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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

एक लम्हां

सुधीर और सलोनी एक ही कॉलेज से पढ़े थे और एक दूसरे को कॉलेज के दिनों से जानते थे..
पसंद एक दूसरे को दोनों करते थे पर कभी इज़हार नहीं किया.. एक दूसरे के बोलने का इन्तज़ार करते रहे..

एक बार सलोनी किसी व्यावसायिक यात्रा पर सुधीर के शहर आई तो दोनों ने मिलने का कार्यक्रम तय किया..

दोनों मिलकर बहुत खुश हुए और कुछ वक्त गुजरने के बाद दोनों ने लॉन्ग ड्राईव पर जाने की सोची..
कार में दोनों चल पड़े और कुछ देर में सुधीर का मोबाइल बजा.. उसने अनायास ही कार चलाते-चलाते मोबाइल उठा कर बात शुरू कर दी कि अचानक से सामने चल रही ट्रक ने ब्रेक लगा दिए..

इससे पहले कि सुधीर कुछ समझता.. उसकी कार भिड़ चुकी थी..

अस्पताल में जब आँखें खुली तो पता चला कि सलोनी इतनी बुरी तरह से ज़ख़्मी हुई है कि बस अब जान मात्र ही बची है.. न सुन सकती है, न देख सकती है, न बोल सकती है.. जिंदा लाश बन गयी थी वो..

सुधीर अपनी जिंदगी को कोसते हुए उस एक लम्हें को तलाशता रहा जब वह सलोनी को फिर से जिंदगी दे सके, अपने दिल की बात कह सके.. 
और सलोनी अपनी किस्मत पे तरस खाते हुए उस एक लम्हें को तलाशती रही जब वह अपने दिल की बात सुधीर को बता सके..

पर अब ऐसा नहीं हो सकता था...
उस एक लम्हें की एक छोटी सी भूल, एक छोटा सा लम्हां, आज दोनों को बेबस और अपंग बना गया था..

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

रजनी चालीसा

आज कल रजनीकांत पर बहुत सारे एस.एम.एस और दो लाईना बन रहे हैं.. भैया अब वो हैं ही ऐसे कमाल के..६१ साल में ऐसे-ऐसे कारनामे अपनी फिल्मों में जो करते हैं.. नव-कलाकारों की तो सिट्टीयां और पिट्टीयां सब गुम हो गए हैं.. रजनीकांत ने जितनी मेहनत और निष्ठां से फ़िल्मी जगत को एक से बढ़ कर एक सुपर-हिट पिक्चरें दी हैं.. जितनी सराहना हो, कम है..
पर जनाब इनके ऊपर बन रहे एस.एम्.एसों ने तो धमाल ही मचा रखा है.. ऐसा कहना गलत होगा कि इन सब एस.एम्.एसों में उनके खिलाफ कुछ कहा जा रहा है... बस कुछ हंसी-मज़ाक और क्या?
वो कहते हैं न - "जो चुटकुला आप पर बने और जिसे सुनकर हज़ारों लोग हँसे.. उससे बेहतर चुटकुला दुनिया में नहीं है.. कम से कम आप पर ही सही.. पर इतने लोग हँसे तो सही"

तो मैंने भी सोचा कि चंद पंक्तियाँ लिखूं इस महान कलाकार पर:
(आप सब से गुजारिश है कि इसे अच्छी मंशा में ही लें.. मैं किसी के खिलाफ कुछ नहीं लिख रहा हूँ)
तो रजनीजी के ऊपर प्रस्तुत है..

"रजनी चालीसा"
चाहे मुन्नी कितनी भी बदनाम हो
चाहे शीला की जवानी पूरी चढ़ी परवान हो
चाहे ए.सी.पी प्रद्युमन उसपर बन रहे एसेमेसों से परेशान हो
पर पूरी दुनिया फिर भी कहेगी..
Oh My रजनी Only तुस्सी महान हो!
पूरे भारत की शान हो!
Einstein के लिए बेईमान हो!
Newton के लिए हैवान हो!
Surprises की खान हो!
दुनिया की श्रृष्टि-गान हो!
मुर्दों में दौड़ती जान हो!
बेसुरों की टोली की तान हो!
इंजीनियरिंग कॉलेज के मेस की नान हो!
रात को लेते जल-पान(नाश्ता) हो!
Tsunami के सामने उफान हो!
मूक के लिए ज़बान हो!
बहरे के लिए कान हो!
सूरज को Supply करने वाले भान हो!
Even राखी के लिए मान हो!
पानी में तैरता वायुयान हो!
कुम्भ में वीरान हो!
गिनीज़ बुक के लिए हैरान हो!
साइकिल के लिए कटने वाली चलान हो!
दुनिया की सबसे समतल ढलान हो!
खली के लिए पहलवानी की दुकान हो!
रिकी पॉन्टिंग को लगे, उससे भी बड़े बेईमान हो!
ब्रैड पिट से भी ज्यादा जवान हो!
पर जो भी हो...
Completely Made In हिंदुस्तान हो!
और हम सब के लिए धरती वाले भगवान हो!
Oh My रजनी.. तुस्सी Gr8 हो! महान हो!

शनिवार, 13 नवंबर 2010

अनमोल अजन्मी कन्याएं

भोला भागता हुआ कमरे में घुसा और साँसों ही साँसों में एक वज्र मार गया..
"बाबा, जायदाद के लिए फिर से हाथापाई हो गयी और गौतम ने जीतू भैया को गोली मार दी!!"

इतना सुनना था कि बाबा और माँ पवन की वेग से गाड़ी में चढ़ कर जीतू के घर पहुंचे..
वहां अफरा-तफरी मची हुई थी और इसी बीच जीतू को अस्पताल ले जाया गया...
करीब ३-४ घंटों की मशक्क़त के बाद डॉक्टरों ने जवाब दे दिया..

पुलिस केस हुआ और गौतम को अपने बड़े भाई के क़त्ल के जुर्म में जुर्माने के साथ १० साल की कैद हुई...

घटना के कई दिनों बाद बाबा माँ के साथ बरामदे में बैठे थे.. दोनों में एक समझी-बुझी चुप्पी थी..
तभी बाबा बोले - "जीतू की माँ, अगर इन दो नालायकों के लिए हमने उस समय परिवार और समाज के दबाव में तेरे कोख में पल रही दो कन्याओं का क़त्ल किया था, तो सबसे बड़े गुनहगार तो हम हैं... काश हमारे बेटियाँ होती.."

और दोनों की आँखों से दो बूँद आंसू, धूप से तपती गर्म फर्श पे गिर के उन अजन्मी कन्याओं की तरह मर गए...

फोटो श्रेय: http://www.stolenchildhood.net

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

५०० रूपए


सुधीर और मोहन बहुत ही करीबी दोस्त थे... सर्वसम्पन्न तो दोनों के परिवार थे पर एक जगह जा कर दोनों की राहें अलग हो जाती थीं | दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे और जैसा कि एक आम युवा-दिल होता है.. दोनों में काफी बहस छिड़ी रहती थी.. बालाओं को लेकर, परिवार को लेकर, देश को लेकर, नेताओं को लेकर..

एक दिन दोनों देश में भ्रष्टाचार के ऊपर विचार कर रहे थे |
सुधीर ने कहा – इन नेताओं को तो एक ही पंक्ति में खड़े करके गोली मार देनी चाहिए | न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी | भ्रष्टाचार समाप्त !!
मोहन ने कहा – नेताओं को छोड़, पहले खुद को सुधार | टैक्स बचाने के चक्कर में जो तू फर्जी बिल दिखाता है, वो तो मत दिखा | वैसे भी तुझे पैसे की कमी नहीं है फिर `२००-`३०० बचाकर क्या हासिल करना चाहता है? भ्रष्टाचार तेरे अंदर से शुरू हो रही है |
सुधीर ने कहा – अरे वो मैं... छोड़ ना... `२००-`३०० से क्या फर्क पड़ता है? वैसे तूने कह ही दिया है तो अब से मैं हर महीने `५०० दान दूंगा.. खुश?
वृत्तांत वहीँ समाप्त हो गया |

कई महीने बीत गए |
मोहन इमानदारी से टैक्स भर रहा है |
सुधीर आज भी फर्जी बिल दिखाकर `२००-`३०० बचा रहा है | `५०० वह अपने बालों को संवारने में दान कर रहा है |

सुधार दूसरों में नहीं खुद में लाओ

एक विडियो देखते जाइये `५०० पर ही है, आशा है अगली बार आप खर्च करने से पहले सोचेंगे:
यह विडियो अंतरजाल से ली गयी है.. यह मेरी खुद की नहीं है.. बनाने वाले को धन्यवाद...

video


सोमवार, 13 सितंबर 2010

दर्द-निवारक

छोटा सौरव जब चलना सीख रहा था तो कभी-कभी गिर पड़ता, माँ झट उसे गोद में लेकर उसके दर्द को गायब कर देती...

बचपन में जब चोट लगती थी तो सौरव भागा-भागा अपने माँ-बाप के पास आता था.. वो झट से उसका दर्द दूर कर देते...

कम नंबर आने पर जब सौरव उदास हो जाता तो उसके पिता उसे अच्छे से बैठ कर समझाते और उसका दुःख-दर्द झट ख़त्म हो जाता...

कॉलेज में जब किसी प्रोग्राम में सौरव हताश हो जाता तो उसके माँ-पिताजी उसका मनोबल बढ़ाते, उसकी हौसला-अफजाई करते और उसके दर्द को कम कर देते थे...

नौकरी शुरू की तो संसार की छोटी-मोटी सभी परेशानियां अपने माँ-पिताजी के समक्ष रखता और वो झट उसके दर्द को समझते और सही सलाह दे कर उसे दूर कर देते...

शादी होने के बाद जिम्मेवारी बढ़ गयी तो सौरव और परेशान रहने लगा... पिताजी कभी-कभी उसे बुलाते और उसे हर जिम्मेवारी को सही से निभाने की सलाह देकर उसका बोझ हल्का कर देते... उसका दर्द कम करते...

फिर एक दिन सौरव ने पत्नी की सुन ली और माँ-पिताजी को वृद्धाश्रम छोड़ आया.. वह खुद को आज़ाद महसूस करने लगा और खुश था...
पर एक दिन किस्मत ने पल्टी मारी... एक हादसे में उसने अपने बीवी-बच्चों को खो दिया.. 

उसपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा...

वह भागा-भागा वृद्धाश्रम गया और अपने माँ-बाप को ले आया...

माँ-पिताजी ने निःसंकोच उसके दर्द को अपने में समा लिया और उसके दुःख को हल्का और कम कर दिया...

ज़िन्दगी यूँ ही चल रही है और सौरव को आज भी माँ-बाप सिर्फ और सिर्फ दर्द-निवारक ही लगते हैं...

शनिवार, 4 सितंबर 2010

बदलाव खुद से

साहिल और राहुल, अन्य किसी भी कॉलेज के छात्र की तरह कभी-कभी देश पर चर्चा करने लगते थे..
दोनों बहुत कोसते थे इस देश के प्रणाली को.. इस देश के तंत्र को... कम ही मौके ऐसे आते थे जब वो दोनों देश के बारे में कुछ भी सकारात्मक कहते हों...

एक दिन दोनों एक स्वयंसेवी संस्था में शामिल होने गए और उस दिन उन्होंने झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों को देखा... कैसे वो गन्दगी और निरक्षरता में ज़िन्दगी निकाल रहे हैं...
आने के बाद दोनों में फिर से देश की बहस छिड़ी और दोनों ने माना कि बातें करने से कुछ बदलेगा नहीं.. कुछ करने से ही कुछ बदलाव ला सकते हैं जो वो चाहते हैं..
अगले हफ्ते फिर से जाने की बात तय हो गयी...

अगले हफ्ते साहिल ने राहुल को कॉल किया और पूछा कि चल रहा है कि नहीं... राहुल ने बहाना बनाते हुए कहा.. "अरे आज नहीं यार.. एक दोस्त से मिलने जाना है.. अगले हफ्ते चलूँगा पक्का.."
साहिल ने बहस किये बिना मंजिल की ओर अपने कदम बढ़ा दिए और लोगों की मदद करने पहुँच गया...

आज साहिल लोगों की मदद करके बहुत खुश है...  राहुल आज भी अपने दोस्तों से मिलने में लगा है...
आज साहिल देश को सकारात्मकता की ओर ले जाने की बात कर रहा है... राहुल ने देश को भला-बुरा कहने के लिए एक और राहुल ढूँढ लिया है..
फर्क सामने है..

जिसको बदलाव लाना है वो समय और शक्ति दोनों समर्पित कर रहा है..
और जिसके बातें बनाना है वो समय और शक्ति दोनों बेकार की बातों में व्यर्थ कर रहा है...

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कन्नू की “गाय” ते माँ का “Cow”

काफी महीनों बाद लिख रहा हूँ..कारण २ हैं.. पहला अनुपलब्धि अंतरजाल की और दूसरा अनुपलब्धि अच्छे विषय की...
पर आज दोनों ही बाधाएं दूर हो गयी हैं और इसलिए लिख रहा हूँ..
यूँ तो मैं लघु कथाएं लिखने लगा था पर आज एक लघु कथा ऐसी लिखूंगा जो कि मनगढंत नहीं है अपितु मेरे ही सामने घटा एक वाकया है..

शाम का समय था और मैं और मेरे दोस्त खाना खाने पास ही में एक आंटी के पास गए हुए थे | वहाँ खाना खाते वक्त आंटी का नाती अपनी माँ के साथ वहीँ आया हुआ था |
हम उससे बात करने लगे और पूछने लगे कि वो कौन से स्कूल में जाता है और क्या-क्या पढ़ता है? उसका नाम कन्नू है और बहुत ही नटखट और होशियार है | वो खुद ही हमें बताने लगा कि कौन सा जानवर कैसी-कैसी आवाजें निकालता है | उसने हमें बन्दर, शेर और बिल्ली की आवाज़ निकाल कर दिखाई और हमें भी बड़ा अच्छा लगा | फिर हम उससे खुद जानवरों के बारे में पूछने लगे |
हमने उससे पूछा कि अच्छा बताओ “मौं-मौं (रँभाना)” कौन करता है?
तो उसने तुरंत ही कहा – “गाय”
हमने कहा बहुत बढ़िया, कि इतने में ही उसकी माँ रसोईघर में से निकली और डांटते हुए कहाँ – “कन्नू कितनी बार बोला है “गाय” नहीं “काओ (cow)” कहा करो |”

उसी समय मैं समझ गया कि भारत आगे क्यों नहीं बढ़ रहा है | जहाँ माँ अपने बच्चे को बचपन से अमरीका और इंग्लैंड के लिए खाना, पीना, बोलना और रहना सिखाती है वहाँ वो बच्चा भारत के लिए क्या सोचेगा और क्या करेगा? गलती युवाओं में नहीं पर उनको पालने वाले उनके विदेशी माता-पिता में है जो पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में ही रहना पसंद करते हैं | यह तो मैं एक मध्यम-श्रेणी के परिवार का किस्सा सुना रहा हूँ तो उच्च-श्रेणी के परिवार जिनसे आज तक कोई उम्मीद ही न की गयी हो, से क्या आशा की जा रकती है?

देश वही आगे बढ़ा है जिसने अपनी भाषा को प्राथमिकता दी है | चाहे वो अमेरिका हो या फिर चीन | इस तरह की घटनाएं प्रोत्साहित करने वाली नहीं है एक उज्जवल और समृद्ध भारत की | पर कोशिश तो जारी रखनी पड़ेगी |

बुधवार, 2 जून 2010

एक दृढ़ फैसला?

मोहित एक सर्वगुण और सम्पूर्ण परिवार का लाडला बेटा था | बड़ा भाई डॉक्टर बन गया था और बड़ी बहन भी अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने ससुराल जा चुकी थी | मोहित पिछले ५ सालों से बाहर ही था और अपनी पढ़ाई ख़त्म करके वो वापस घर आया था |

मोहित में बदलाव ज़बरदस्त था और उसके सोचने-समझने-परखने की शक्ति लाजवाब हो गयी थी | कॉमर्स लेकर पढ़ने के बाद भी उसका रुख अपने देश, अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने का था | वह केवल बोलना और सुनना नहीं चाहता था.. कुछ करना भी चाहता था | कुछ अनुभवी लोगों से विचार-विमर्श करके उसने एक फैसला लिया.. एक दृढ़ फैसला |

घर आया और माँ-पिताजी को कहा, "मैं देश के लिए काम करना चाहता हूँ, मैं राजनीति में जाना चाहता हूँ" ... इतना कहना था कि पिताजी आवेश में आ गए और कहा कि यह शब्द और सोच अपने ज़हन से निकाल दो.. हमने तुम्हे इसलिए नहीं पढ़ाया है कि तुम इस गन्दगी में पैर रखो.. शादी करके घर बसाओ और शान्ति से रहो.. समाज-सेवा करने के लिए और भी लोग हैं.. राजनीति में मेरी लाश पर चढ़कर ही हिस्सा लेना..

मोहित फटा सा देखता और सुनता रहा.. सोचा कि सफाई सबको चाहिए पर भगत सिंह तो पड़ोस से ही हो.. वह अपने निश्चय की दृढ़ता पर सोचता हुआ अपने कमरे में आ गया और इस तरह एक भावी, शिक्षित और युवा राजनेता का क़त्ल हो गया..

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

सिर्फ एक बार !

काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए.. आपसे गुफ्तगू किये हुए.. काफी व्यस्त था नौकरी की खोज में और आखिर में मैं भी बाबू बन ही गया.. आप सभी की दुआ के लिए शुक्रिया..
मैं कभी भी सोच कर नहीं लिखता हूँ.. कभी मेरे आस-पास कुछ होता है तो लिखता हूँ.. यूँ कहें कि लिखते-लिखते सोचता हूँ और सोचते-सोचते लिखता हूँ..
पहली नौकरी लगी है और यह ख़ुशी शायद ही किसी दूसरी ख़ुशी से बढ़कर हो.. घरवाले भी खुश और हम तो ५० गुना ज्यादा खुश उनको देख कर.. मेरे काफी दोस्तों को भी नौकरी मिल चुकी है और अब बस महिना भर और रहता है जब सब अपने-अपने रास्ते इस ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल हो जाएँगे जहाँ कोई किसी का भाई, दोस्त, यार नहीं होता है.. यह कातिल ज़माना है.. आप कमज़ोर पड़े, आप मारे गए..

बस यही सोच कर कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ और दिन मैं अपनी ज़िन्दगी जी लूं.. बाद में तो इसे कंपनी वालों को हवाले करना ही है..
दो दिन पहले हमारे कैम्पस पे अंतरजाल बहुत धीमा हो गया था.. मानिए शुन्य के बराबर कि गति रही होगी अंतरजाल की.. तब जब सबके चेहरे देखते तो लगता कि हमें लकवा मार गया है.. पता नहीं क्यों पर आजकल आपके जिंदा होने का मापदंड अंतरजाल में जीवित रहने के समान हो गया है.. आप कितनी देर अंतरजाल पर रहते हैं, इससे आपकी दिनचर्या का हिसाब-किताब लगाया जाता है..

जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह अंतरजाल का भी है.. अच्छा और बुरा..
आज अंतरजाल ही है जिसके कारण चीज़ों, बातों, ज्ञान का आदान-प्रदान इतना आसान हो गया है.. मैं-आप चर्चा कर रहे हैं.. मैं यह पोस्ट आप तक पहुंचा पा रहा हूँ.. दुनिया छोटी हो गयी है..
पर वहीं दूसरी ओर जब सोचता हूँ कि आज हमारी ज़िन्दगी अगर अंतरजाल से तुलने लगी है.. इसके बिना अगर हम अपाहिज हैं.. अगर इसके कारण हम अपने कमरों को छोड़कर खुली हवा खाने को भी तैयार नहीं हैं.. अगर छोटी दुनिया के साथ-साथ हमारी सोच भी छोटी हो गयी है.. अगर हमारी दिनचर्या इतनी खराब हो गयी है कि कब उठना है, कब सोना है, कब खाना है..इसका अता-पता नहीं है.. अगर दोस्त केवल आभासी (वर्चुअल) हो गए हैं.. अगर हमारी अनुभूति का दम घुट चुका है.. अगर हमारी आत्मा मर चुकी है.. अगर !!
तो क्या फायदा हुआ इसका? तो क्या फायदा हुआ इस महाआविष्कार - अंतरजाल का?

कहीं तो कुछ कमी रह गयी है.. और सच मानिए कमी कभी भी बाहर नहीं होती.. अन्दर ही है.. हमारे अन्दर..
आज मैंने अपने कुछ दोस्तों से १० मिनट खाने के बाद घूमने चलने को कहा..सबने मना कर दिया.. क्यों? कोई कारण नहीं है.. सबके पास नौकरी है.. अब किसी को कुछ नहीं करना है कम-स-कम १ महिना तो.. फिर इतनी उदासीनता क्यों? आज आत्मा मर क्यों गयी है सबकी? क्यों हम वो पहले साल वाले नए-जोशीले छात्र नहीं रहे हैं जब एक बात पर कैम्पस के चार चक्कर लगाने में एक हिचक भी न होती थी? क्यों?
क्योंकि सबके कमरे में एक-एक लैपटॉप है.. क्योंकि सबके पास अंतरजाल है.. क्योंकि सबके पास डी.सी. (१ ऐसा सॉफ्टवेर जिसके जरिये कैम्पस पे कम-स-कम 40Tb डेटा शेयर होता है जिसमें हजारों फ़िल्में, वृत्तचित्र (डॉक्यूमेन्टरी), गाने और भी बहुत कुछ मौजूद है) है.. सबके पास इतना वक़्त ज़रूर है कि वो ३-३ घंटे बैठकर फ़िल्में देख सकें पर अगर ३० मिनट अपने दोस्त को समय देने को कहें तो नाक-भौं सिकुड़ उठे !!
और यही नहीं, आजकल तो आई.पी.एल. का नया हरदिन-प्रतिदिन नौटंकी शुरू हुआ है जो कि किसी सास-बहु सीरियल के लत से कम नहीं है.. लोग इन्हें देखना ज्यादा पसंद करते हैं.. बजाय इसके कि बाहर जा कर खेलें.. कॉलेज में अगर कोई प्रोग्राम हो रहा हो तो उसमें शामिल हो.. लोगों के लिए क्रिकेट उनकी अपनी ज़िन्दगी से बड़ा हो चुका है.. मैं तो कहता ही नहीं हूँ कि मेरे लिए चल लो बाहर.. मेरे लिए ये प्रोग्राम में आ जाओ.. मैं तो कहता हूँ कि कुछ दिन और हैं कॉलेज में.. तुम उसे जी लो.. बाहर निकलो.. कमरों से निकलों नामुरादों.. कब तक एक कीड़े की ज़िन्दगी जियोगे? और कीड़े की ज़िन्दगी तो शुरू होने ही वाली है.. एक भीरु की ज़िन्दगी कब तक जीते रहोगे.. आस-पास की दुनिया देखो.. कैम्पस बहुत हसीं है.. जितनी गालियाँ देनी थी वो तो दे ली हैं.. पर एक शर्त लगा लो.. अगर ऐसा माहौल.. अगर ऐसी शान्ति आज के बाद मौत के अलावा और अगर कहीं मिले तो एक बार मुझे ज़रूर कहना.. जो कहोगे करूँगा..
फ़िल्में तो ज़िन्दगी भर देखोगे.. गाने ज़िन्दगी भर सुनोगे.. पर आज जो मौका है बेवकूफी करने का.. नौटंकी करने के.. दोस्ती करने का.. दोस्तों के साथ रहने का.. आज़ाद रहने के.. यह फिर नहीं आएगा..
बहुत दुःख होता है जब लोगों की घुटती हुई आत्माओं को देखता हूँ हॉस्टल के कमरों में.. जिंदा लाश से ज्यादा कुछ नहीं है वो.. और जब यह लाश अपने दोस्तों, अपने करीबियों की होती है तो बेहद दुःख होता है.. चीरता हुआ अन्दर से.. किस-किसको समझाऊंगा मैं? कौन सुनेगा मेरी? फिल्मों के तेज़ शोरगुल में मेरी आवाज़ गुम हो गयी है.. उस लैपटॉप की रौशनी में वो पहले साल का खिलखिलाता हुआ चेहरा गायब हो गया है.. बहुत दर्द है.. पर कोई उसे महसूस कर सके तब..

ऐसी घुटन वाली ज़िन्दगी मत जियो.. उस कीड़े की तरह मत जियो जो रात भर बल्ब के आस-पास मंडराकर मर जाता है.. सिर्फ एक बार मेरी आवाज़ सुन लो.. सिर्फ एक बार उस भोले से चेहरे को याद कर लो.. सिर्फ एक बार ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की तरह जियो.. सिर्फ एक बार !

बुधवार, 10 मार्च 2010

एक महत्त्वपूर्ण संकल्प

ठीक साल भर बाद इसी दिन एक और पोस्ट..
पता नहीं इस दिन क्यों लिखना चाहता हूँ पर चाहता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ..

पर इस बार कुछ अलग.. बदलाव आवश्यक है और निरंतर है.. एक साल में मैं भी बदला हूँ, दुनिया भी..
बिट्स में भी बदलाव आ रहा है.. आशा है अच्छे के लिए ही आये..
पर इस दिन मैं भी कुछ बदलाव लाने कि कोशिश करूँगा.. किसी और में नहीं, खुद में.. कुछ बातें जो मन को खाए जा रही हैं उनको पचाना है.. और कुछ अलग करना है..
आज के दिन संकल्प लेता हूँ कुछ ऐसा करने का जो कि सभी कि यादों में बस जाए.. यह संकल्प बिट्स-पिलानी के लिए है और इसका श्री गणेश आज ही होगा.. कुछ और भी है मन में जिनको करने की इच्छा है पर सबसे पहले आप सभी के लिए मेरा प्रमुख कार्य यह संकल्प ही रहेगा जो आप सभी के सामने मैं जल्द ही लाने की कोशिश करूँगा..

आप सभी के आशीर्वाद और प्रेम की चाह में मैं अपने कार्य में जुट रहा हूँ और आशा करता हूँ कि अगले पोस्ट तक मैं अपना संकल्प पूरा करने में कामयाब रहूँ..

पिछले साल इसी दिन, इसी समय यह पोस्ट किया था.. इसे भी पढ़ सकते हैं..

तब तक के लिए,
आदाब, सायोनारा !

बुधवार, 3 मार्च 2010

आपत्ति

ऋषि फ़ोन पर बात कर रहा था, अपनी गर्लफ्रेंड, प्रीती से..
प्रीती उसे कह रही थी कि वो सुबह जल्दी उठा करे और इसके फायदे और निशाचर होने के नुक्सान बता रही थी..
ऋषि पूरे तन्मयता के साथ सुन रहा था.. आधे घंटे तक सुना..

उनके इस रिश्ते के बारे में ऋषि की माँ को पता था और उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी.. वो प्रीती को पसंद करती थी...
शाम को ऋषि ने माँ को बताया कि प्रीती ने कहा है कि सुबह जल्दी उठूं, तो कल से वो जल्दी उठेगा...
माँ ने सोचा, अच्छा है.. कम से कम इस रिश्ते से इसमें कुछ सुधार तो हो रहा है.. खुश हुई..

कहा - अगर जल्दी उठने की अच्छी आदत डाल ही रहे हो तो स्मोकिंग भी छोड़ दो..
ऋषि एकदम से पलटा और कहा - "माँ, अब फिर से अपना लेक्चर शुरू मत करो.." और उठकर चला गया..

अब माँ को आपत्ति हो रही थी.. उन्हें आभास हो रहा था.. एक अंधकारमय भविष्य का..
ऋषि को अपना बेटा कहने में संकोच होने लगा था... पर कुछ कर न सकीं...

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

व्यापार बढ़ ही रहा है..लोग बन ही रहे हैं !!


कुछ लिखने कि इच्छा तो नहीं थी पर फिर सोचा अच्छा दिन है.. लिखना चाहिए..
लिख इसलिए नहीं रहा हूँ कि आज वैलेनटाइन्स डे है... बस कुछ सोच को शब्दों का रूप देने के लिए लिख रहा हूँ..

कुछ लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं.. इस तरह - स्वतंत्र दिवस मुबारक हो.. अर्थात अकेले हो, खुश हो, आबाद रहो...
भैया ये सब तो दुःख छुपाने के टोटके हैं.. अन्दर ही अन्दर कुढ़ते होंगे.. गुदगुदी तो होती ही होगी.. कि काश वो मेरे साथ होती या होता.. पर जनाब छुपाने का पुराना तरीका.. सिंगल एंड हैप्पी !

वैसे मेरा मानना है कि ये सब व्यापार बढाने का तरीका है.. अरे बाबू, ऐसा थोड़े ही ना है कि आप किसी से साल में एक ही दिन प्यार करते हो और बाकी ३६४ दिन किसी दूसरे की तलाश में जुटे रहते हो? फिर यही एक दिन? सब व्यापार बढाने के तरीके हैं.. और सफल भी हैं..
लोगों को दिल का भुलावा देकर बड़े ही आराम से उल्लू सीधा किया जाता है और लोग करवाते भी है !
खैर जो बन रहे हैं.. बनिए.. और जो नहीं बन रहे हैं वो ही सच्चे "बनिये" हैं !!

पर फिर भी सोच रहा था की आजकल सिंगल एंड हैप्पी का चलन क्यों चला है?
मैं पुरुष सोच के हिसाब से यही कहूँगा :
लड़कीदोस्त(गर्लफ्रेंड) होती है तो खर्चे बढ़ जाते हैं.. फ़ोन भी आप ही करते हैं.. मिलने भी आप ही जाते हैं.. मूवी की टिकट भी आप ही को खरीदीनी पड़ती है.. खाने का बिल भी आप ही को देना पड़ता है.. सौ नखरे भी आप ही को सहने पड़ते हैं.. और कभी धरे गए तो पिटाई भी आप ही कि होती है.. उधर उसका भाई और इधर आपके पिताजी !
तो बात यह बनती है कि किसी लड़की के प्रवेश करने से अगर आपकी ज़िन्दगी इतनी नाकारा हो जाती है तो बेहतर है कि प्रवेश द्वार बंद ही रखी जाय.. इसीलिए लोग कहते हैं.. सिंगल एंड हैप्पी.. मैं भी (फिलहाल) इस बात को मानता हूँ..

तो अगर प्यार करना है तो यही गाना गाते हुए करिए - "जब प्यार किया तो डरना क्या" और मार खाते वक़्त भुनभुनाईयेगा - "मार डाला" ...
और अगर नहीं करनी है तो ये गाना गाइए - "है अपना दिल तो आवारा" .. या फिर सुनिए - "है अपना दिल तो आवारा मेरी आवाज़ में" ...

और जो लोग आज़ादी दिवस मानना चाहते हैं उनसे कहूँगा कि देश को आज़ाद करिए.. आप खुद आज़ाद हो जाएँगे.. पुणे में बम धमाके हुए हैं.. थोड़ा प्यार उधर भी बाँट दीजियेगा.. पैसों से बाहर के घाव भरते हैं.. अन्दर के नहीं..
प्यार करना है तो हर इंसान से करो... एक अलग अनुभूति होगी..
हो सकता है आतंकवाद भी ख़तम हो.. कोशिश करते रहिये..

बाकी तो व्यापार बढ़ ही रहा है और लोग बन ही रहे हैं.. !!

जय राम जी की.. खुदा हाफिज़..

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

ओ साथी रे

अभी लिखने की इच्छा नहीं है.. अभी बेरोजगार हूँ तो ये आलम है.. जब रोज़गार पा जाऊंगा तो पता नहीं कैसे लिखूंगा..
खैर इस पोस्ट में केवल एक गाना पोस्ट कर रहा हूँ.. पसंद आये तो बताइयेगा..

गाना यहाँ से सुनिए : ओ साथी रे (प्रतीक माहेश्वरी)
बोल यहाँ पर देखें : ओ साथी रे (मुक़द्दर का सिकंदर)

आदाब
आपकी शुभकामनाओं के इंतज़ार में..
प्रतीक

रविवार, 24 जनवरी 2010

जैसे को तैसा..

आज कुछ पढ़ रहा था अंतरजाल पर.. बहुत ही अच्छी कहानी.. कुछ कुछ सच भी.. तो सोचा कि आप सभी के साथ बाटूँ..
कहानी कुछ ऐसी थी:
एक बुज़ुर्ग अपने बेटे के यहाँ रहने गया, विलायत...
बेटे की शादी हो चुकी थी और बेटा भी था, ४ साल का..
बुज़ुर्ग पर उम्र काफी हावी हो चुकी थी.. नज़र कमज़ोर और शरीर भी.. जब शाम को वो सबके साथ खाने पे बैठता था तो कांपते हाथों और बेजान नज़रों से खाने की नाकाम कोशिश करता..
कभी चम्मच गिरता तो कभी खाना..
कभी बेटे से कहा नहीं कि अब ये शरीर बूढ़ा हो चला है इसलिए ऐसा होता है.. सोचता था जैसे बचपन में बेटे के बिना बताए ही उसके दर्द का एहसास होता था, वैसे उसके बुढ़ापे में भी हो... पर ऐसा कभी न हुआ..
यहाँ तो मामला उल्टा पड़ गया.. हर दिन की तोड़-फोड़ और टेबल पर गन्दगी से परेशान पिता को अलग बिठा दिया गया.. नीचे.. और अब उनके हाथ में लकड़ी की कटोरी और थाल रख दी जाती.. ताकि चीज़ें ना टूटे..
पिता मरता.. क्या करता.. चुपचाप रोते-धोते खाना खाता.. खट-खट करते.. पर किसी को मतलब नहीं..

एक दिन बेटा ऑफिस से घर आया तो देखा कि उसका बेटा लकड़ी से कुछ बना रहा है..
पूछा तो ४ साल के बच्चे ने कहा - "आप दोनों के लिए बना रहा हूँ.. बुढ़ापे के लिए.." और फिर अपने काम में लग गया..
जब बेटे की बात सुनी तो मियाँ-बीबी हतप्रभ! शर्म के मारे किसी ने कुछ नहीं कहा..

तब से अंतिम सांस तक बूढा पिता परिवार के साथ टेबल पर बैठकर खाना खाता था..
अब किसी को कोई परेशानी नहीं है.. ज़िन्दगी चल रही है.. और सिखा रही है.. :जैसे को तैसा.. ||


कहानी का सार यह है:
जिन हाथों को पकड़ कर चलना सिखाया,
उस हाथ ने ही पीछे से वार किया..
जिसको ढंग से बोलना सिखाया,
उसने बात करना ही छोड़ दिया..
सोचा था दिल से दिल मिला रहेगा,
पर तूने तो दिल को ही झंकझोड़ कर रख दिया,

मत भूल की एक दिन तू भी किसी का पिता होगा,
जो वो देखेगा, वही सोचेगा, वही करेगा,
अगर तुझे भी किसी दिन कुछ ऐसा कश्मकश हो..
तो आ जाना मेरे बेटे मेरे पास..
तेरे लिए मेरा घर खुला है..खुला ही रहेगा..

ज़बरदस्त गीत : नूर-ए-खुदा पढ़िये..

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मुझे नौकरी चाहिए..

कैम्पस पर वापस आ कर घर जैसा लग रहा है.. जहाँ किसी बात की कोई चिंता नहीं है.. जब मन करे सो जाओ.. और जब मन करे, उठो..खाना खाया? कोई पूछने वाला नहीं.. नहाया? कोई पूछने वाला नहीं.. और ना ही पूछने वाली :)
यहाँ से दूर रहकर ज़िन्दगी कैसी होती है.. इसका अंदाज़ा तो हो ही गया है..बहुत मुश्किल है पर वहीँ जाना है चंद दिनों बाद.. पर कल की किसे चिंता है.. हमारा उसूल है.. आज को जियो... कल की नैया तो राम भरोसे..

नौकरी.. एक ऐसा शब्द जो भारत के सौ करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में आज भी एक मज़ाक सा है..
ग्रैजुएट सब्जी बेच रहा है और पांचवी फेल देश... असमंजस कर देने वाली सच बात..
कुछ वही हाल यहाँ के हर इंजिनियर के हाल चाल हैं.. पिछले ४ साल में जो पढ़ा उसको डालो कचरे के डब्बे में डालो.. अगर कंप्यूटर पे प्रोग्रामिंग आती है तो चयन होता है नहीं तो.. छोड़िये.. वैसे शब्द का इस्तेमाल करना ही बेकार है..
आज बैठे-बैठे सोच रहा हूँ कि अगर नौकरी केवल प्रोग्रामिंग से ही लगती है तो दूसरी जगह फ़ालतू ही मेहनत की (जितनी भी की हो :P)..

पर किस्मत में जो लिखा है वो मिलेगा.. रोना सिखा नहीं है और ना ही किसी को यह हिदायत दूंगा..
बचपन में कहते थे - क्या लड़कियों की तरह रो रहा है?
आज भी कहूँगा - क्या पराजितों की तरह रो रहा है?

तो जनाब आपकी शुभकामनाओं की ज़रूरत है कि जल्द ही हम भी नौकरी वाले बाबू हो जाएं.. ब्लॉग पर भी कुछ डालने के लिए समय मिलेगा और आप सभी से रूबरू हो पाऊंगा..
तब तक कार के लिए मेहनत कर रहा इस बेकार इंजिनियर के लिए दुआ करते रहिये..
आदाम.. सायोनारा..

शनिवार, 9 जनवरी 2010

अँधा कौन ?

बचपन उस अंधे को देखकर यौवन हो गया था...
जब अंकुर अपनी माँ के साथ मंदिर से बाहर आता तो उसे देख कर विस्मित हो जाता.. उसे दुःख होता...
एक दिन वह अपने दुःख का निवारण करने उस अंधे के पास पहुंचा..

पहुंचा और बोला - "बाबा, अँधा होने का आपको कोई गम है?"
अँधा बोला - "बेटा, यह दुःख बताने का नहीं.. यह आँखे किसी बच्चे की हंसी देखने को तरसती है, एक युवती के लावण्य के सुख को तरसती हैं, एक बुज़ुर्ग के बुजुर्गियत की लकीरें उसके चेहरे पे देखने को तरसती हैं... और हाँ इस धरती.. नहीं नहीं स्वर्ग को देखने को तरसती है.. बहुत दुःख है.. पर किस्मत खोटी है बेटा.. "

अंकुर आगे बढ़ गया..
वो सोच रहा था - "क्या अँधा होना इतना बुरा है?"

समय भी बढ़ता रहा...

अंकुर अब बड़ा आदमी हो गया.. पर विपरीत इसके, दुनिया में हर चीज़, लोगों की सोच जैसी छोटी हो रही हैं...
आज अंकुर अपनी पत्नी के साथ मंदिर आया है...
वो अँधा वहीँ हैं.. उसकी तरक्की नहीं हुई है.. इतने वर्षों तक भगवान के घर के सामने हाथ फैलाना व्यर्थ ही रहा.. ठीक ही कहा है - "भगवान भी उसकी मदद करता है जो खुद की मदद करे"

अंकुर आज फिर रुका और फिर से वही प्रश्न किया - "बाबा, अँधा होने का आपको कोई गम है?"
अंधे ने आवाज़ पहचान ली... बोला बाबू शायद आप बड़े हो गए हैं... आवाज़ से पता चलता है.. पर अब मैं बहुत खुश हूँ.. जहाँ बच्चों के चेहरों पर बस्ते का बोझ झलक रहा है, जहाँ एक-एक युवती के लावण्य पर प्रहार होते देर नहीं लगती, जहाँ बुजुर्गों की बुजुर्गियत वृद्धाश्रम में किसी कोने में पान की पीक के पीछे धूल चाट रही है... जहाँ ये धरती नर्क बन रही है.. वहां आज मैं बहुत खुश हूँ की भगवान को आँखें "देने" के लिए नहीं कोस रहा हूँ.. आज आँखें होती तो ऐसी चीज़ों को देखकर खुद ही आँखें फोड़ लेता... आज मैं खुश हूँ.. किस्मत बहुत अच्छी है बेटा.."
अंकुर आगे बढ़ गया..

वो सोच रहा था - "क्या अब अँधा होना अच्छा है?"