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शनिवार, 13 नवंबर 2010

अनमोल अजन्मी कन्याएं

भोला भागता हुआ कमरे में घुसा और साँसों ही साँसों में एक वज्र मार गया..
"बाबा, जायदाद के लिए फिर से हाथापाई हो गयी और गौतम ने जीतू भैया को गोली मार दी!!"

इतना सुनना था कि बाबा और माँ पवन की वेग से गाड़ी में चढ़ कर जीतू के घर पहुंचे..
वहां अफरा-तफरी मची हुई थी और इसी बीच जीतू को अस्पताल ले जाया गया...
करीब ३-४ घंटों की मशक्क़त के बाद डॉक्टरों ने जवाब दे दिया..

पुलिस केस हुआ और गौतम को अपने बड़े भाई के क़त्ल के जुर्म में जुर्माने के साथ १० साल की कैद हुई...

घटना के कई दिनों बाद बाबा माँ के साथ बरामदे में बैठे थे.. दोनों में एक समझी-बुझी चुप्पी थी..
तभी बाबा बोले - "जीतू की माँ, अगर इन दो नालायकों के लिए हमने उस समय परिवार और समाज के दबाव में तेरे कोख में पल रही दो कन्याओं का क़त्ल किया था, तो सबसे बड़े गुनहगार तो हम हैं... काश हमारे बेटियाँ होती.."

और दोनों की आँखों से दो बूँद आंसू, धूप से तपती गर्म फर्श पे गिर के उन अजन्मी कन्याओं की तरह मर गए...

फोटो श्रेय: http://www.stolenchildhood.net

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर सन्देश देती कथा...... कम शब्दों में कही आज दौर की हकीकत.....

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  2. एक गंभीर सामाजिक समस्या को आपने अपनी लघु कथा के माध्यम से बहुत ही सुन्दर रूप में प्रकट किया है.... लिखते रहिये

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  3. इतनी छोटी कहानी और इतनी गहरी बात!

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  4. .

    Now a days, there are strict rules against female foeticide.

    .

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  5. निशब्द मगर कड़वा सच! आपकी यह लघु कथा मन को कहीं गहरे तक कचोट गयी.

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  6. आपकी लघु कथा ने झकझोर दिया .....शुक्रिया

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  7. सच्चाई को बेनकाब करती हुई पोस्ट !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  8. बेशक : काबिल-ए-दाद
    पुरकशिश सार्थक लघु कथा

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