीं..

हम शुरू से ही उस मासूम के आस-पास ऐसा परिवेश तैयार कर देते हैं जिससे उसमें हिन्दी के प्रति हीन भावना जागृत हो उठती है.. मैं जिन सामाजिक नेट्वर्किंग साइट्स में शामिल हूँ, उनमें से शायद 1 या 2 लोग ही हैं जिन्होंने हिन्दी उपन्यास पढ़े हों.. अंग्रेजी पढ़ना कोई बुरी बात नहीं है.. पर हिन्दी को भी उतनी ही प्राथमिकता देने की ज़रूरत है..

अंग्रेजी स्कूलों में अंग्रेजी पहली भाषा होती है विषय के तौर पर और हिन्दी दूसरी भाषा है.. क्या यह आश्चर्य और दुःख की बात नहीं है कि जिस राष्ट्र की मातृभाषा हिन्दी है, उसी राष्ट्र के 50 से ज्यादा प्रतिशत स्कूलों की पहली भाषा हिन्दी नहीं है? !
सरकारी स्कूलों के बारे में मुझे सही-सही मालूमात नहीं है पर वही भेड़-चाल हर जगह अपने पैर घर कर चुकी है.. वहां भी हिन्दी से ज्यादा अंग्रेजी का ही बोलबाला है..

*इस पोस्ट में 1 ऐसी बात है जो मैं अंत में आप सबके सामने रखूँगा और आपको वह पढ़कर बिलकुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि सच आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं वरन आँखें खोलने के लिए होती है..

साथ ही साथ दुःख की बात यह है कि बिट्स पिलानी जैसे श्रेष्ठतम कॉलेज में भी हिन्दी लिखने वाले बहुत कम है.. और जहाँ तक मेरी जानकारी है, कैम्पस के जिन्दा(जो कम-स-कम महीने में एक बार अद्यतन होते हैं) हिन्दी ब्लॉग में केवल 1 या 2 लोगों का ही नाम आ सकता है..

तो यह तो हिन्दी का दुर्भाग्य ही है कि राष्ट्र भाषा होते हुए भी सड़कों के आवारा पशुओं की भाँती उसे देखा, सुना जाता है..
पर इसमें उसकी भी क्या गलती है.. गलती तो हम जैसे "सो कॉल्ड" यूथ की है जिन्हें हिन्दी बोलना/लिखना ठंडा पर अंग्रेजी बोलना/लिखना उतना ही कूल लगता है !!

तो ना ही हम कभी कट्टर रहे और न ही कभी रहेंगे और शायद यही 1 बिंदु है जो हिन्दी की दुर्गति को कभी रोक नहीं पाएगा.. अब फैसला तो आप पर है.. क्या कट्टर हो कर हिन्दी को बचाएं? या नर्म रह कर हिंगलिश को बढ़ावा दें?
तो आप इस कट्टर प्रश्न पर मंथन करते रहिये और हम इस विराट सागर में एक बूँद पानी का योगदान ऐसे छोटे-छोटे लेखों से करते रहेंगे..

जाते जाते एक किस्सा सुनाना चाहता हूँ :
आशुतोष राणा जो कि हिन्दी फिल्म जगत के जाने-माने कलाकार हैं, 1 बार किसी विदेशी से भारत में मिले..
विदेशी : How are you?
आशुतोषजी : मैं बढ़िया हूँ.. और आप?
(किसी ने अंग्रेजी में बताया कि वो क्या कह रहे हैं..)
इस पर उस विदेशी को बड़ी हैरत हुई की इन्होने हिन्दी में जवाब क्यों दिया...पर कुछ पूछा नहीं..

कुछ महीनों बाद आशुतोषजी उसी विदेशी के शहर पहुंचे..
इस बार :
विदेशी : आप कैसे हैं? (उसने हिन्दी ख़ास आशुतोषजी के लिए सीखी थी !!)
आशुतोषजी : I am doing fine. What about you? क्यों अचंभित हुए कि मैंने इस बार भी उल्टे भाषा में जवाब क्यों दिया? बताता हूँ : पिछली बार जिस तरह आपने अपनी भाषा का सम्मान किया, उसी प्रकार मैंने भी अपनी भाषा का सम्मान किया और इस बार जिस तरह आपने मेरी भाषा का सम्मान किया, ठीक उसी तरह मैं भी आपकी भाषा का सम्मान करता हूँ..

तो ऐसे लोग भी हैं जो कट्टर न होते हुए भी लोगों को जीत लेते हैं... ऐसे लोगों को हमेशा नमन..

हाल फिलहाल प्रेमचंदजी की गोदान और गबन पढ़ी.. अन्दर से हिल गया बिलकुल...
वो आदमी को अन्दर से प्रस्तुत करते हैं और ऐसा लगता है मानों पूरे समय कोई फिल्म चल रही हो ठीक आपके सामने..
ऐसे लेखक को सौ बार नमन है..

*इस पोस्ट की ख़ास बात : मैंने सभी अंकों को अंग्रेजी में ही रख छोडा है क्योंकि मुझे पूर्ण भरोसा है कि १,२,3,४,५,६,७,८,९.. यह भी भारतीय जनता के लिए याद रख पाना समुद्र में से मोती ढूँढ निकालने के बराबर का काम है.. :)

इस पोस्ट का गाना पढ़ते जाइये :
ब्रेथलेस (बेदम.. अगर मैं कट्टर हो जाऊं तो :) )
शंकर महादेवन का एक बेहतरीन गाना..

आदाब.. खुदा हाफिज़..

5 टिप्‍पणियां:

  1. आप का लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। वास्तव में हिन्दी की यह हालत हमारे सरकारी तंत्र के कारण ही है....मैं सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ ....और ऐसा देखा गया है कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले विधार्थी अग्रेजी में अधिकतर कमजोर ही होते हैं..लेकिन अब वहाँ भी यह अग्रेजी घुस गई है.....।
    आखिर मे जो किस्सा आपने लिखा है वह बहुत प्रेरक है, शायद कोई इस पर अमल करे.....

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है यार...

    मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ कि आज हमारे ही देश में हिंदी की हालत बहुत खराब है , और जो Schools के बारे में तुमने लिखा ..वो भी एकदम सही है .

    आजकल हर English-Medium School में यह अनिवार्य किया जाता है कि हर एक विद्यार्थी केवल अंग्रेजी में ही बात करे . कई बार ऐसी स्थिति देख कर आश्चर्य होता है, कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?- School, Parents या फिर लोगों के मन में धरा हुआ यह विचार कि Companies केवल उन्ही लोगों को Career Opportunities देती हैं जो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं या सिर्फ फिर वही लोग जीवन में सफल होते हैं जो अंग्रेजी बोलते हैं.

    मुझे इस विचार से भी कोई दिक्कत नहीं है परन्तु असली दिक्कत यह है कि हमारी Society इतनी Mature नहीं है कि यह बात समझ पाए कि - अंग्रेजी सीखना व बोलना ठीक है परन्तु इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि हम अपनी मातृभाषा को ही भूल जाएँ, हिंदी का तिरस्कार करें तथा हर अंग्रेजी बोलने वाले को बुद्धिजीवी व हर हिंदी बोलने वाले को गँवार समझें.

    हम लोगों की आजकल सोच ही ऐसी बन गयी है की हर वो चीज़ जो फिरंगी [read Western or American] है वह बेहतर है तथा उसका अनुसरण करने से हम सारी दुनिया के साथ एक Global Platform पर आ जायेंगे, लेकिन कुछ नया सीखने के लिए या कुछ नया जानने के लिए यह आवश्यक नहीं है की हमारी अपनी भाषा को व अपनी संस्कृति को भुला दिया जाए या उसे हीन भावना से देखा जाए.

    मुझे यह समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग - जो कि फिरंगी चीज़ों का अनुसरण करते हैं - हमेशा हिंदी के बारे में गलत विचार रखते हैं. पता नहीं क्यों ऐसे लोगों को यह समझ में नहीं आता कि अगर एक Novel कि कहानी अच्छी है, तो वह अच्छी है, फिर भले ही वह जिस मर्ज़ी भाषा में लिखी है, अगर कोई संगीत कानों को सुकून दे रहा है -तो वह अच्छा है फिर भले ही उसमे जिस मर्ज़ी वाद्य यंत्रो का उपयोग किया हो, चाहे वो Sitar हो या Guitar हो, अगर किसी Movie कि कहानी अच्छी है.. Actors का अभिनय अच्छा है तो फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि Movie English है या Hindi.

    जब तक हमारी Society इस बात को नहीं समझेगी, जब तक जनता की यह मानसिकता नहीं बदलेगी - तब तक हमारे देश में Rock over Classical Music, Shakira over Lata Mangeshkar, Alistair MacLean over Premchanda इत्यादि को Preference मिलती रहेगी तथा तब तक अपने आप को 'Cool' कहने वाले जीव पनपते रहेंगे.

    खैर मैंने बहुत कुछ कह दिया, पर हिंदी की दुर्दशा देख कर दुःख होता है.

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  3. और हाँ ..गोदान एकदम god novel है , मैंने जब पदी थी तो उसमे से कुछ lines मुझे याद हैं

    "Nothing pleases a man more than talking about how glorious his past was, how pathetic his present is and how catastrophic his future is going to be."

    माफ़ कीजियेगा ..मैंने novel तो हिंदी में ही पदी थी..लेकिन exact lines याद नहीं हैं , इसलिए अनुवाद कर दिया.

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  4. hindi me likhne ki aadat to nhi hain web pe..isliye aise hi kaam chala raha hoon PM...........maafi!!

    is lekh me kaafi sahiaur gambhir masloo ko uthaya hain tumne!! jab tak hindi sahitya ko badhawa nahi milega shayad tab tak hindi ka dubara ghuspaith nhi ho payega jan jivan mein........shayad acche samsamyaik sahitya ki kami bhi iska karan hain.....aur jo hain wo ya to bahut klisht hain ya utne lokpriya nahi hain!! kya khayal hain aapaka!!

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