नया क्या?

सोमवार, 21 अप्रैल 2008

कोई लौटा दे...

यह कविता मेरे उस बचपन की याद में लिखी गई है जिसे याद करके मैं आज भी कभी-कभी सिहर उठता हूँ | हाँ,मैं आज भी जब अकेले कभी बैठा होता हूँ तो मुझे वो मासूम चेहरा याद आता है और बस अपने कन्धों से अपनी आंखों को पोंछ भर लेता हूँ | मैं यह नहीं कहता हूँ कि आज हम जिस राह पर हैं. वो कतई भी अच्छा नहीं है | नहीं, यह हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है जिससे हर एक इन्सान को गुज़रना होगा | लेकिन एक बात तय है कि हम जितने निश्छल उस समय थे, आज शायद कमी हमारे अन्दर ज़रूर है | आज हमारी हर एक सोच में कुछ दुर्भावना ज़रूर होती है जिसे मिटाने की ज़रूरत समय की एक आवश्यक मांग है, इस दुनिया की..."हमारी" दुनिया की |

इस कविता की शुरुआत दिसम्बर 2007 में हुई थी जब मैं ट्रेन में दिल्ली से घर जा रहा था |
और ख़ास बात यह है कि उस समय मैंने इसे अपने मोबाइल में टाइप करना शुरू किया था जो की आज आप देख रहे हैं कि आपके सामने कितनी लम्बी कविता के रूप में प्रस्तुत है |


सुबह से मन कचोट रहा है,
कुछ खोये हुए लम्हों को ढूँढ रहा है,
आज फ़िर रोने का दिल कर रहा है,
आज फ़िर जिद करने का दिल कर रहा है,
आज वो लोरी याद आ रही है,
पलकों पे अश्क ठहरे जा रही है,
वो चलने की कोशिश में बार-बार गिरना,
गिर-गिर के भी बार-बार कोशिश करना,
वो ज़ोर-ज़ोर से बिंदास गाना गाना,
वो नए-नए पोज़ में फोटो खिंचवाना,
वो माँ का गोद में खिलाना,
वो पापा का सख्त हाथों से सहलाना,
वो दादा-दादी का प्यार से बाबू कहकर बुलाना,
और हमारा चॉकलेट लेकर फ़िर से भाग जाना |

हर सुबह स्कूल जाने से पहले रूठना,
और स्कूल पहुँचते ही सब कुछ भूलना,
आज याद आ रहा है वो स्कूल का Lunch-Time,
और थोड़ी सी अनबन के बाद का Punch-Time,
वो हर एक Punch के बाद कट्टी हो जाना,
और दूसरे दिन उसी मासूमियत से अब्बा हो जाना,
वो छुट्टी के बाद दिल खोल के चिल्लाना,
और घर पहुँचते ही सीधे T.V. चलाना,
माँ का ज़ोर से डाँटना-डपटना,
और Tuition-Teacher के आते ही मुंह का लटकना,
वो हर दिन जा कर मैदान में कबड्डी खेलना,
और घर लौटकर चुपके से कपडों के दाग साफ करना,
वो माँ के हाथों से बनाये खाने पे नाराज़गी जताना,
और फ़िर बाहर खाना खाने की जिद पे अड़ना |

वो शाम को कॉलोनी के बच्चों के साथ,
छुपम-छुपाई, पकड़ा-पकड़ी, London Bridge हाथों में हाथ,
फ़िर रात में चैन की नींद सोना,
और सुबह माँ के जगाने पर ही उठाना |

हर Sunday का बेसब्री से इंतज़ार,
और घुल-मिल कर मनाना हर एक त्यौहार,
बड़ों के सामने ऊँची बोली में ना बोलना,
और छोटों से भी प्यार से बात करना |

वो कौन सा पल था जब हमने कहा की हम बड़े हो गए हैं,
सब की नज़र में समझदार हो गए हैं,
मैं फ़िर से उस पल में जाना चाहता हूँ,
और उसे अपनी ज़िन्दगी से मिटा देना चाहता हूँ |

बड़े क्या हुए शायद हँसी ही कहीं गुम हो गई है,
रोने की बात तो यह है कि आज ठीक से रो भी नहीं पाते हैं,
लोरियां तो केवल फिल्मों में ही रह गई है,
और अब तो जिद करने से भी घबराते हैं,
गाना तो केवल बाथरूम में ही होता है,
हर फोटो में बस बनावट झलकता है |

एक बार गिरे तो समझो जीवन का अंत है,
एक बच्चे नज़र से देखो तो वो भी अनंत है,
माँ तो केवल खाने पर ही याद आती है,
हैलो, पापा, फीस भर देना नहीं तो fine लग जाती है,
आज दादा-दादी हैं हमारे दिल से कोसों दूर,
प्यार के मोती हुए चकनाचूर |

आज कॉलेज जाने से पहले.....ओहो..जाते ही कहाँ हैं?
Lunch-Time व्यस्त Time-Table में बसा है,
छुट्टी होने पर सीधे रेडी पर आना,
और कमरे में पहुँचते ही कंप्यूटर चलाना,
खेल तो केवल AOE और CS ही रह गए हैं,
मिलने के नाम पर केवल Gtalk और Orkut ही बच गए हैं,
रात में सोने का कुछ भी नहीं है ठिकाना,
सुबह क्या उठना, क्या नहाना ?
Sundays तो अब Girl/Boy Friend के नाम हो गए हैं,
और त्यौहार के नाम पर OASIS/BOSM/APOGEE ही रह गए हैं,
अपशब्दों का इस्तमाल गर्व के साथ होता है,
और बेचारा मन भीतर ही भीतर रोता है |

वो Time-Machine कहाँ से लाऊँ ?
वो सादगी कहाँ से लाऊँ ?
वो मधुरता कहाँ से लाऊँ ?
वो मासूमियत कहाँ से लाऊँ ?

ज़िन्दगी में एक मकसद ज़रूर हो,
वो हँसी, वो रोना, वो मासूमियत, वो बचपन,
कभी हमसे जुदा ना हो |
कभी हमसे जुदा ना हो |

धन्यवाद
-प्रतीक

5 टिप्‍पणियां:

  1. This is by far one of the best poems that i hav read...."reflecttions" i shud say...reflectoins of the past in the mirror of present waiting for the future!!!
    Hats off to u PM!!!

    one last comment...u shud seriously start writing...for u may smday become a famous author....aur agar asia hua...to release hone wali pehli copy main lunga!!!!

    --GM

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  2. London Bridge हाथों में हाथ,
    ----------------------------------
    धन्यवाद आपकी टीप्पणी के लिये प्रतीक भाई और इन खेलोँ के बारे मेँ और बचपन की यादोँ पर भी लभी लिखिये
    आपकी कविता ने
    बचपन के सुहाने दिनोँ को
    फिर ताज़ा कर दिया -
    यूँ ही लिखते रहेँ ..
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  3. वो चलने की कोशिश में बार-बार गिरना,
    गिर-गिर के भी बार-बार कोशिश करना,
    bade ho kar girne ka darr badh jata hai


    वो Time-Machine कहाँ से लाऊँ ?
    वो सादगी कहाँ से लाऊँ ?
    वो मधुरता कहाँ से लाऊँ ?
    वो मासूमियत कहाँ से लाऊँ ?

    ज़िन्दगी में एक मकसद ज़रूर हो,
    वो हँसी, वो रोना, वो मासूमियत, वो बचपन,
    कभी हमसे जुदा ना हो |
    कभी हमसे जुदा ना हो |


    bahut khubsurat
    kavita padh kar mann me aa raha hai ki kaash wo time machine mil jaye :)

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