काफी दिन हो गए कुछ लिखे हुए.. आपसे गुफ्तगू किये हुए.. काफी व्यस्त था नौकरी की खोज में और आखिर में मैं भी बाबू बन ही गया.. आप सभी की दुआ के लिए शुक्रिया..
मैं कभी भी सोच कर नहीं लिखता हूँ.. कभी मेरे आस-पास कुछ होता है तो लिखता हूँ.. यूँ कहें कि लिखते-लिखते सोचता हूँ और सोचते-सोचते लिखता हूँ..
पहली नौकरी लगी है और यह ख़ुशी शायद ही किसी दूसरी ख़ुशी से बढ़कर हो.. घरवाले भी खुश और हम तो ५० गुना ज्यादा खुश उनको देख कर.. मेरे काफी दोस्तों को भी नौकरी मिल चुकी है और अब बस महिना भर और रहता है जब सब अपने-अपने रास्ते इस ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल हो जाएँगे जहाँ कोई किसी का भाई, दोस्त, यार नहीं होता है.. यह कातिल ज़माना है.. आप कमज़ोर पड़े, आप मारे गए..
बस यही सोच कर कोशिश कर रहा हूँ कि कुछ और दिन मैं अपनी ज़िन्दगी जी लूं.. बाद में तो इसे कंपनी वालों को हवाले करना ही है..
दो दिन पहले हमारे कैम्पस पे अंतरजाल बहुत धीमा हो गया था.. मानिए शुन्य के बराबर कि गति रही होगी अंतरजाल की.. तब जब सबके चेहरे देखते तो लगता कि हमें लकवा मार गया है.. पता नहीं क्यों पर आजकल आपके जिंदा होने का मापदंड अंतरजाल में जीवित रहने के समान हो गया है.. आप कितनी देर अंतरजाल पर रहते हैं, इससे आपकी दिनचर्या का हिसाब-किताब लगाया जाता है..
जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह अंतरजाल का भी है.. अच्छा और बुरा..
आज अंतरजाल ही है जिसके कारण चीज़ों, बातों, ज्ञान का आदान-प्रदान इतना आसान हो गया है.. मैं-आप चर्चा कर रहे हैं.. मैं यह पोस्ट आप तक पहुंचा पा रहा हूँ.. दुनिया छोटी हो गयी है..
पर वहीं दूसरी ओर जब सोचता हूँ कि आज हमारी ज़िन्दगी अगर अंतरजाल से तुलने लगी है.. इसके बिना अगर हम अपाहिज हैं.. अगर इसके कारण हम अपने कमरों को छोड़कर खुली हवा खाने को भी तैयार नहीं हैं.. अगर छोटी दुनिया के साथ-साथ हमारी सोच भी छोटी हो गयी है.. अगर हमारी दिनचर्या इतनी खराब हो गयी है कि कब उठना है, कब सोना है, कब खाना है..इसका अता-पता नहीं है.. अगर दोस्त केवल आभासी (वर्चुअल) हो गए हैं.. अगर हमारी अनुभूति का दम घुट चुका है.. अगर हमारी आत्मा मर चुकी है.. अगर !!
तो क्या फायदा हुआ इसका? तो क्या फायदा हुआ इस महाआविष्कार - अंतरजाल का?
कहीं तो कुछ कमी रह गयी है.. और सच मानिए कमी कभी भी बाहर नहीं होती.. अन्दर ही है.. हमारे अन्दर..
आज मैंने अपने कुछ दोस्तों से १० मिनट खाने के बाद घूमने चलने को कहा..सबने मना कर दिया.. क्यों? कोई कारण नहीं है.. सबके पास नौकरी है.. अब किसी को कुछ नहीं करना है कम-स-कम १ महिना तो.. फिर इतनी उदासीनता क्यों? आज आत्मा मर क्यों गयी है सबकी? क्यों हम वो पहले साल वाले नए-जोशीले छात्र नहीं रहे हैं जब एक बात पर कैम्पस के चार चक्कर लगाने में एक हिचक भी न होती थी? क्यों?
क्योंकि सबके कमरे में एक-एक लैपटॉप है.. क्योंकि सबके पास अंतरजाल है.. क्योंकि सबके पास डी.सी. (१ ऐसा सॉफ्टवेर जिसके जरिये कैम्पस पे कम-स-कम 40Tb डेटा शेयर होता है जिसमें हजारों फ़िल्में, वृत्तचित्र (डॉक्यूमेन्टरी), गाने और भी बहुत कुछ मौजूद है) है.. सबके पास इतना वक़्त ज़रूर है कि वो ३-३ घंटे बैठकर फ़िल्में देख सकें पर अगर ३० मिनट अपने दोस्त को समय देने को कहें तो नाक-भौं सिकुड़ उठे !!
और यही नहीं, आजकल तो आई.पी.एल. का नया हरदिन-प्रतिदिन नौटंकी शुरू हुआ है जो कि किसी सास-बहु सीरियल के लत से कम नहीं है.. लोग इन्हें देखना ज्यादा पसंद करते हैं.. बजाय इसके कि बाहर जा कर खेलें.. कॉलेज में अगर कोई प्रोग्राम हो रहा हो तो उसमें शामिल हो.. लोगों के लिए क्रिकेट उनकी अपनी ज़िन्दगी से बड़ा हो चुका है.. मैं तो कहता ही नहीं हूँ कि मेरे लिए चल लो बाहर.. मेरे लिए ये प्रोग्राम में आ जाओ.. मैं तो कहता हूँ कि कुछ दिन और हैं कॉलेज में.. तुम उसे जी लो.. बाहर निकलो.. कमरों से निकलों नामुरादों.. कब तक एक कीड़े की ज़िन्दगी जियोगे? और कीड़े की ज़िन्दगी तो शुरू होने ही वाली है.. एक भीरु की ज़िन्दगी कब तक जीते रहोगे.. आस-पास की दुनिया देखो.. कैम्पस बहुत हसीं है.. जितनी गालियाँ देनी थी वो तो दे ली हैं.. पर एक शर्त लगा लो.. अगर ऐसा माहौल.. अगर ऐसी शान्ति आज के बाद मौत के अलावा और अगर कहीं मिले तो एक बार मुझे ज़रूर कहना.. जो कहोगे करूँगा..
फ़िल्में तो ज़िन्दगी भर देखोगे.. गाने ज़िन्दगी भर सुनोगे.. पर आज जो मौका है बेवकूफी करने का.. नौटंकी करने के.. दोस्ती करने का.. दोस्तों के साथ रहने का.. आज़ाद रहने के.. यह फिर नहीं आएगा..
बहुत दुःख होता है जब लोगों की घुटती हुई आत्माओं को देखता हूँ हॉस्टल के कमरों में.. जिंदा लाश से ज्यादा कुछ नहीं है वो.. और जब यह लाश अपने दोस्तों, अपने करीबियों की होती है तो बेहद दुःख होता है.. चीरता हुआ अन्दर से.. किस-किसको समझाऊंगा मैं? कौन सुनेगा मेरी? फिल्मों के तेज़ शोरगुल में मेरी आवाज़ गुम हो गयी है.. उस लैपटॉप की रौशनी में वो पहले साल का खिलखिलाता हुआ चेहरा गायब हो गया है.. बहुत दर्द है.. पर कोई उसे महसूस कर सके तब..
ऐसी घुटन वाली ज़िन्दगी मत जियो.. उस कीड़े की तरह मत जियो जो रात भर बल्ब के आस-पास मंडराकर मर जाता है.. सिर्फ एक बार मेरी आवाज़ सुन लो.. सिर्फ एक बार उस भोले से चेहरे को याद कर लो.. सिर्फ एक बार ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की तरह जियो.. सिर्फ एक बार !
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बुधवार, 14 अप्रैल 2010
सिर्फ एक बार !
बुधवार, 10 मार्च 2010
एक महत्त्वपूर्ण संकल्प
ठीक साल भर बाद इसी दिन एक और पोस्ट..
पता नहीं इस दिन क्यों लिखना चाहता हूँ पर चाहता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ..
पर इस बार कुछ अलग.. बदलाव आवश्यक है और निरंतर है.. एक साल में मैं भी बदला हूँ, दुनिया भी..
बिट्स में भी बदलाव आ रहा है.. आशा है अच्छे के लिए ही आये..
पर इस दिन मैं भी कुछ बदलाव लाने कि कोशिश करूँगा.. किसी और में नहीं, खुद में.. कुछ बातें जो मन को खाए जा रही हैं उनको पचाना है.. और कुछ अलग करना है..
आज के दिन संकल्प लेता हूँ कुछ ऐसा करने का जो कि सभी कि यादों में बस जाए.. यह संकल्प बिट्स-पिलानी के लिए है और इसका श्री गणेश आज ही होगा.. कुछ और भी है मन में जिनको करने की इच्छा है पर सबसे पहले आप सभी के लिए मेरा प्रमुख कार्य यह संकल्प ही रहेगा जो आप सभी के सामने मैं जल्द ही लाने की कोशिश करूँगा..
आप सभी के आशीर्वाद और प्रेम की चाह में मैं अपने कार्य में जुट रहा हूँ और आशा करता हूँ कि अगले पोस्ट तक मैं अपना संकल्प पूरा करने में कामयाब रहूँ..
पिछले साल इसी दिन, इसी समय यह पोस्ट किया था.. इसे भी पढ़ सकते हैं..
तब तक के लिए,
आदाब, सायोनारा !
पता नहीं इस दिन क्यों लिखना चाहता हूँ पर चाहता हूँ इसीलिए लिख रहा हूँ..
पर इस बार कुछ अलग.. बदलाव आवश्यक है और निरंतर है.. एक साल में मैं भी बदला हूँ, दुनिया भी..
बिट्स में भी बदलाव आ रहा है.. आशा है अच्छे के लिए ही आये..
पर इस दिन मैं भी कुछ बदलाव लाने कि कोशिश करूँगा.. किसी और में नहीं, खुद में.. कुछ बातें जो मन को खाए जा रही हैं उनको पचाना है.. और कुछ अलग करना है..
आज के दिन संकल्प लेता हूँ कुछ ऐसा करने का जो कि सभी कि यादों में बस जाए.. यह संकल्प बिट्स-पिलानी के लिए है और इसका श्री गणेश आज ही होगा.. कुछ और भी है मन में जिनको करने की इच्छा है पर सबसे पहले आप सभी के लिए मेरा प्रमुख कार्य यह संकल्प ही रहेगा जो आप सभी के सामने मैं जल्द ही लाने की कोशिश करूँगा..
आप सभी के आशीर्वाद और प्रेम की चाह में मैं अपने कार्य में जुट रहा हूँ और आशा करता हूँ कि अगले पोस्ट तक मैं अपना संकल्प पूरा करने में कामयाब रहूँ..
पिछले साल इसी दिन, इसी समय यह पोस्ट किया था.. इसे भी पढ़ सकते हैं..
तब तक के लिए,
आदाब, सायोनारा !
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
मुझे नौकरी चाहिए..
कैम्पस पर वापस आ कर घर जैसा लग रहा है.. जहाँ किसी बात की कोई चिंता नहीं है.. जब मन करे सो जाओ.. और जब मन करे, उठो..खाना खाया? कोई पूछने वाला नहीं.. नहाया? कोई पूछने वाला नहीं.. और ना ही पूछने वाली :)
यहाँ से दूर रहकर ज़िन्दगी कैसी होती है.. इसका अंदाज़ा तो हो ही गया है..बहुत मुश्किल है पर वहीँ जाना है चंद दिनों बाद.. पर कल की किसे चिंता है.. हमारा उसूल है.. आज को जियो... कल की नैया तो राम भरोसे..
नौकरी.. एक ऐसा शब्द जो भारत के सौ करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में आज भी एक मज़ाक सा है..
ग्रैजुएट सब्जी बेच रहा है और पांचवी फेल देश... असमंजस कर देने वाली सच बात..
कुछ वही हाल यहाँ के हर इंजिनियर के हाल चाल हैं.. पिछले ४ साल में जो पढ़ा उसको डालो कचरे के डब्बे में डालो.. अगर कंप्यूटर पे प्रोग्रामिंग आती है तो चयन होता है नहीं तो.. छोड़िये.. वैसे शब्द का इस्तेमाल करना ही बेकार है..
आज बैठे-बैठे सोच रहा हूँ कि अगर नौकरी केवल प्रोग्रामिंग से ही लगती है तो दूसरी जगह फ़ालतू ही मेहनत की (जितनी भी की हो :P)..
पर किस्मत में जो लिखा है वो मिलेगा.. रोना सिखा नहीं है और ना ही किसी को यह हिदायत दूंगा..
बचपन में कहते थे - क्या लड़कियों की तरह रो रहा है?
आज भी कहूँगा - क्या पराजितों की तरह रो रहा है?
तो जनाब आपकी शुभकामनाओं की ज़रूरत है कि जल्द ही हम भी नौकरी वाले बाबू हो जाएं.. ब्लॉग पर भी कुछ डालने के लिए समय मिलेगा और आप सभी से रूबरू हो पाऊंगा..
तब तक कार के लिए मेहनत कर रहा इस बेकार इंजिनियर के लिए दुआ करते रहिये..
आदाम.. सायोनारा..
यहाँ से दूर रहकर ज़िन्दगी कैसी होती है.. इसका अंदाज़ा तो हो ही गया है..बहुत मुश्किल है पर वहीँ जाना है चंद दिनों बाद.. पर कल की किसे चिंता है.. हमारा उसूल है.. आज को जियो... कल की नैया तो राम भरोसे..
नौकरी.. एक ऐसा शब्द जो भारत के सौ करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में आज भी एक मज़ाक सा है..
ग्रैजुएट सब्जी बेच रहा है और पांचवी फेल देश... असमंजस कर देने वाली सच बात..
कुछ वही हाल यहाँ के हर इंजिनियर के हाल चाल हैं.. पिछले ४ साल में जो पढ़ा उसको डालो कचरे के डब्बे में डालो.. अगर कंप्यूटर पे प्रोग्रामिंग आती है तो चयन होता है नहीं तो.. छोड़िये.. वैसे शब्द का इस्तेमाल करना ही बेकार है..
आज बैठे-बैठे सोच रहा हूँ कि अगर नौकरी केवल प्रोग्रामिंग से ही लगती है तो दूसरी जगह फ़ालतू ही मेहनत की (जितनी भी की हो :P)..
पर किस्मत में जो लिखा है वो मिलेगा.. रोना सिखा नहीं है और ना ही किसी को यह हिदायत दूंगा..
बचपन में कहते थे - क्या लड़कियों की तरह रो रहा है?
आज भी कहूँगा - क्या पराजितों की तरह रो रहा है?
तो जनाब आपकी शुभकामनाओं की ज़रूरत है कि जल्द ही हम भी नौकरी वाले बाबू हो जाएं.. ब्लॉग पर भी कुछ डालने के लिए समय मिलेगा और आप सभी से रूबरू हो पाऊंगा..
तब तक कार के लिए मेहनत कर रहा इस बेकार इंजिनियर के लिए दुआ करते रहिये..
आदाम.. सायोनारा..
गुरुवार, 14 मई 2009
प्यार, यार, वार !!
पिछले एक पोस्ट में मैंने बिट्स में भारतीय संस्कृति को बचाए रखने पर यहाँ के छात्रों की तल्लीनता पर प्रकाश डाला था पर आज अफ़सोस कि एक अँधेरा सा छा रहा है उस पोस्ट पर, इस संस्कृति पर और हमारी काबिलियत पर |
आज हमारे फाईनल एक्ज़ाम ख़त्म हुए हैं और तभी फुर्सत में ये पोस्ट आपके सामने आ रहा है |
एक्ज़ाम ख़त्म होने की ख़ुशी में और विद्युत अभियंता बनने का सुरूर तो हम सब पर चढ़ा ही है और इसी को जश्न में तब्दील करने के लिए हम हमारे कैम्पस में कनॉट में खाना खाने गए | बातें चल रही थी और जो बातें आजकल सबसे ज्यादा आम है, लड़का-लड़की, दोस्त-दोस्ती, वही सब चल रहा था | कोई किसी का किसी के साथ होने पर खुश था और कोई किसी की कुछ अनसुनी बातें बुझा रहा था | बात इतनी आम हो चुकी है कि राह चलते भी बस यही बातें | मौका मिले और हम शुरू हो जाएं | अब साहब इस उम्र में नहीं तो फिर कब करेंगे ? पर हाँ एक बात तो तय है | हमें आजकल ऐसी बातें करने में ज्यादा मज़ा आता है और जब भी कोई गंभीर विषय की बात होती है तो वहां से किनारा काटने में ही अपनी भलाई समझते हैं |
कुछ लोग कैम्पस में बढ़ते गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड ट्रेंड को लेकर चिंतित थे | बात यह नहीं की यह ठीक नहीं है पर उनका कहना है कि हर किसी रिश्ते में एक सीमा और मर्यादा होती है जिसे लांघना न केवल उस रिश्ते को पर पूरे समाज की स्थिति को भी धूमिल करता है |
कैम्पस के कुछ ऐसे वाकये सामने आए जो मैंने भी पहले नहीं सुने थे और सुनकर तो मैं भी शर्मसार हो उठा | लोगों के लिए यह एक फैशन बन गया है और इस फैशन की चका-चौंध में आँखें सभी की चुंधिया गयी हैं | इन 20-22 साल के थोड़े परिपक्व और तेज़ युवाओं ने हर सीमा का उल्लंघन करने का शायद मन बना लिया है | इनमें से ज्यादातर लोगों को यह भी पता नहीं चलता है की इस चुन्धियाने वाले फैशन में वो सार्वजनिक जगहों पर कुछ ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें फंकी लगता है और जो उन्हें यह झूठा एहसास दिलवाता है कि उनका स्तर बाकी लोगों से ऊंचा है |
जब मेरे दोस्तों ने 2-3 ऐसे किस्से सुनाए तो लगा की अभी तो ना जाने कितने अनकहे-छुपे किस्से हमें नहीं पता है और इन 2-3 किस्सों ने ही दिल को जैसे झकझोर कर रख दिया है | माफ़ कीजियेगा मैं उन सब वाकयों को यहाँ सबके समक्ष लाकर खुद को शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ |
वैसे इस पोस्ट को पढ़ने वाले यह सब तो समझते ही होंगे की मैं कैसे अंधेपन की बात कर रहा हूँ जो इस युवा पीढ़ी को विवेकशून्य बना रही है | आज जब मैं कॉलेज में अपने प्रथम वर्ष और इस तृतीय वर्ष के अंत को तुलनात्मक रूप में देखता हूँ तो लगता है कि मैं वैसे ही ठीक था और यह कॉलेज भी |
प्यार-मोहब्बत-इश्क तो खुदा की एक हसीन देन है जो उस मासूम बच्चे की हंसी समान मधुर और सौम्य है | फिर क्या हुआ ? हम क्यों बदल गए ? आखिर ऐसी क्या बात है जो हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे तो जा रहे हैं पर सांस्कारिकता और व्यावहारिकता के दौड़ में सबसे पीछे आने की कोशिश में लगे हैं |
मेरे ख्याल में जो अहम् की भावना है, उसकी इसमें मुख्य भूमिका है | मेरे दोस्त ने कुछ दिन पहले बताया था कि एक लड़की को ऐसा लगता था की उसकी रूममेट को लड़के ज्यादा पसंद करते हैं या उसपर ज्यादा ध्यान देते हैं और इसी कारण वह उदास रहने लगी और अपनी पढ़ाई भी खराब की | काफी छोटी सी बात | पर जब सुनने में यह भी आता है कि फलानी लड़की ने फलाने लड़के के लिए आत्महत्या कर ली या फलानी लड़की का कत्ल कर दिया तब दिमाग ठनकता है | कहीं यह लड़की भी उस उदासीनता की शिकार तो नहीं थी ? कहीं उसे भी ऐसा तो नहीं लगता था कि अगर उसका बॉय-फ्रेंड नहीं हुआ तो उसकी बाकी सभी दोस्तों में उसकी पूछ कम हो जाएगी ? अगर जवाब ढूंढे तो काफी हद तक सही लगता है | और मेरे ख्याल में यह अहम् की भावना लड़कियों को ज्यादा प्रभावित करती हैं क्योंकि कहते है ना - लडकियां इमोशनली थोड़ी कमज़ोर होती हैं और इसी कारण सहनशीलता भी उनकी कम होती है (माफ़ कीजियेगा लड़कियों, यह कोई तथ्य नहीं है पर अभी तक जो मैंने अवलोकन किया है, उसी के अनुसार बता रहा हूँ) |
पर बात मैं केवल लड़कियों तक ही सीमित नहीं रखना चाहता हूँ | बात तो हर उस लड़के पर भी लागू है जो इस भ्रम में जी रहा है कि एक गर्ल-फ्रेंड होना इस दुनिया में जीवित रहने के लिए एक एक्स्ट्रा तत्त्व है (5 मूलभूत तत्त्वों के अलावा) |
परेशानियां, दिक्कत्तें और अहम् तो हर जगह अपना रंग दिखाएंगे | आखिर कब तक हम इनके सामने अपना सर टिका कर झुक जाएंगे ? आखिर कब तक हम हार मानते रहेंगे ? आखिर कब तक हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ेंगे और विवेकशीलता की दौड़ में पीछे ? आखिर कब तक हम अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों और अपने आदर्शों से मुंह छुपाकर भागते फिरेंगे ? आखिर कब तक ?
कभी तो हम हार ही जाएंगे | इस आधुनिकता में, इस विवेकशीलता से, इस संस्कृति से, इन मूल्यों से और इन आदर्शों से | अंततः हमारा सर झुका ही रहेगा जैसे आज इस दौड़ में है | पर सोचिये की वो सर शान से झुका है उसके सामने जो इस संस्कृति का निर्माता है, जिसने इन मूल्यों को एक सुन्दर माला में पिरोकर हम सबको पहनाया है और जिसने हमें जीना सिखाया है | काश हम सब का सर ऐसे झुके और हम शान से कहें - "इस संस्कृति के लिए, इस जहां के लिए, इस ज़िन्दगी के लिए, तुम्हारे लिए ऐ दोस्त जिसे में प्यार करता हूँ, जिसे मैं चाहता हूँ" | उस क्षण को महसूस करिए और आपको सही और गलत का अंदाजा ज़रूर पता चलेगा |
यह तो अब हमारे ऊपर ही निर्धारित है की हम कैसे जीना चाहते हैं | इस कीचड़ में एक दूसरे पर कीचड़ उछलकर या उन लोगों की श्रेणियों में जहाँ इन मामूली से विवेकहीन मनुष्य का पहुंचना या कीचड़ उछालना बस, ना के समान है |
प्यार करें, मोहब्बत करें पर सीमाओं के अन्दर जहाँ आप भी आराम से अपनी ज़िन्दगी जी रहे हों और समाज में हम जैसे कुछ लोगों को भी आप पर इस पोस्ट के जरिये कुछ कहने पर मजबूर न कर रहे हों | तब देखिये दुनिया बड़ी हसीन हो जाएगी और वो मासूमियत फिर से लौट आएगी |
अंत में मैं सभी को छुट्टियों की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ | आशा करता हूँ की मैं आप से जल्द-स-जल्द रूबरू होऊंगा और आपकी टिप्पणियाँ मुझसे |
तब तक के लिए टाटा, नमस्कार, आदाब, सायोनारा...
230, मालवीय भवन, बिट्स पिलानी से आखरी पोस्ट इस साल के लिए |
P.S. - मेरे ब्लॉग की सालगिरह 16 अप्रैल को चली गयी | व्यस्तता के कारण कुछ पोस्ट नहीं कर सका | खेद है | पर अच्छा लग रहा है इस ब्लॉग जगत का हिस्सा बनकर और कुछ अजनबियों से रूबरू हो कर |
धन्यवाद
आज हमारे फाईनल एक्ज़ाम ख़त्म हुए हैं और तभी फुर्सत में ये पोस्ट आपके सामने आ रहा है |
एक्ज़ाम ख़त्म होने की ख़ुशी में और विद्युत अभियंता बनने का सुरूर तो हम सब पर चढ़ा ही है और इसी को जश्न में तब्दील करने के लिए हम हमारे कैम्पस में कनॉट में खाना खाने गए | बातें चल रही थी और जो बातें आजकल सबसे ज्यादा आम है, लड़का-लड़की, दोस्त-दोस्ती, वही सब चल रहा था | कोई किसी का किसी के साथ होने पर खुश था और कोई किसी की कुछ अनसुनी बातें बुझा रहा था | बात इतनी आम हो चुकी है कि राह चलते भी बस यही बातें | मौका मिले और हम शुरू हो जाएं | अब साहब इस उम्र में नहीं तो फिर कब करेंगे ? पर हाँ एक बात तो तय है | हमें आजकल ऐसी बातें करने में ज्यादा मज़ा आता है और जब भी कोई गंभीर विषय की बात होती है तो वहां से किनारा काटने में ही अपनी भलाई समझते हैं |
कुछ लोग कैम्पस में बढ़ते गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड ट्रेंड को लेकर चिंतित थे | बात यह नहीं की यह ठीक नहीं है पर उनका कहना है कि हर किसी रिश्ते में एक सीमा और मर्यादा होती है जिसे लांघना न केवल उस रिश्ते को पर पूरे समाज की स्थिति को भी धूमिल करता है |
कैम्पस के कुछ ऐसे वाकये सामने आए जो मैंने भी पहले नहीं सुने थे और सुनकर तो मैं भी शर्मसार हो उठा | लोगों के लिए यह एक फैशन बन गया है और इस फैशन की चका-चौंध में आँखें सभी की चुंधिया गयी हैं | इन 20-22 साल के थोड़े परिपक्व और तेज़ युवाओं ने हर सीमा का उल्लंघन करने का शायद मन बना लिया है | इनमें से ज्यादातर लोगों को यह भी पता नहीं चलता है की इस चुन्धियाने वाले फैशन में वो सार्वजनिक जगहों पर कुछ ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें फंकी लगता है और जो उन्हें यह झूठा एहसास दिलवाता है कि उनका स्तर बाकी लोगों से ऊंचा है |
जब मेरे दोस्तों ने 2-3 ऐसे किस्से सुनाए तो लगा की अभी तो ना जाने कितने अनकहे-छुपे किस्से हमें नहीं पता है और इन 2-3 किस्सों ने ही दिल को जैसे झकझोर कर रख दिया है | माफ़ कीजियेगा मैं उन सब वाकयों को यहाँ सबके समक्ष लाकर खुद को शर्मिंदा नहीं करना चाहता हूँ |
वैसे इस पोस्ट को पढ़ने वाले यह सब तो समझते ही होंगे की मैं कैसे अंधेपन की बात कर रहा हूँ जो इस युवा पीढ़ी को विवेकशून्य बना रही है | आज जब मैं कॉलेज में अपने प्रथम वर्ष और इस तृतीय वर्ष के अंत को तुलनात्मक रूप में देखता हूँ तो लगता है कि मैं वैसे ही ठीक था और यह कॉलेज भी |
प्यार-मोहब्बत-इश्क तो खुदा की एक हसीन देन है जो उस मासूम बच्चे की हंसी समान मधुर और सौम्य है | फिर क्या हुआ ? हम क्यों बदल गए ? आखिर ऐसी क्या बात है जो हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे तो जा रहे हैं पर सांस्कारिकता और व्यावहारिकता के दौड़ में सबसे पीछे आने की कोशिश में लगे हैं |
मेरे ख्याल में जो अहम् की भावना है, उसकी इसमें मुख्य भूमिका है | मेरे दोस्त ने कुछ दिन पहले बताया था कि एक लड़की को ऐसा लगता था की उसकी रूममेट को लड़के ज्यादा पसंद करते हैं या उसपर ज्यादा ध्यान देते हैं और इसी कारण वह उदास रहने लगी और अपनी पढ़ाई भी खराब की | काफी छोटी सी बात | पर जब सुनने में यह भी आता है कि फलानी लड़की ने फलाने लड़के के लिए आत्महत्या कर ली या फलानी लड़की का कत्ल कर दिया तब दिमाग ठनकता है | कहीं यह लड़की भी उस उदासीनता की शिकार तो नहीं थी ? कहीं उसे भी ऐसा तो नहीं लगता था कि अगर उसका बॉय-फ्रेंड नहीं हुआ तो उसकी बाकी सभी दोस्तों में उसकी पूछ कम हो जाएगी ? अगर जवाब ढूंढे तो काफी हद तक सही लगता है | और मेरे ख्याल में यह अहम् की भावना लड़कियों को ज्यादा प्रभावित करती हैं क्योंकि कहते है ना - लडकियां इमोशनली थोड़ी कमज़ोर होती हैं और इसी कारण सहनशीलता भी उनकी कम होती है (माफ़ कीजियेगा लड़कियों, यह कोई तथ्य नहीं है पर अभी तक जो मैंने अवलोकन किया है, उसी के अनुसार बता रहा हूँ) |
पर बात मैं केवल लड़कियों तक ही सीमित नहीं रखना चाहता हूँ | बात तो हर उस लड़के पर भी लागू है जो इस भ्रम में जी रहा है कि एक गर्ल-फ्रेंड होना इस दुनिया में जीवित रहने के लिए एक एक्स्ट्रा तत्त्व है (5 मूलभूत तत्त्वों के अलावा) |
परेशानियां, दिक्कत्तें और अहम् तो हर जगह अपना रंग दिखाएंगे | आखिर कब तक हम इनके सामने अपना सर टिका कर झुक जाएंगे ? आखिर कब तक हम हार मानते रहेंगे ? आखिर कब तक हम इस आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ेंगे और विवेकशीलता की दौड़ में पीछे ? आखिर कब तक हम अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों और अपने आदर्शों से मुंह छुपाकर भागते फिरेंगे ? आखिर कब तक ?
कभी तो हम हार ही जाएंगे | इस आधुनिकता में, इस विवेकशीलता से, इस संस्कृति से, इन मूल्यों से और इन आदर्शों से | अंततः हमारा सर झुका ही रहेगा जैसे आज इस दौड़ में है | पर सोचिये की वो सर शान से झुका है उसके सामने जो इस संस्कृति का निर्माता है, जिसने इन मूल्यों को एक सुन्दर माला में पिरोकर हम सबको पहनाया है और जिसने हमें जीना सिखाया है | काश हम सब का सर ऐसे झुके और हम शान से कहें - "इस संस्कृति के लिए, इस जहां के लिए, इस ज़िन्दगी के लिए, तुम्हारे लिए ऐ दोस्त जिसे में प्यार करता हूँ, जिसे मैं चाहता हूँ" | उस क्षण को महसूस करिए और आपको सही और गलत का अंदाजा ज़रूर पता चलेगा |
यह तो अब हमारे ऊपर ही निर्धारित है की हम कैसे जीना चाहते हैं | इस कीचड़ में एक दूसरे पर कीचड़ उछलकर या उन लोगों की श्रेणियों में जहाँ इन मामूली से विवेकहीन मनुष्य का पहुंचना या कीचड़ उछालना बस, ना के समान है |
प्यार करें, मोहब्बत करें पर सीमाओं के अन्दर जहाँ आप भी आराम से अपनी ज़िन्दगी जी रहे हों और समाज में हम जैसे कुछ लोगों को भी आप पर इस पोस्ट के जरिये कुछ कहने पर मजबूर न कर रहे हों | तब देखिये दुनिया बड़ी हसीन हो जाएगी और वो मासूमियत फिर से लौट आएगी |
अंत में मैं सभी को छुट्टियों की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ | आशा करता हूँ की मैं आप से जल्द-स-जल्द रूबरू होऊंगा और आपकी टिप्पणियाँ मुझसे |
तब तक के लिए टाटा, नमस्कार, आदाब, सायोनारा...
230, मालवीय भवन, बिट्स पिलानी से आखरी पोस्ट इस साल के लिए |
P.S. - मेरे ब्लॉग की सालगिरह 16 अप्रैल को चली गयी | व्यस्तता के कारण कुछ पोस्ट नहीं कर सका | खेद है | पर अच्छा लग रहा है इस ब्लॉग जगत का हिस्सा बनकर और कुछ अजनबियों से रूबरू हो कर |
धन्यवाद
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
जंग का मैदान, मन है शैतान
हाँ मुझे पता है इस बार काफी देर हुई है कोई पोस्ट करने में | मैं आलसी नहीं हूँ पर क्या करुँ बीच में हमारा तकनीकी महोत्सव, अपोजी आ गया और सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि कोई विषय ही नहीं मिल रहा था | पर आज अंततः मेरी और मेरे प्रिय दोस्तों की एक ना छूटने वाली आदत ने मुझे इस विषय पर लिखने को उकसाया [उकसाया ? हाँ सही शब्द है :)] है |
तो पढिये और जंग लड़ते रहिये अपने दिल और मन के बीच |
यह जंग रात को सोते ही शुरू हो जाती है | यह जंग वो जंग है जो हर छात्र को लड़ना पड़ता है [ अपवाद हर जगह हैं और यहाँ पर अपवाद में घोटुओं को शामिल करता हूँ ]
हाँ तो यह जंग क्या है ? क्यों है ? कैसे शुरू होता है ? कैसे ख़तम होता है ? यह सब मैं अभी बताता हूँ | आप तो अभी से ही मेरे पोस्ट के साथ लड़ाई करने लगे | सब्र का फल मीठा होता है.. हौले हौले चलिए ज़रा |
रात को सोते ही.. ओह्ह माफ़ कीजियेगा.. जब हम सोते हैं वो रात नहीं, सुबह मानिए बस पौ फटने को आतुर ही होता है और हमारी आँखें मानों गुस्से से हमारे कंप्यूटर को घूरते हुए कह रही हो, " अरे निकम्मे, जब तू नहीं था तो कम से कम मेरा टाइम-टेबल सही तो चलता था | मुआ तेरे आते ही यह इंसान आलसी, निशाचर और बावरा हो गया है | हह, अपने आपको टेक्नोलॉजी फ्रीक बताता है | मैं तो बोलती हूँ की पूरा फ्रीक है, पर टेक्नोलॉजी में नहीं दिमाग से | काश तू ना होती तो कितना सुकून होता | कोई लौटा दे.. कोई लौटा दे |"
बस इतनी लम्बे भाषण के बाद तो कंप्यूटर भी शर्म के मारे कुछ नहीं बोलता है और स्लीप मोड में पहुँच जाता है | और जैसे ही उसकी आँखें हुई बंद, यहाँ इस शरीर का सिस्टम भी शट डाउन हो जाता है | और किसी तरह सुबह( हाँ, अब तो मैंने भी सही शब्द का इस्तेमाल किया है ! ) के 4-5 बजे हम नींद के भवसागर में गोता लगा चुके होते हैं |
जनाब ये तो हर कॉलेज की आम और मेन्टोस ज़िन्दगी है | यहाँ दोनों में कोई अंतर नहीं है | चाहे कितना भी मेन्टोस खा लें, दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आएगा हाय यह पापी कंप्यूटर !!
खैर जंग तो अब शुरू होती है | नींद लगी नहीं की यह वार्तालाप शुरू हो जाता है | अंत तक एक युद्ध में बदल कर एक लम्बी विराम बन जाता है : ( वार्तालाप दिल और मन के बीच हो रहा है, आइये देखें कौन जीतता है | )
दिल - ओये यार, सुबह 9 बजे तो लेक्चर है |
मन - तो ?
दिल - अरे, तो मतलब ? जाना नहीं है ?
मन - ओये रुक एक मिनट, कान से किटर-पिटर निकालने दे | सही से सुनाई नहीं दे रहा है |
[ कुछ छिकिर-छिकिर के बाद ]
मन - हाँ, अब बता लाले क्या कह रहा था |
दिल - मैं यह याद दिला रहा था कि कल सुबह 9 बजे लेक्चर है, तो जाना है ना ?
मन - ओये तू हाथी** का डेटाबेस ले कर चलता है क्या ? जो तुझे हर लेक्चर का टाइम याद है ?
दिल - अरे तू इतना गुस्सा क्यों हो रहा है ?
मन - अरे छड्ड यार, मतलब याद दिलवाने को भी तेरे पास ये है ? अगर किसी का जन्मदिन याद दिलवाता तो कितना अच्छा होता | वैसे भी हाथों ने कल ही कहा मेरे को कि बहुत खुजली मच रही है | किसी को मारना है उसे | तुझे कितनी दुआएं मिलती | कम-स-कम टेस्ट के समय तो वो दुआएं लगती और तू चलता और इस मुए आलसी शरीर के कुछ नंबर-शम्बर आ जाते |
दिल - अरे यार तू तो अभी से ही बद्दुआएँ दे रहा है | मैंने क्या गलत कहा ? अब यहाँ पर पढने नहीं आये तो क्या मच्छर सेकने आये हैं ?
मन - ओये तू मेरा दिमाग ना खा | वैसे भी कमबख्त नींद आ रही है | वो आँखें रो रही हैं | सुनाई नहीं देता क्या ? सुबह उठ कर देखते हैं | मिलकर फैसला कर लेंगे की क्या करना है | अभी अपनी बत्ती बुझा और लाईट ले कर सो जा | शुभरात्री | शब्बाखैर |
और इन्हीं यादों में एक छात्र के नींद को आराम मिलता है | और यह सपना उसके लिए सुबह तक [अब 4 से 9 में क्या सुबह ? क्या रात ? हाँ ] चलता रहता है |
सुबह आँखों के दरवाज़े पर अलार्म घड़ी की दस्तक होती है | आँख मन ही मन !@#$%^& देता हुआ कहता है - "कमबख्त, फिर से आ गया | लगता है नेहरुजी के वचनों पर चलता है "आराम हराम है" | अब अगर है तो अपने आराम को हराम रखो ना | नेहरूजी ने यह थोड़े ही कहा था कि दूसरों का आराम हराम है |
खैर कुछ ज्यादा कीच-कीच ना करते हुए वो खुलता है और हाथों को इशारा करते है, "कमबख्त के सर पर एक मारो ज़रा |" हाथ आज्ञा का पालन करते हुए धीमे से मारता है और फिर से चद्दर के अन्दर छुप जाता है |
पर रुकिए मेरे दोस्त "जंग अभी बाकी है"
अब चूँकि नींद थोडी उड़ चुकी होती है तो दिल और मन फिर से अपनी राम कहानी शुरू करते हैं |
दिल - चलें ?
मन - नहीं रे | अभी नहीं लगी है |
दिल - लगी है ? क्या ?
मन - हाँ ? संडास जाने की बात कर रहे हो ना ?
दिल - ओये बेवकूफ | मैं वहां नहीं लेक्चर जाने की बात कर रहा हूँ |
मन [अचंभित, शर्माते और गुस्से में] - ओह्ह नहीं फिर से सपने वाला राग मत अलापो | सोने दो |
दिल - कहा था ना मैंने, यहाँ पर पढने के लिए आये हैं | न कि सोने के लिए | और याद है टेस्ट-1 ? कितने नंबर ला पाए थे ?
मन - टेस्ट-1 ? कौन सा ? किसका ? मुझे कुछ याद नहीं है |
दिल - कोई नहीं | मैं अपना डेटाबेस खोल के बताता हूँ |
मन - अरे नहीं-नहीं रहने दो | यहाँ पब्लिक पढ़ रही है | बदन पर जो कुछ बचा है उसे मत उतारो |
दिल - हाँ अब आये ना लाइन पे | तो चलें ?
मन - हम्म | एक मिनट | टाइम क्या हुआ है ?
दिल - अभी 8:40 हुए हैं | अभी भी 20 मिनट बाकी है |
मन - क्या ??????? सिर्फ 20 मिनट ?
दिल - क्यों क्या हुआ ?
मन - अब तो लाईट ले लो | 20 मिनट में इस हॉस्टल से लेक्चर हॉल नहीं पहुँच सकते |
दिल - क्यों नहीं ?
मन - अरे कितना काम करना पड़ेगा | उठो, मंजन करो, मुंह धोओ, "वहां" जाओ, नाश्ता करो और फिर चलकर [साइकिल पहले साल में अंतिम बार ठीक करवाई थी | अब तो लोहे के भाव ही बिकेगा बेचारा] लेक्चर हॉल | नहीं पहुँच पाएँगे
दिल - ये क्या बात हुई ? अगर आज टेस्ट होता तो 8:55 पर उठकर भी पहुँच जाते |
मन - वही तो | आज टेस्ट नहीं है ना | मस्त रहो |
दिल - नहीं | कुछ बहाने बाजी नहीं चलेगी | चलो |
मन - लेकिन फायदा क्या है ?
दिल - अरे फायदा ? अच्छा विषय चल रहा है | चलो |
मन - हाँ पिछले बार भी नहीं गए थे | तो इस बार भी कुछ नहीं समझ आएगा | छोड़ो यार |
दिल - देखो तुमने 5 मिनट बेकार में ही गँवा दिए | अब ज्यादा चूं-चपड़ मत करो और चलो |
अब जैसे ही मन ने सुना कि 5 मिनट ख़राब हो गए हैं, उसे तो जैसे लगा की अब कोई हालत में लेक्चर नहीं जाया जा सकता है और यह सोचते हुए :
मन - देखो अब तो पहुँच ही नहीं सकते हैं | ऐसा करते हैं, अगले घंटे वाले लेक्चर में चलते हैं | अभी बहुत नींद आ रही है | और इतना कहते हुए ही वह झट बिस्तर के अन्दर रफूचक्कर हो गया |
और बेचारा :
दिल - मन मन मन मन चलो चलो चलो !!!!!!
यही कहता हुआ वह भी निढाल पड़ गया |
और अगले घंटे वाली क्लास के लिए आँखों ने धोखा दे दिया | 2 घंटे बाद वो खुली और शरीर मेस की ओर दिन का खाना खाने को चल पड़ा |
**हाथी, मेरा एक दोस्त है जिससे सब इसलिए परेशान हैं क्योंकि उसे सबके मोबाइल नंबर, रूम नंबर. गर्ल फ्रेंड [दूसरों के जनाब] के मोबाइल नंबर, इत्यादि, इत्यादि [ओह्ह यह इत्यादि वाली लिस्ट बहुत लम्बी है इसलिए यहीं पर ख़तम कर रहा हूँ ] बहुत याद रहते हैं | अब आप पूछ रहे होंगे की इसमें परेशानी क्या है? कोई परेशानी नहीं | पर जब बात किसी के जन्म तिथि की आती है तो वह भी हाथी के डेटाबेस में सालों-साल तक सुरक्षित है और यहीं पर पंगे हो जाते हैं | क्योंकि आपको खबर होगी की कॉलेज वगैरह में जन्मदिन पर ही इंसान सबसे दुखी हो कर सोचता है कि "फूटी किस्मत, आज ही जन्म लेना था |" साहब इतनी मार पड़ती है पिछवाड़े में, की दो दिन इंसान करवटें बदल बदल कर भी नहीं सो पाता है | तो इसलिए हाथी से सब परेशान हैं |
तो पढिये और जंग लड़ते रहिये अपने दिल और मन के बीच |
यह जंग रात को सोते ही शुरू हो जाती है | यह जंग वो जंग है जो हर छात्र को लड़ना पड़ता है [ अपवाद हर जगह हैं और यहाँ पर अपवाद में घोटुओं को शामिल करता हूँ ]
हाँ तो यह जंग क्या है ? क्यों है ? कैसे शुरू होता है ? कैसे ख़तम होता है ? यह सब मैं अभी बताता हूँ | आप तो अभी से ही मेरे पोस्ट के साथ लड़ाई करने लगे | सब्र का फल मीठा होता है.. हौले हौले चलिए ज़रा |
रात को सोते ही.. ओह्ह माफ़ कीजियेगा.. जब हम सोते हैं वो रात नहीं, सुबह मानिए बस पौ फटने को आतुर ही होता है और हमारी आँखें मानों गुस्से से हमारे कंप्यूटर को घूरते हुए कह रही हो, " अरे निकम्मे, जब तू नहीं था तो कम से कम मेरा टाइम-टेबल सही तो चलता था | मुआ तेरे आते ही यह इंसान आलसी, निशाचर और बावरा हो गया है | हह, अपने आपको टेक्नोलॉजी फ्रीक बताता है | मैं तो बोलती हूँ की पूरा फ्रीक है, पर टेक्नोलॉजी में नहीं दिमाग से | काश तू ना होती तो कितना सुकून होता | कोई लौटा दे.. कोई लौटा दे |"
बस इतनी लम्बे भाषण के बाद तो कंप्यूटर भी शर्म के मारे कुछ नहीं बोलता है और स्लीप मोड में पहुँच जाता है | और जैसे ही उसकी आँखें हुई बंद, यहाँ इस शरीर का सिस्टम भी शट डाउन हो जाता है | और किसी तरह सुबह( हाँ, अब तो मैंने भी सही शब्द का इस्तेमाल किया है ! ) के 4-5 बजे हम नींद के भवसागर में गोता लगा चुके होते हैं |
जनाब ये तो हर कॉलेज की आम और मेन्टोस ज़िन्दगी है | यहाँ दोनों में कोई अंतर नहीं है | चाहे कितना भी मेन्टोस खा लें, दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आएगा हाय यह पापी कंप्यूटर !!
खैर जंग तो अब शुरू होती है | नींद लगी नहीं की यह वार्तालाप शुरू हो जाता है | अंत तक एक युद्ध में बदल कर एक लम्बी विराम बन जाता है : ( वार्तालाप दिल और मन के बीच हो रहा है, आइये देखें कौन जीतता है | )
दिल - ओये यार, सुबह 9 बजे तो लेक्चर है |
मन - तो ?
दिल - अरे, तो मतलब ? जाना नहीं है ?
मन - ओये रुक एक मिनट, कान से किटर-पिटर निकालने दे | सही से सुनाई नहीं दे रहा है |
[ कुछ छिकिर-छिकिर के बाद ]
मन - हाँ, अब बता लाले क्या कह रहा था |
दिल - मैं यह याद दिला रहा था कि कल सुबह 9 बजे लेक्चर है, तो जाना है ना ?
मन - ओये तू हाथी** का डेटाबेस ले कर चलता है क्या ? जो तुझे हर लेक्चर का टाइम याद है ?
दिल - अरे तू इतना गुस्सा क्यों हो रहा है ?
मन - अरे छड्ड यार, मतलब याद दिलवाने को भी तेरे पास ये है ? अगर किसी का जन्मदिन याद दिलवाता तो कितना अच्छा होता | वैसे भी हाथों ने कल ही कहा मेरे को कि बहुत खुजली मच रही है | किसी को मारना है उसे | तुझे कितनी दुआएं मिलती | कम-स-कम टेस्ट के समय तो वो दुआएं लगती और तू चलता और इस मुए आलसी शरीर के कुछ नंबर-शम्बर आ जाते |
दिल - अरे यार तू तो अभी से ही बद्दुआएँ दे रहा है | मैंने क्या गलत कहा ? अब यहाँ पर पढने नहीं आये तो क्या मच्छर सेकने आये हैं ?
मन - ओये तू मेरा दिमाग ना खा | वैसे भी कमबख्त नींद आ रही है | वो आँखें रो रही हैं | सुनाई नहीं देता क्या ? सुबह उठ कर देखते हैं | मिलकर फैसला कर लेंगे की क्या करना है | अभी अपनी बत्ती बुझा और लाईट ले कर सो जा | शुभरात्री | शब्बाखैर |
और इन्हीं यादों में एक छात्र के नींद को आराम मिलता है | और यह सपना उसके लिए सुबह तक [अब 4 से 9 में क्या सुबह ? क्या रात ? हाँ ] चलता रहता है |
सुबह आँखों के दरवाज़े पर अलार्म घड़ी की दस्तक होती है | आँख मन ही मन !@#$%^& देता हुआ कहता है - "कमबख्त, फिर से आ गया | लगता है नेहरुजी के वचनों पर चलता है "आराम हराम है" | अब अगर है तो अपने आराम को हराम रखो ना | नेहरूजी ने यह थोड़े ही कहा था कि दूसरों का आराम हराम है |
खैर कुछ ज्यादा कीच-कीच ना करते हुए वो खुलता है और हाथों को इशारा करते है, "कमबख्त के सर पर एक मारो ज़रा |" हाथ आज्ञा का पालन करते हुए धीमे से मारता है और फिर से चद्दर के अन्दर छुप जाता है |
पर रुकिए मेरे दोस्त "जंग अभी बाकी है"
अब चूँकि नींद थोडी उड़ चुकी होती है तो दिल और मन फिर से अपनी राम कहानी शुरू करते हैं |
दिल - चलें ?
मन - नहीं रे | अभी नहीं लगी है |
दिल - लगी है ? क्या ?
मन - हाँ ? संडास जाने की बात कर रहे हो ना ?
दिल - ओये बेवकूफ | मैं वहां नहीं लेक्चर जाने की बात कर रहा हूँ |
मन [अचंभित, शर्माते और गुस्से में] - ओह्ह नहीं फिर से सपने वाला राग मत अलापो | सोने दो |
दिल - कहा था ना मैंने, यहाँ पर पढने के लिए आये हैं | न कि सोने के लिए | और याद है टेस्ट-1 ? कितने नंबर ला पाए थे ?
मन - टेस्ट-1 ? कौन सा ? किसका ? मुझे कुछ याद नहीं है |
दिल - कोई नहीं | मैं अपना डेटाबेस खोल के बताता हूँ |
मन - अरे नहीं-नहीं रहने दो | यहाँ पब्लिक पढ़ रही है | बदन पर जो कुछ बचा है उसे मत उतारो |
दिल - हाँ अब आये ना लाइन पे | तो चलें ?
मन - हम्म | एक मिनट | टाइम क्या हुआ है ?
दिल - अभी 8:40 हुए हैं | अभी भी 20 मिनट बाकी है |
मन - क्या ??????? सिर्फ 20 मिनट ?
दिल - क्यों क्या हुआ ?
मन - अब तो लाईट ले लो | 20 मिनट में इस हॉस्टल से लेक्चर हॉल नहीं पहुँच सकते |
दिल - क्यों नहीं ?
मन - अरे कितना काम करना पड़ेगा | उठो, मंजन करो, मुंह धोओ, "वहां" जाओ, नाश्ता करो और फिर चलकर [साइकिल पहले साल में अंतिम बार ठीक करवाई थी | अब तो लोहे के भाव ही बिकेगा बेचारा] लेक्चर हॉल | नहीं पहुँच पाएँगे
दिल - ये क्या बात हुई ? अगर आज टेस्ट होता तो 8:55 पर उठकर भी पहुँच जाते |
मन - वही तो | आज टेस्ट नहीं है ना | मस्त रहो |
दिल - नहीं | कुछ बहाने बाजी नहीं चलेगी | चलो |
मन - लेकिन फायदा क्या है ?
दिल - अरे फायदा ? अच्छा विषय चल रहा है | चलो |
मन - हाँ पिछले बार भी नहीं गए थे | तो इस बार भी कुछ नहीं समझ आएगा | छोड़ो यार |
दिल - देखो तुमने 5 मिनट बेकार में ही गँवा दिए | अब ज्यादा चूं-चपड़ मत करो और चलो |
अब जैसे ही मन ने सुना कि 5 मिनट ख़राब हो गए हैं, उसे तो जैसे लगा की अब कोई हालत में लेक्चर नहीं जाया जा सकता है और यह सोचते हुए :
मन - देखो अब तो पहुँच ही नहीं सकते हैं | ऐसा करते हैं, अगले घंटे वाले लेक्चर में चलते हैं | अभी बहुत नींद आ रही है | और इतना कहते हुए ही वह झट बिस्तर के अन्दर रफूचक्कर हो गया |
और बेचारा :
दिल - मन मन मन मन चलो चलो चलो !!!!!!
यही कहता हुआ वह भी निढाल पड़ गया |
और अगले घंटे वाली क्लास के लिए आँखों ने धोखा दे दिया | 2 घंटे बाद वो खुली और शरीर मेस की ओर दिन का खाना खाने को चल पड़ा |
**हाथी, मेरा एक दोस्त है जिससे सब इसलिए परेशान हैं क्योंकि उसे सबके मोबाइल नंबर, रूम नंबर. गर्ल फ्रेंड [दूसरों के जनाब] के मोबाइल नंबर, इत्यादि, इत्यादि [ओह्ह यह इत्यादि वाली लिस्ट बहुत लम्बी है इसलिए यहीं पर ख़तम कर रहा हूँ ] बहुत याद रहते हैं | अब आप पूछ रहे होंगे की इसमें परेशानी क्या है? कोई परेशानी नहीं | पर जब बात किसी के जन्म तिथि की आती है तो वह भी हाथी के डेटाबेस में सालों-साल तक सुरक्षित है और यहीं पर पंगे हो जाते हैं | क्योंकि आपको खबर होगी की कॉलेज वगैरह में जन्मदिन पर ही इंसान सबसे दुखी हो कर सोचता है कि "फूटी किस्मत, आज ही जन्म लेना था |" साहब इतनी मार पड़ती है पिछवाड़े में, की दो दिन इंसान करवटें बदल बदल कर भी नहीं सो पाता है | तो इसलिए हाथी से सब परेशान हैं |
शुक्रवार, 30 जनवरी 2009
संस्कृति ? या सिर्फ़ मजाक ?
अभी अभी ऑडी हो कर आ रहा हूँ...
बस यूँ ही चल पड़ा था... देखने कि कैसी तैयारियां चल रही हैं ... कल संस्थापक दिवस पर होने वाले वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम की...
अब साहब यूँ समझ लीजिये की कुछ छुपे हुए कलाकार [कलाकार ?? जाने भी दो ...] अपने आपको किसी तरह उस बिल से निकालने की जहोज्जत में जुटे हुए हैं...या फ़िर बाकी लोगों की मेहनत से.. जो भी कह लीजिये..सब बराबर है...
पता नहीं मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है ओर साथ ही साथ दुःख भी हो रहा है...
गुस्सा इसलिए कि जिस दिन इतने सारे प्रादेशिक संगठन अपनी अपनी संस्कृति की झलक दिखाने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं वहां वो पता नहीं किस संस्कृति को दिखाना चाहते हैं...
शायद अब यह सब उनके लिए टाइम पास हो गया है...संस्कृति शब्द सिर्फ़ ओर सिर्फ़ एक मजाक बन कर रह गया है...
अगर आप अपने प्रदेश की झलक लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं तो आपके पास दो ही विकल्प हैं ...
एक...या तो आप उसे करने में अपनी जान झोंक दें या ....
दो... उससे छेड़-छाड़ बिल्कुल ना करें |
पर जहाँ तक अभी के आखिरी रियाज़ की बात है, मुझे काफ़ी कम ही लोगों में इसके प्रति गंभीरता नज़र आई...
लोगों को यह बस एक मस्ती का जरिया ही ज़्यादा लग रहा था...
लोग बस स्टेज पर चढ़ने के इच्छुक हैं लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता की इस स्टेज पर चढ़ने के लिए जो सही में मेहनत करते हैं उन्हें इसकी गरिमा के बारे में पता है..वो इसकी इज्ज़त करना जानते हैं... उन्हें पता है की जब आप इस मंच पर होते हैं तो वो समय हँसी मज़ाक का नहीं होता है... पर आपकी सच्ची मेहनत को सही ढंग से प्रस्तुत करने का है... यह मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि मैंने इस मंच पर चढ़ने के लिए वाकई मेहनत की है ओर लोगों को तत्परता से मेहनत करते हुए देखा भी है...
बड़े शर्म की बात है कि कुछ आलसी लोगों के कारण कुछ वाकई में मेहनत करने वालों को भी दो गालियाँ खानी पड़ती हैं... कहते हैं ना - "गेहूं के साथ घुन भी पिसता है"...
ओर जब मैं कुछ ऐसे लोगों का इन सब चीज़ों के प्रति विपरीत रुझान देखता हूँ तो गुस्सा इतना आता है मानो यह चाह रहा हूँ की अभी इनको इस उच्च मंच से विहीन कर दूँ... उनको उस आलस का एहसास तभी होता है जब लोग उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी करते हैं.. साहब जब आप मेहनत करना ही नहीं चाहते हैं तो तालियाँ कहाँ से बटोरेंगे ??
जिस तरह से कुछ प्रादेशिक संगठन अपनी संस्कृति को प्रस्तुत कर रहे थे [या कल करने वाले हैं] उसे देख कर बड़ा दुःख हुआ की कल ये अपने से छोटों को ये दिखाएंगे अपनी संस्कृति के बारे में ?? ..... या फ़िर अपने बुजुर्गों को ये तसल्ली देंगे की हमारे हाथों में यह सुरक्षित है ?? ऐसा लग रहा था जैसे कुछ कंजर मंच पर चढ़कर नाटक कर रहे हैं...
दुःख इस बात का भी है कि इस बार भी [पिछले साल भी किसी कारणवश यह सम्भव नहीं हो पाया था] मैं यहाँ पर अपनी प्रस्तुति नहीं दे पाऊंगा... पर ठीक है.. हर जगह फूल तो नहीं मिलेंगे ना ? कहीं कांटें ही सही....
वैसे आप मेरा यह गाना यहाँ से डाउनलोड करके सुन सकते है... आशा करता हूँ आपको अच्छा लगेगा...
कल मैं देख कर आता हूँ .. लोग कितनी गंभीरता से अपनी संस्कृति का बिगुल बजाते हैं...
अगर सम्भव हुआ तो ज़रूर बताऊंगा... मैंने तालियाँ बजाई या गालियाँ..
तब तक के लिए नमस्कार....
जय बिट्स !!!
बस यूँ ही चल पड़ा था... देखने कि कैसी तैयारियां चल रही हैं ... कल संस्थापक दिवस पर होने वाले वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम की...
अब साहब यूँ समझ लीजिये की कुछ छुपे हुए कलाकार [कलाकार ?? जाने भी दो ...] अपने आपको किसी तरह उस बिल से निकालने की जहोज्जत में जुटे हुए हैं...या फ़िर बाकी लोगों की मेहनत से.. जो भी कह लीजिये..सब बराबर है...
पता नहीं मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है ओर साथ ही साथ दुःख भी हो रहा है...
गुस्सा इसलिए कि जिस दिन इतने सारे प्रादेशिक संगठन अपनी अपनी संस्कृति की झलक दिखाने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं वहां वो पता नहीं किस संस्कृति को दिखाना चाहते हैं...
शायद अब यह सब उनके लिए टाइम पास हो गया है...संस्कृति शब्द सिर्फ़ ओर सिर्फ़ एक मजाक बन कर रह गया है...
अगर आप अपने प्रदेश की झलक लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं तो आपके पास दो ही विकल्प हैं ...
एक...या तो आप उसे करने में अपनी जान झोंक दें या ....
दो... उससे छेड़-छाड़ बिल्कुल ना करें |
पर जहाँ तक अभी के आखिरी रियाज़ की बात है, मुझे काफ़ी कम ही लोगों में इसके प्रति गंभीरता नज़र आई...
लोगों को यह बस एक मस्ती का जरिया ही ज़्यादा लग रहा था...
लोग बस स्टेज पर चढ़ने के इच्छुक हैं लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता की इस स्टेज पर चढ़ने के लिए जो सही में मेहनत करते हैं उन्हें इसकी गरिमा के बारे में पता है..वो इसकी इज्ज़त करना जानते हैं... उन्हें पता है की जब आप इस मंच पर होते हैं तो वो समय हँसी मज़ाक का नहीं होता है... पर आपकी सच्ची मेहनत को सही ढंग से प्रस्तुत करने का है... यह मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि मैंने इस मंच पर चढ़ने के लिए वाकई मेहनत की है ओर लोगों को तत्परता से मेहनत करते हुए देखा भी है...
बड़े शर्म की बात है कि कुछ आलसी लोगों के कारण कुछ वाकई में मेहनत करने वालों को भी दो गालियाँ खानी पड़ती हैं... कहते हैं ना - "गेहूं के साथ घुन भी पिसता है"...
ओर जब मैं कुछ ऐसे लोगों का इन सब चीज़ों के प्रति विपरीत रुझान देखता हूँ तो गुस्सा इतना आता है मानो यह चाह रहा हूँ की अभी इनको इस उच्च मंच से विहीन कर दूँ... उनको उस आलस का एहसास तभी होता है जब लोग उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी करते हैं.. साहब जब आप मेहनत करना ही नहीं चाहते हैं तो तालियाँ कहाँ से बटोरेंगे ??
जिस तरह से कुछ प्रादेशिक संगठन अपनी संस्कृति को प्रस्तुत कर रहे थे [या कल करने वाले हैं] उसे देख कर बड़ा दुःख हुआ की कल ये अपने से छोटों को ये दिखाएंगे अपनी संस्कृति के बारे में ?? ..... या फ़िर अपने बुजुर्गों को ये तसल्ली देंगे की हमारे हाथों में यह सुरक्षित है ?? ऐसा लग रहा था जैसे कुछ कंजर मंच पर चढ़कर नाटक कर रहे हैं...
दुःख इस बात का भी है कि इस बार भी [पिछले साल भी किसी कारणवश यह सम्भव नहीं हो पाया था] मैं यहाँ पर अपनी प्रस्तुति नहीं दे पाऊंगा... पर ठीक है.. हर जगह फूल तो नहीं मिलेंगे ना ? कहीं कांटें ही सही....
वैसे आप मेरा यह गाना यहाँ से डाउनलोड करके सुन सकते है... आशा करता हूँ आपको अच्छा लगेगा...
कल मैं देख कर आता हूँ .. लोग कितनी गंभीरता से अपनी संस्कृति का बिगुल बजाते हैं...
अगर सम्भव हुआ तो ज़रूर बताऊंगा... मैंने तालियाँ बजाई या गालियाँ..
तब तक के लिए नमस्कार....
जय बिट्स !!!
रविवार, 25 जनवरी 2009
जय हो माल - जय हो !!!
आइये जनाब आज आप लोगों को बिट्स के महलों की बात बताएं :
जिस तरह राजाओं का राजा होता है महाराजा उसी तरह बिट्स में भवनों का राजा है :
पंडित मदन मोहन मालवीय भवन [ओह्ह आपको नहीं पता ये कौन सा भवन है ?? ये है माल भवन] |
यहाँ पर हम प्यार से (सही में प्यार से ??) इसे माल भवन बुलाते हैं |
फिलहाल यहाँ पर तृतीय वर्ष के छात्रों का वास (साहब वास नहीं वनवास कहिये) है |
कुछ रोचक जानकारियां जो की शायद इस राजा का पूरी तरह से वर्णन कर देगा :
1.) यह बिट्स में ऐसी जगह पर स्थित है जिसके करीबन ३०० मीटर अर्धव्यास [रेडीअस] तक कोई भी काम की चीज़ नहीं है (अब SAC का कितना काम है ?? केवल खाना खाने थोड़े ही ना आए है यहाँ) -
GYM-G = दूर (शरीर में सब अंजर-पंजर जंग-ग्रस्त हो गए हैं..धन्यवाद माल )
C'not = दूर (अच्छा है..खर्चा कम हो गया..मोबाइल और पेट दोनों का रिचार्ज अब कम से कम)
Akshay = दूर (यहाँ का सुपर-मार्केट...महीने भर की लिस्ट एक ही बार में लानी पड़ती है [तो आप समझ लीजिये की क्या होगा अगर संडास वाला साबुन बीच महीने में ख़त्म हो जाए तो!!! ] )
Insti = दूर (अच्छा ही है...अगर ५ मिनट पहले उठे तो क्लास वैसे ही लाईट हो जाता है और हम जाते भी कितना हैं ?? )
रेडी = है ही नहीं (बिट्स की लाइफ-लाइन ही नहीं है ...एक चीज़ जिसका यहाँ ना होना सबसे ज़्यादा खलता है )
2.) हम जैसे कुछ बदकिस्मत लोग पुराने माल में कैदी की ज़िन्दगी काट रहे हैं | बताता हूँ क्यों :
- यह भवन शायद आदम ज़माने का है...कब ढह जाए पता नहीं...बाहर से कोई किला लगता है जो जर्र-जर्र हो गया है | अन्दर से वैसा ही खोकला और कबूतरों का घोंसला |
- पहले यह लड़कियों का भवन हुआ करता था - इसलिए इंस्टी ने इसके चारों ओर ऊँची दीवार लगा दी थी | और जब इसके बाद भी उनके दहकते हुए दिल को लगा की कबूतर-बाजी केवल इससे नहीं रुकेगी तो जेल वाले जंगले और लगा दिए | अब यह कर नहीं हटाते हैं कि भविष्य में शायद फ़िर से यह लड़कियों का हॉस्टल हो जाए (मैं कहता हूँ - "पहले लडकियां तो लाओ !!!")
3.) मेरी विंग - इसका नाम है मैवरिक्स (दो "K" के साथ) |
- यहाँ पर आधे सेमेस्टर ट्यूबलाइट चलती है और आधे सेमेस्टर बल्ब |
- यहाँ की ट्यूबलाइट की स्विच नीचे वाले विंग में है (ताकि बिजली बिल कम आए)|
- यहाँ आजकल जन्मदिन पर कुत्ते नहीं आते हैं (बचा कुचा खाने) - मैं कहता हूँ पहले हमारे दोस्त तो ढूँढ लें इस विंग को बाकी कुत्ते-बिल्ली बाद में आ ही जाएँगे !!!
- यहाँ पर हॉस्टल के मुखिया भी आना पसंद नहीं करते हैं - क्योंकि उन्हें लगता है की वो वापसी का रास्ता भूल जाएँगे |
- यहाँ के संडास में गरम-पानी की कोई सुविधा नहीं है | अरे यहाँ क्या आस-पास के कई संडासों में ( अभी कुछ दिनों पहले कई लोग तौलिया और बाल्टी के साथ भवन के चक्कर काटते नज़र आए थे ) भी नहीं है |
- यहाँ पर धूप, पानी, हवा, मिटटी और आग ("किसी" भी काम के लिए) का आना/लाना सख्त मना है |
- यहाँ पर हर गेट/खिड़की/या दीवार पर हाथ/पैर मारने से पुरानी पपड़ीयां बहुत ही खूबसूरत पैटर्न के साथ नीचे बिछे टाईल्स (टाईल्स ???) को चूमती है | आपको अपने कपडों का ख़ास ध्यान रखना पड़ता है |
- यहाँ हर सेमेस्टर के शुरुआत में संडास के बगल वाले कमरे में पानी की सीलन आ जाती है जो कि चौकी के अनुसार काफ़ी आम बात है |
अब बताते-बताते तो मैं भी थक गया हूँ | इंस्टी वालों ने खूब सोचकर यह भवन हम जैसे 3rd year EEEites को दिया है | बोलते हैं जिस तरह से CDCs में प्रोफ़ेसर तुम्हारी जान लेते हैं तो ये भवन अब और क्या लेगा | पड़े रहो इस निर्वासन (Exile) में |
हर जगह से दूर...हर भवनों से जुदा..राजाओं का महाराजा खड़ा है हम जैसे अभागों को अपनी गर्त में छुपाए हुए जहाँ से केवल Clock Tower की घड़ी (माफ़ कीजियेगा "घड़ा") ही दिखता है....
जिस तरह राजाओं का राजा होता है महाराजा उसी तरह बिट्स में भवनों का राजा है :
पंडित मदन मोहन मालवीय भवन [ओह्ह आपको नहीं पता ये कौन सा भवन है ?? ये है माल भवन] |
यहाँ पर हम प्यार से (सही में प्यार से ??) इसे माल भवन बुलाते हैं |
फिलहाल यहाँ पर तृतीय वर्ष के छात्रों का वास (साहब वास नहीं वनवास कहिये) है |
कुछ रोचक जानकारियां जो की शायद इस राजा का पूरी तरह से वर्णन कर देगा :
1.) यह बिट्स में ऐसी जगह पर स्थित है जिसके करीबन ३०० मीटर अर्धव्यास [रेडीअस] तक कोई भी काम की चीज़ नहीं है (अब SAC का कितना काम है ?? केवल खाना खाने थोड़े ही ना आए है यहाँ) -
GYM-G = दूर (शरीर में सब अंजर-पंजर जंग-ग्रस्त हो गए हैं..धन्यवाद माल )
C'not = दूर (अच्छा है..खर्चा कम हो गया..मोबाइल और पेट दोनों का रिचार्ज अब कम से कम)
Akshay = दूर (यहाँ का सुपर-मार्केट...महीने भर की लिस्ट एक ही बार में लानी पड़ती है [तो आप समझ लीजिये की क्या होगा अगर संडास वाला साबुन बीच महीने में ख़त्म हो जाए तो!!! ] )
Insti = दूर (अच्छा ही है...अगर ५ मिनट पहले उठे तो क्लास वैसे ही लाईट हो जाता है और हम जाते भी कितना हैं ?? )
रेडी = है ही नहीं (बिट्स की लाइफ-लाइन ही नहीं है ...एक चीज़ जिसका यहाँ ना होना सबसे ज़्यादा खलता है )
2.) हम जैसे कुछ बदकिस्मत लोग पुराने माल में कैदी की ज़िन्दगी काट रहे हैं | बताता हूँ क्यों :
- यह भवन शायद आदम ज़माने का है...कब ढह जाए पता नहीं...बाहर से कोई किला लगता है जो जर्र-जर्र हो गया है | अन्दर से वैसा ही खोकला और कबूतरों का घोंसला |
- पहले यह लड़कियों का भवन हुआ करता था - इसलिए इंस्टी ने इसके चारों ओर ऊँची दीवार लगा दी थी | और जब इसके बाद भी उनके दहकते हुए दिल को लगा की कबूतर-बाजी केवल इससे नहीं रुकेगी तो जेल वाले जंगले और लगा दिए | अब यह कर नहीं हटाते हैं कि भविष्य में शायद फ़िर से यह लड़कियों का हॉस्टल हो जाए (मैं कहता हूँ - "पहले लडकियां तो लाओ !!!")
3.) मेरी विंग - इसका नाम है मैवरिक्स (दो "K" के साथ) |
- यहाँ पर आधे सेमेस्टर ट्यूबलाइट चलती है और आधे सेमेस्टर बल्ब |
- यहाँ की ट्यूबलाइट की स्विच नीचे वाले विंग में है (ताकि बिजली बिल कम आए)|
- यहाँ आजकल जन्मदिन पर कुत्ते नहीं आते हैं (बचा कुचा खाने) - मैं कहता हूँ पहले हमारे दोस्त तो ढूँढ लें इस विंग को बाकी कुत्ते-बिल्ली बाद में आ ही जाएँगे !!!
- यहाँ पर हॉस्टल के मुखिया भी आना पसंद नहीं करते हैं - क्योंकि उन्हें लगता है की वो वापसी का रास्ता भूल जाएँगे |
- यहाँ के संडास में गरम-पानी की कोई सुविधा नहीं है | अरे यहाँ क्या आस-पास के कई संडासों में ( अभी कुछ दिनों पहले कई लोग तौलिया और बाल्टी के साथ भवन के चक्कर काटते नज़र आए थे ) भी नहीं है |
- यहाँ पर धूप, पानी, हवा, मिटटी और आग ("किसी" भी काम के लिए) का आना/लाना सख्त मना है |
- यहाँ पर हर गेट/खिड़की/या दीवार पर हाथ/पैर मारने से पुरानी पपड़ीयां बहुत ही खूबसूरत पैटर्न के साथ नीचे बिछे टाईल्स (टाईल्स ???) को चूमती है | आपको अपने कपडों का ख़ास ध्यान रखना पड़ता है |
- यहाँ हर सेमेस्टर के शुरुआत में संडास के बगल वाले कमरे में पानी की सीलन आ जाती है जो कि चौकी के अनुसार काफ़ी आम बात है |
अब बताते-बताते तो मैं भी थक गया हूँ | इंस्टी वालों ने खूब सोचकर यह भवन हम जैसे 3rd year EEEites को दिया है | बोलते हैं जिस तरह से CDCs में प्रोफ़ेसर तुम्हारी जान लेते हैं तो ये भवन अब और क्या लेगा | पड़े रहो इस निर्वासन (Exile) में |
हर जगह से दूर...हर भवनों से जुदा..राजाओं का महाराजा खड़ा है हम जैसे अभागों को अपनी गर्त में छुपाए हुए जहाँ से केवल Clock Tower की घड़ी (माफ़ कीजियेगा "घड़ा") ही दिखता है....
बुधवार, 10 दिसंबर 2008
शुभकामनाएँ !!!
इस सेमेस्टर का आखिरी पोस्ट..
धुंध में धुंधलाती आँखों को,
पेपरों में कांपते हाथों को,
15 दिनों से चल रहे niteouts को,
sem के आखिरी लम्हातों को,
कह रहा हूँ..
टाटा, Gud Bye, सलाम..
X'Mas और नया साल हो आपका सुखद,
बस यही दुआ के साथ पहुंचे आप तक यह पैगाम |
कोशिश करूँगा छुट्टियों में कुछ लिख पाऊँ.
तब तक..
सायोनारा, आदाब, दसविदानियाँ...
[:)] . . .
धुंध में धुंधलाती आँखों को,
पेपरों में कांपते हाथों को,
15 दिनों से चल रहे niteouts को,
sem के आखिरी लम्हातों को,
कह रहा हूँ..
टाटा, Gud Bye, सलाम..
X'Mas और नया साल हो आपका सुखद,
बस यही दुआ के साथ पहुंचे आप तक यह पैगाम |
कोशिश करूँगा छुट्टियों में कुछ लिख पाऊँ.
तब तक..
सायोनारा, आदाब, दसविदानियाँ...
[:)] . . .
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मेरी कविताएँ,
BITS और उसकी कुछ ख़ास बातें
शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
बचपन से बुढ़ापा - Psenti Special
**** यह कविता काफ़ी लम्बी है [:)] | यह जानकारी उन लोगों के लिए है जो यह सोचकर ब्लॉग पढ़ रहे हैं कि शायद एक छोटी सी कविता आपके समक्ष होगी |पर आपको काफ़ी संयम के साथ इसका पठन करना पड़ेगा | यह अलग से नोट मैंने कुछ लोगों की टिपण्णी के बाद डालने का विचार किया | आशा है आप में वो संयम अवश्य होगा जो मुझे भी रखना पड़ा था यह कविता बुनते वक्त - "3 घंटे " | अपनी ज़रा सी मेहनत पर आपकी छोटी टिप्पणियाँ काफ़ी उत्साहवर्द्धक होंगी | - धन्यवाद
अब वक्त आ गया है जब कुछ लोग बिछड़ जाएँगे हमसे ,
पर बिछड़ने का दुःख, मिलने के सुख से कहाँ है बड़ा..
हम बस यही कहते हैं आपसे ,
ज़िन्दगी का उसूल है ये - "जो ना बिछड़ा वो कहाँ मिला"
साल - 1
यह साल है उस नन्हें बचपन की,
जब ज़िन्दगी की शुरुआत हुई..
दिल हिलोरे मारने पर मजबूर था,
और यह देखो !!!
कॉलेज की शुरुआत हुई..
अरे भाईयों (और उनकी बहनों)
ये विंग का खेला क्या होता है,
साईडी और रूमी किसका तोता है ?
सुबह-सुबह इनका दिन होता है,
रात 10 बजे तक हर विंग सोता है..
क्लास जाना चाहिए बराबर,
नहीं तो कम आएँगे नम्बर..
सुना है RAF में फिल्में दिखाते हैं,
150 रूपए में 24 आते हैं ? ? ?
बॉस्म किस खेल का नाम है ?
अरे नहीं यह तो खेलों का सुल्तान है..
ओएसिस में घर चलते हैं,
नहीं रे, रुक ना..मस्ती करते हैं..
दिवाली यहाँ सूनी-सूनी सी,
घर की याद दिला गई..
फ़िर खाना इतना माशा-अल्लाह,
अच्छे-अच्छों की तंगी आ गई..
Tuts,Tests और Lab तो हैं बस li8 रा,
Compree में पूरी निकल गई है इनकी हवा..
जैसे तैसे इसे निकाला, चले हैं घर को झूम के..
ये देखो इस बचपन का रंग,
कॉलेज के दिन हैं नूर से..
दूसरा सेम मतलब ठंडा-ठंडा कूल कूल,
ये सुहावना मौसम है "So Wonderful"
अब थोडी बिट्सियनगिरी आई है इनमें,
जागते हैं रातों में और सोते हैं दिन में..
Founder's Day, Inbloom और APOGEE हैं नए अखाड़ी,
लो साहब वो आते हैं जोशीले नए खिलाडी..
अब तापमान यहाँ का और प्रॉफ्स का भी बढ़ रहा है,
जो की बदन पे कपडों से और पपेरों में नंबरों से साफ़ झलक रहा है..
किसी तरह भाग छूटें इस कारागार से,
सबकी यही दुआ है परवर-दिगार से..
और यूँ ही ख़त्म हो गया पहला साल,
Wings टूटी हैं अब जाना है सबको अपने-अपने द्वार..
वो जोश, वो तरंग, वो उमंग अब ठंडा पड़ चुका है,
और कॉलेज का बचपन समाप्त हो चुका है ||
साल - 2
ढाई महीने की लम्बी छुट्टी के बाद,
घर से कॉलेज का बजाया है शंख-नाद..
फ़िर से नए भवनों का मज़ा लेने आए हैं [लड़कियां मैं क्षमा चाहता हूँ इस मामले में]
कंप्यूटर/लैपटॉप भी साथ लाए हैं..
अरे ये देखो इस बार क्या हुआ !!!!
कॉलेज का यौवन हम पर सवार हुआ..
जो हुआ करते थे अपने बचपन में सबसे शरीफ,
आज हर प्रॉफ को उसी की तलाश है,
जो लिखा करते थे पेपर में कलम तोड़-तोड़ कर,
आज उन्हीं के पेपर सबसे साफ़ हैं..
अब तो C'not और नूतन पे डेरे जमते हैं,
मय के प्यालों के फेरे पड़ते हैं..
RAF में लोगों का कंगाला पड़ा है,
भला क्यों ना हो ? सबके कमरे में एक डब्बा जो गड़ा है..
अब लेक्चर जाने का बस एक ही मकसद रह गया है,
किसी पे दिल, crush जो कर गया है..
क्लब/डिपार्टमेन्ट तो जैसे बल्ले-बल्ले ,
पढ़ाई-लिखाई li8 ले li8 ले ..
Test और Tut के लिए रात [बिट्सियन "दिन" पढ़ें] को शुरू होती है पढ़ाई,
सुबह सबने मिलकर हाय-तौबा मचाई..
सभी खेलों और इवेंट्स में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है,
मानो पूरा जंग जीत लिया है..
बस यूँ ही सो-सो कर ज़िन्दगी को sac-out कर लिया है,
और किसी तरह 2nd इयर पार किया है..
तो खत्म हुआ gen tp वाला अनूठा साल,
ये यौवन ना आएगा फ़िर से एक बार ||
साल - 3
कमर कसकर तैयार हो जाइये,
जहाँ पनाह घोटू महाराज, घोटुओं के सरताज पधार रहे हैं..
पता है यह सबसे ख़ास साल है इनके लिए,
क्योंकि इसी से इनकी भावी ज़िन्दगी का सफर जुड़ा है
अब क्लास जाने का मतलब है पढ़ाई,
टाइम ख़राब करने वालों को बाई-बाई..
CDC में खूब नम्बर जमाए हैं,
पर कुछ तो अब भी av - ही ला पाए हैं..
Lab,Test और compree में है जीवन निकाला,
जिस तरह शादी करने के बाद निकलता है लोगों का दिवाला..
अब तो रात दिन एक से लगते हैं,
केवल पढ़ना है सब यही कहते हैं..
सभी ने जी भर के दी है प्रॉफ्स को बद्दुआ..
तो इस तरह गृहस्थ आश्रम खत्म हुआ..
साल - 4
अब आया है वो सेम जिसे लोग psenti कहते हैं,
क्या वाकई में लोग इसमें इतने senti होते हैं ?
ज़िन्दगी में जैसे एक भूचाल सा आया है,
क्यों नहीं ? पिछले 3 साल का फल यहीं तो पाया है..
नियम बनाया है की हर दिन आना है मन्दिर में फेरे देकर,
और प्लेसमेंट में बैठना है हर प्रॉफ का नाम ले कर..
जब जॉब लगने का "गुड न्यूज़" सुनाया है,
तो bumps, treat और बधाई का पात्र कहलाया है..
अब तो बुढापे में जवानी का जोश आया है,
ये फ़िर से बिट्सियन पद्दति पर आया है..
रात भर जग कर फिल्में देखना,
और दिन में दोस्तों के साथ खूब मटर-गश्ती करना..
बस अब ज़्यादा दिन नहीं बचे हैं इस ज़िन्दगी के,
बुढापा अपना रंग दिखाने लगा है हर किसी पे..
घंटों फ़ोन पर बातें करते हैं,
और शायद किसी से दिल की बात भी कहते हैं..
Farewell के दिन जब नज़दीक आते हैं,
तो इनके status message बड़े दुखद हो जाते हैं..
लोग buzz कर के हाल-चाल पूछते हैं,
और ये ग़मों भरा reply भी देते हैं..
खैर हम क्या जाने इनके दिल का हाल,
अभी तो बाकी है हमारा एक साल..
बस यादों के ज़रिये जीना सीख रहे हैं ये सब,
उन हसीं पलों को साथ रखोगे कब तक ?
पुरानी फोटो और विडियो देख कर दिल भर आता है,
और जब और सह ना सके तो आंसू मोती बन जाता है..
क्या पता कहीं अकेले में भी बैठ कर सिसकते होंगे,
इन सब चीज़ों को पकड़ने की नाकाम कोशिश करते होंगे..
आप सभी को इस नाचीज़ का सलाम,
बस इससे ज़्यादा क्या कहें आपके नाम..
अगर इसे पढ़कर आपका दिल भर आया है,
अगर इसे पढ़कर यादों का पुल बाँध को तोड़ आया है,
अगर इसे पढ़कर किसी का ख्याल दिल में आया है,
तो सही मायनों में आप senti हैं,
आपने वाकई में बिट्सियन ज़िन्दगी को जिया है,
नहीं तो आपने काफ़ी कुछ Miss किया है..
क्या पता कल मैं भी इसी तरह किसी का ब्लॉग पढ़ रहा होऊंगा,
और मन-ही-मन उस जूनियर को धन्यवाद दे रहा होऊंगा..
जिसने अपने सीनियर्स के नाम यह कविता बनाई है,
आशा करता हूँ यह आपको पसंद आई है..
अगर सही में अच्छी लगी हो यह कृति,
तो जाते-जाते बस दे जाइये एक टिपण्णी ||
अब वक्त आ गया है जब कुछ लोग बिछड़ जाएँगे हमसे ,
पर बिछड़ने का दुःख, मिलने के सुख से कहाँ है बड़ा..
हम बस यही कहते हैं आपसे ,
ज़िन्दगी का उसूल है ये - "जो ना बिछड़ा वो कहाँ मिला"
साल - 1
यह साल है उस नन्हें बचपन की,
जब ज़िन्दगी की शुरुआत हुई..
दिल हिलोरे मारने पर मजबूर था,
और यह देखो !!!
कॉलेज की शुरुआत हुई..
अरे भाईयों (और उनकी बहनों)
ये विंग का खेला क्या होता है,
साईडी और रूमी किसका तोता है ?
सुबह-सुबह इनका दिन होता है,
रात 10 बजे तक हर विंग सोता है..
क्लास जाना चाहिए बराबर,
नहीं तो कम आएँगे नम्बर..
सुना है RAF में फिल्में दिखाते हैं,
150 रूपए में 24 आते हैं ? ? ?
बॉस्म किस खेल का नाम है ?
अरे नहीं यह तो खेलों का सुल्तान है..
ओएसिस में घर चलते हैं,
नहीं रे, रुक ना..मस्ती करते हैं..
दिवाली यहाँ सूनी-सूनी सी,
घर की याद दिला गई..
फ़िर खाना इतना माशा-अल्लाह,
अच्छे-अच्छों की तंगी आ गई..
Tuts,Tests और Lab तो हैं बस li8 रा,
Compree में पूरी निकल गई है इनकी हवा..
जैसे तैसे इसे निकाला, चले हैं घर को झूम के..
ये देखो इस बचपन का रंग,
कॉलेज के दिन हैं नूर से..
दूसरा सेम मतलब ठंडा-ठंडा कूल कूल,
ये सुहावना मौसम है "So Wonderful"
अब थोडी बिट्सियनगिरी आई है इनमें,
जागते हैं रातों में और सोते हैं दिन में..
Founder's Day, Inbloom और APOGEE हैं नए अखाड़ी,
लो साहब वो आते हैं जोशीले नए खिलाडी..
अब तापमान यहाँ का और प्रॉफ्स का भी बढ़ रहा है,
जो की बदन पे कपडों से और पपेरों में नंबरों से साफ़ झलक रहा है..
किसी तरह भाग छूटें इस कारागार से,
सबकी यही दुआ है परवर-दिगार से..
और यूँ ही ख़त्म हो गया पहला साल,
Wings टूटी हैं अब जाना है सबको अपने-अपने द्वार..
वो जोश, वो तरंग, वो उमंग अब ठंडा पड़ चुका है,
और कॉलेज का बचपन समाप्त हो चुका है ||
साल - 2
ढाई महीने की लम्बी छुट्टी के बाद,
घर से कॉलेज का बजाया है शंख-नाद..
फ़िर से नए भवनों का मज़ा लेने आए हैं [लड़कियां मैं क्षमा चाहता हूँ इस मामले में]
कंप्यूटर/लैपटॉप भी साथ लाए हैं..
अरे ये देखो इस बार क्या हुआ !!!!
कॉलेज का यौवन हम पर सवार हुआ..
जो हुआ करते थे अपने बचपन में सबसे शरीफ,
आज हर प्रॉफ को उसी की तलाश है,
जो लिखा करते थे पेपर में कलम तोड़-तोड़ कर,
आज उन्हीं के पेपर सबसे साफ़ हैं..
अब तो C'not और नूतन पे डेरे जमते हैं,
मय के प्यालों के फेरे पड़ते हैं..
RAF में लोगों का कंगाला पड़ा है,
भला क्यों ना हो ? सबके कमरे में एक डब्बा जो गड़ा है..
अब लेक्चर जाने का बस एक ही मकसद रह गया है,
किसी पे दिल, crush जो कर गया है..
क्लब/डिपार्टमेन्ट तो जैसे बल्ले-बल्ले ,
पढ़ाई-लिखाई li8 ले li8 ले ..
Test और Tut के लिए रात [बिट्सियन "दिन" पढ़ें] को शुरू होती है पढ़ाई,
सुबह सबने मिलकर हाय-तौबा मचाई..
सभी खेलों और इवेंट्स में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है,
मानो पूरा जंग जीत लिया है..
बस यूँ ही सो-सो कर ज़िन्दगी को sac-out कर लिया है,
और किसी तरह 2nd इयर पार किया है..
तो खत्म हुआ gen tp वाला अनूठा साल,
ये यौवन ना आएगा फ़िर से एक बार ||
साल - 3
कमर कसकर तैयार हो जाइये,
जहाँ पनाह घोटू महाराज, घोटुओं के सरताज पधार रहे हैं..
पता है यह सबसे ख़ास साल है इनके लिए,
क्योंकि इसी से इनकी भावी ज़िन्दगी का सफर जुड़ा है
अब क्लास जाने का मतलब है पढ़ाई,
टाइम ख़राब करने वालों को बाई-बाई..
CDC में खूब नम्बर जमाए हैं,
पर कुछ तो अब भी av - ही ला पाए हैं..
Lab,Test और compree में है जीवन निकाला,
जिस तरह शादी करने के बाद निकलता है लोगों का दिवाला..
अब तो रात दिन एक से लगते हैं,
केवल पढ़ना है सब यही कहते हैं..
सभी ने जी भर के दी है प्रॉफ्स को बद्दुआ..
तो इस तरह गृहस्थ आश्रम खत्म हुआ..
साल - 4
अब आया है वो सेम जिसे लोग psenti कहते हैं,
क्या वाकई में लोग इसमें इतने senti होते हैं ?
ज़िन्दगी में जैसे एक भूचाल सा आया है,
क्यों नहीं ? पिछले 3 साल का फल यहीं तो पाया है..
नियम बनाया है की हर दिन आना है मन्दिर में फेरे देकर,
और प्लेसमेंट में बैठना है हर प्रॉफ का नाम ले कर..
जब जॉब लगने का "गुड न्यूज़" सुनाया है,
तो bumps, treat और बधाई का पात्र कहलाया है..
अब तो बुढापे में जवानी का जोश आया है,
ये फ़िर से बिट्सियन पद्दति पर आया है..
रात भर जग कर फिल्में देखना,
और दिन में दोस्तों के साथ खूब मटर-गश्ती करना..
बस अब ज़्यादा दिन नहीं बचे हैं इस ज़िन्दगी के,
बुढापा अपना रंग दिखाने लगा है हर किसी पे..
घंटों फ़ोन पर बातें करते हैं,
और शायद किसी से दिल की बात भी कहते हैं..
Farewell के दिन जब नज़दीक आते हैं,
तो इनके status message बड़े दुखद हो जाते हैं..
लोग buzz कर के हाल-चाल पूछते हैं,
और ये ग़मों भरा reply भी देते हैं..
खैर हम क्या जाने इनके दिल का हाल,
अभी तो बाकी है हमारा एक साल..
बस यादों के ज़रिये जीना सीख रहे हैं ये सब,
उन हसीं पलों को साथ रखोगे कब तक ?
पुरानी फोटो और विडियो देख कर दिल भर आता है,
और जब और सह ना सके तो आंसू मोती बन जाता है..
क्या पता कहीं अकेले में भी बैठ कर सिसकते होंगे,
इन सब चीज़ों को पकड़ने की नाकाम कोशिश करते होंगे..
आप सभी को इस नाचीज़ का सलाम,
बस इससे ज़्यादा क्या कहें आपके नाम..
अगर इसे पढ़कर आपका दिल भर आया है,
अगर इसे पढ़कर यादों का पुल बाँध को तोड़ आया है,
अगर इसे पढ़कर किसी का ख्याल दिल में आया है,
तो सही मायनों में आप senti हैं,
आपने वाकई में बिट्सियन ज़िन्दगी को जिया है,
नहीं तो आपने काफ़ी कुछ Miss किया है..
क्या पता कल मैं भी इसी तरह किसी का ब्लॉग पढ़ रहा होऊंगा,
और मन-ही-मन उस जूनियर को धन्यवाद दे रहा होऊंगा..
जिसने अपने सीनियर्स के नाम यह कविता बनाई है,
आशा करता हूँ यह आपको पसंद आई है..
अगर सही में अच्छी लगी हो यह कृति,
तो जाते-जाते बस दे जाइये एक टिपण्णी ||
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मेरी कविताएँ,
BITS और उसकी कुछ ख़ास बातें
मंगलवार, 18 नवंबर 2008
जहाँ लोग ये, वहां हम वो
उफ्फ आखिरकार मैं खुली हवा में फ़िर से साँस ले रहा हूँ...लेकिन खुश होने की इतनी ज़्यादा बात नहीं है, 2 दिन बाद फ़िर से कुछ दिनों के लिए ब्लैक-आउट हो जाएगा | खैर आप तो जाने ही दीजिये इन सब फिजूल की बातों को....खुशी की बात यह है कि आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग करने का मौका मिला है | क्या करुँ समझ नहीं आ रहा है | दिमाग में यूँ कहें की या तो बहुत सी बातें दौड़ रही हैं या फ़िर दिमाग में केवल गाय का चारा भरा रह गया है |
बिट्स में आ कर तो बहुत अच्छा लगा था पर तीसरे साल में पहुँचते ही काफ़ी लोगों को "बिट्स में आना" अपनी "3 Mistakes of My Life" में से एक लग रहा है | मैं समर्थन करता हूँ पर गहराई में जाएं तो मैं संसद भवन के विपक्षी दल की तरह आप पर गाज गिरा सकता हूँ |
आज दिल में ख़याल आया की इन सब भारी भरकम सिलेबस, किताब, ट्युट्स, टेस्ट्स, लैब्स और भी ना जाने क्या क्या चीज़ों के नीचे दबे हुए इस संसार के कुछ परेशान आदम-खोर [यहाँ आइये साहब सबके बढे हुए जुल्फों को देख कर आप भी यही कहेंगे] अगर इन सब दबाव के नीचे अगर कुछ सकारात्मक सोच रखें तो ज़िन्दगी उतनी दर्दनाक [सही शब्द है ना अभी के हालात के मुताबिक ??] नहीं रह जाएगी |
क्या कभी सोचा है कि ज़िन्दगी जो केवल परीक्षाओं का खेल है, आगे हमारे लिए कितनी आसान हो जाएगी ?
1. कंपनी में लोग यह देख कर परेशान रहेंगे की हम बिट्सियन प्रेजेंटेशन, प्रोजेक्ट वगैरह-वगैरह से तनिक भी चिंतित नहीं रहते हैं | आलम यह रहेगा - "अच्छा प्रतीक, कल यह प्रेजेंटेशन देना है..हो जाएगा ?" और हम कहेंगे - "क्या सर ? बस एक ही है ?..नहीं करेंगे !!!!! हमारी आदत एक साथ कम से कम दो टेस्ट, प्रेजेंटेशन, प्रोजेक्ट देने की है | खैर, लाइट रा ! हो जाएगा |"
2. जब ऐसी जगह पहुँच जाएं की हमारी पूरी टीम खाने से परेशान है तो हम यही कहेंगे - "क्या बात कर रहे हो ? यह खाद्य तो बिल्कुल खाने योग्य है | कम से कम यह तो समझ में आता है की क्या खा रहे हैं | पिलानी में 4 साल रहकर भी यह नहीं जान पाएं हैं की भिन्डी और आलू के अलावा मेस में क्या-क्या खाया है | इसलिए मस्त हो जाओ और चुप-चाप इतना beautiful [हम खाने को उसकी खूबसूरती से रेट करते हैं, ना कि स्वाद से] खाना खाओ |"
3. जब ऐसी जगह पहुँच जाएंगे जहाँ लोग ठण्ड के कारण काम ना करने का बहाना बना रहे हों, वहीँ हम पूरे जोश के साथ नाईट-आउट मार रहे होंगे और सफलता की सीढियां चढ़ रहे होंगे | जब लोग गर्मी से परेशान ए.सी. और पंखों की तलाश में भटक रहे होंगे वहीँ हम मटक-मटक कर अपने काम को बेधड़क बिन भटके कर रहे होंगे |
4. जब हमारे आस-पास के लोग यह शिकायत जता रहे होंगे कि यहाँ तो बर्ड-वाचिंग भी नहीं कर सकते वहीँ हम, जिनका स्तर शून्य से कहीं नीचे जा चुका है, नयन सुख प्राप्त कर रहे होंगे |
5. जहाँ लोग यह कहकर परेशान होंगे की उनका पारिश्रमिक [salary] बहुत कम है वहीँ हम एक चूसे हुए आत्मा की तरह बहुत ही संतुष्ट रहेंगे क्योंकि साहब अब जिसको zuc,1,2,3,4....की आदत हो गई है, वो बेचारा क्यों फोकट में आंसू बहाएगा ?
6. जहाँ लोगों को कंपनी में इन्टरनेट की स्पीड पर आपत्ति होगी वहीँ हम कहेंगे - "अरे, पप्पू खुश रह नहीं तो तुझे बिट्स ले जाऊंगा जहाँ दिनों-दिनों तक लोग बिना इन्टरनेट के भी जीवित रह सकते हैं - क्योंकि वहां लोगों को जीना आता है |"
7. जहाँ लोग एक दिन नहीं नहाने पर अपने शरीर के दुर्गन्ध से मारे जाएँगे वहीँ हम बिट्सियन पता नहीं कितने मासूमों को अपनी ना नहाने की आदत से उनको दुनिया से रुखसत कराएँगे |
8. जहाँ लोगों को 1 कि.मी. चलने के लिए भी स्कूटर की ज़रूरत पड़ेगी वहीँ हम 10-10 कि.मी. तो यूँ ही पैदल नाप आएँगे |
9. जहाँ लोगों को "Oberoi's" का खाना भी पसंद नहीं आ रहा होगा वहीँ हम रास्ते में आए ढाबे को भी "Taj" का ओहदा दे जाएंगे |
10. जहाँ लोग पुणे-मुंबई हाईवे पर 2 घंटे के सफर के बाद फुस्स हो जाएँगे वहीँ हम पूरा बिहार सड़क पर तय करने के बाद कहेंगे - "दिल्ली से पिलानी चलें ? "
11. जहाँ रात को तीन बजे लोग अपने घर में चूल्हे पर चाय बना रहे होंगे, वहीँ हम अपने दोस्त से कहेंगे - "चलें एक कटिंग चाय पीने बस-स्टैंड" ?
12. और जहाँ लोगों के स्टेटस-मैसेज आज भी "3 Mistakes of My Life - Joining my College, .., .." होगा, वहीँ हम बस यही लिख पाएंगे - "बिट्स पिलानी - मेरा धर्म, मेरी सोच, मेरी दुनिया, मेरी ज़िन्दगी"
P.S. - अगर यह पोस्ट पढने के बाद आपको ऐसा लग रहा है कि बिट्स-पिलानी में कुछ चीज़ों का स्तर काफ़ी कम है तो आपको बता दूँ :
1. यहाँ का खाना कई दूसरे कॉलेजों से काफ़ी अच्छा है जैसा मैंने अपने दूसरे कॉलेज के दोस्तों से सुना है |
2. यहाँ इन्टरनेट हर कमरे में उपलब्ध है - स्पीड कम है,कभी कभी 1-2 दिन के लिए इन्टरनेट नहीं रहता है पर फ़िर भी हम अपनी ज़िन्दगी बिना इसके सकुशल निकाल सकते हैं |
3. यहाँ के रेडी और कैन्टीन के खाने पेट[हमारे] भरने के लिए होते हैं ना की जेब[उनके] भरने के लिए |
पर अगर यह पढने के बाद भी आप दिल खोल के गालियाँ देना चाहते हैं तो बेखबर होकर, बेखौफ होकर, बेहिसाब होकर दीजिये ... कुछ सालों बाद आप मेरे पोस्ट पर टिपण्णी करने ज़रूर आएँगे... यह शर्त है मेरी आप से |
बिट्स में आ कर तो बहुत अच्छा लगा था पर तीसरे साल में पहुँचते ही काफ़ी लोगों को "बिट्स में आना" अपनी "3 Mistakes of My Life" में से एक लग रहा है | मैं समर्थन करता हूँ पर गहराई में जाएं तो मैं संसद भवन के विपक्षी दल की तरह आप पर गाज गिरा सकता हूँ |
आज दिल में ख़याल आया की इन सब भारी भरकम सिलेबस, किताब, ट्युट्स, टेस्ट्स, लैब्स और भी ना जाने क्या क्या चीज़ों के नीचे दबे हुए इस संसार के कुछ परेशान आदम-खोर [यहाँ आइये साहब सबके बढे हुए जुल्फों को देख कर आप भी यही कहेंगे] अगर इन सब दबाव के नीचे अगर कुछ सकारात्मक सोच रखें तो ज़िन्दगी उतनी दर्दनाक [सही शब्द है ना अभी के हालात के मुताबिक ??] नहीं रह जाएगी |
क्या कभी सोचा है कि ज़िन्दगी जो केवल परीक्षाओं का खेल है, आगे हमारे लिए कितनी आसान हो जाएगी ?
1. कंपनी में लोग यह देख कर परेशान रहेंगे की हम बिट्सियन प्रेजेंटेशन, प्रोजेक्ट वगैरह-वगैरह से तनिक भी चिंतित नहीं रहते हैं | आलम यह रहेगा - "अच्छा प्रतीक, कल यह प्रेजेंटेशन देना है..हो जाएगा ?" और हम कहेंगे - "क्या सर ? बस एक ही है ?..नहीं करेंगे !!!!! हमारी आदत एक साथ कम से कम दो टेस्ट, प्रेजेंटेशन, प्रोजेक्ट देने की है | खैर, लाइट रा ! हो जाएगा |"
2. जब ऐसी जगह पहुँच जाएं की हमारी पूरी टीम खाने से परेशान है तो हम यही कहेंगे - "क्या बात कर रहे हो ? यह खाद्य तो बिल्कुल खाने योग्य है | कम से कम यह तो समझ में आता है की क्या खा रहे हैं | पिलानी में 4 साल रहकर भी यह नहीं जान पाएं हैं की भिन्डी और आलू के अलावा मेस में क्या-क्या खाया है | इसलिए मस्त हो जाओ और चुप-चाप इतना beautiful [हम खाने को उसकी खूबसूरती से रेट करते हैं, ना कि स्वाद से] खाना खाओ |"
3. जब ऐसी जगह पहुँच जाएंगे जहाँ लोग ठण्ड के कारण काम ना करने का बहाना बना रहे हों, वहीँ हम पूरे जोश के साथ नाईट-आउट मार रहे होंगे और सफलता की सीढियां चढ़ रहे होंगे | जब लोग गर्मी से परेशान ए.सी. और पंखों की तलाश में भटक रहे होंगे वहीँ हम मटक-मटक कर अपने काम को बेधड़क बिन भटके कर रहे होंगे |
4. जब हमारे आस-पास के लोग यह शिकायत जता रहे होंगे कि यहाँ तो बर्ड-वाचिंग भी नहीं कर सकते वहीँ हम, जिनका स्तर शून्य से कहीं नीचे जा चुका है, नयन सुख प्राप्त कर रहे होंगे |
5. जहाँ लोग यह कहकर परेशान होंगे की उनका पारिश्रमिक [salary] बहुत कम है वहीँ हम एक चूसे हुए आत्मा की तरह बहुत ही संतुष्ट रहेंगे क्योंकि साहब अब जिसको zuc,1,2,3,4....की आदत हो गई है, वो बेचारा क्यों फोकट में आंसू बहाएगा ?
6. जहाँ लोगों को कंपनी में इन्टरनेट की स्पीड पर आपत्ति होगी वहीँ हम कहेंगे - "अरे, पप्पू खुश रह नहीं तो तुझे बिट्स ले जाऊंगा जहाँ दिनों-दिनों तक लोग बिना इन्टरनेट के भी जीवित रह सकते हैं - क्योंकि वहां लोगों को जीना आता है |"
7. जहाँ लोग एक दिन नहीं नहाने पर अपने शरीर के दुर्गन्ध से मारे जाएँगे वहीँ हम बिट्सियन पता नहीं कितने मासूमों को अपनी ना नहाने की आदत से उनको दुनिया से रुखसत कराएँगे |
8. जहाँ लोगों को 1 कि.मी. चलने के लिए भी स्कूटर की ज़रूरत पड़ेगी वहीँ हम 10-10 कि.मी. तो यूँ ही पैदल नाप आएँगे |
9. जहाँ लोगों को "Oberoi's" का खाना भी पसंद नहीं आ रहा होगा वहीँ हम रास्ते में आए ढाबे को भी "Taj" का ओहदा दे जाएंगे |
10. जहाँ लोग पुणे-मुंबई हाईवे पर 2 घंटे के सफर के बाद फुस्स हो जाएँगे वहीँ हम पूरा बिहार सड़क पर तय करने के बाद कहेंगे - "दिल्ली से पिलानी चलें ? "
11. जहाँ रात को तीन बजे लोग अपने घर में चूल्हे पर चाय बना रहे होंगे, वहीँ हम अपने दोस्त से कहेंगे - "चलें एक कटिंग चाय पीने बस-स्टैंड" ?
12. और जहाँ लोगों के स्टेटस-मैसेज आज भी "3 Mistakes of My Life - Joining my College, .., .." होगा, वहीँ हम बस यही लिख पाएंगे - "बिट्स पिलानी - मेरा धर्म, मेरी सोच, मेरी दुनिया, मेरी ज़िन्दगी"
P.S. - अगर यह पोस्ट पढने के बाद आपको ऐसा लग रहा है कि बिट्स-पिलानी में कुछ चीज़ों का स्तर काफ़ी कम है तो आपको बता दूँ :
1. यहाँ का खाना कई दूसरे कॉलेजों से काफ़ी अच्छा है जैसा मैंने अपने दूसरे कॉलेज के दोस्तों से सुना है |
2. यहाँ इन्टरनेट हर कमरे में उपलब्ध है - स्पीड कम है,कभी कभी 1-2 दिन के लिए इन्टरनेट नहीं रहता है पर फ़िर भी हम अपनी ज़िन्दगी बिना इसके सकुशल निकाल सकते हैं |
3. यहाँ के रेडी और कैन्टीन के खाने पेट[हमारे] भरने के लिए होते हैं ना की जेब[उनके] भरने के लिए |
पर अगर यह पढने के बाद भी आप दिल खोल के गालियाँ देना चाहते हैं तो बेखबर होकर, बेखौफ होकर, बेहिसाब होकर दीजिये ... कुछ सालों बाद आप मेरे पोस्ट पर टिपण्णी करने ज़रूर आएँगे... यह शर्त है मेरी आप से |
बुधवार, 12 नवंबर 2008
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है
कोई जगाओ, कोई उठाओ कोई बताओ,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है,
थका हारा, नींद का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
अरे Time-Table बनाने का बीड़ा उठाया है,
Seniors ने.....Ragging पर बुलाया है,
वो थका हारा, Ragging का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
हर Tut जाने का संकल्प बनाया है,
10P बनने का वादा कर आया है,
वो थका हारा, Tuts का मारा,सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
अपने Club/Dep में Enthu दिखाया है,
जल्द-स-जल्द Contis बढ़ाया है,
वो थका हारा Enthu का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
Tests ने तो जैसे ज़िन्दगी में आग लगाई है,
सुबह उठने में नाकामयाबी हाथ आई है,
वो थका हारा,Test Miss करने का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
BOSM में हाथ आजमाएं हैं कुछ खेलो में,
Medals जीत कर लाया है ढेरों में,
वो थका हारा, खुशी का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
OASIS में इनका जोश तो देखो,
हर Event को जीतने की ललक तो देखो,
वो थका हारा, कटीले नैनों का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
APOGEE में भी कुछ करने की चाह है,
Projects की......है, जो कि ना एक आसान राह है,
वो थका हारा, विजयी अंगारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है,
थका हारा, नींद का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
अरे Time-Table बनाने का बीड़ा उठाया है,
Seniors ने.....Ragging पर बुलाया है,
वो थका हारा, Ragging का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
हर Tut जाने का संकल्प बनाया है,
10P बनने का वादा कर आया है,
वो थका हारा, Tuts का मारा,सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
अपने Club/Dep में Enthu दिखाया है,
जल्द-स-जल्द Contis बढ़ाया है,
वो थका हारा Enthu का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
Tests ने तो जैसे ज़िन्दगी में आग लगाई है,
सुबह उठने में नाकामयाबी हाथ आई है,
वो थका हारा,Test Miss करने का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
BOSM में हाथ आजमाएं हैं कुछ खेलो में,
Medals जीत कर लाया है ढेरों में,
वो थका हारा, खुशी का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
OASIS में इनका जोश तो देखो,
हर Event को जीतने की ललक तो देखो,
वो थका हारा, कटीले नैनों का मारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
APOGEE में भी कुछ करने की चाह है,
Projects की......है, जो कि ना एक आसान राह है,
वो थका हारा, विजयी अंगारा, सोया जा रहा है,
देखो वो BITSIAN चला जा रहा है |
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मेरी कविताएँ,
BITS और उसकी कुछ ख़ास बातें
बुधवार, 8 अक्टूबर 2008
घर से दूर, मंजिल के पास - हम बिट्सियन
यह पोस्ट उन सभी लोगों के लिए हैं जो इस त्यौहार के माहौल में अपने और अपने रिश्तेदारों से दूर हैं | मैं भी घर से दूर हूँ लेकिन आज बिट्स के पूजा मैदान में जा कर पुरानी यादें फ़िर से ताज़ा हो गईं |
फ़िर से वो श्रद्धा के साथ माँ भवानी के सामने नतमस्तक होना,वो बंगाल, जो की यहाँ से कोसों दूर है, वहां की चहल-पहल का एक छोटा सा नमूना, थोड़ी-थोड़ी भीड़ में बढ़ता कोलाहल, लोगों के बीच हँसी-ठहाके, बच्चों का बेफिक्र इधर-उधर दौड़ लगाना और वो गुब्बारे को देख कर अनायास ही रो पड़ना, छोटों का आदर के साथ बड़ों के पाँव छूना और बड़ों का भी उतने ही प्यार से उनके सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना, वो धीरे-धीरे आरती के बाद का धुंआ पंडाल में चारों ओर उड़ना और उसकी महकती खुशबु जैसे शरीर के हर कण-कण को भेदती हुई ह्रदय में प्रवेश कर रही हो, वो घंटी का पूरे ज़ोर से बजना जो की बदन की हर रुकावट को भेदती हुई मस्तिष्क के एक कोने में जा कर गूंजने लगती है, वो पंडित का अपने पारंपरिक तरीके के वस्त्र पहनना और पूरे एकाग्रता के साथ आरती में ध्यान लगा होना...यह सब पूजा पंडाल और उसके आस-पास के हाल-चाल थे |
थोड़ा आगे भड़ते ही पता चला की एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होने वाला है | हम भी अपने पैर जमा कर बैठ गए और कार्यक्रम का लुत्फ़ उठाया | अचानक से बैठे-बैठे ही यह ख्याल आया कि स्कूल या घर के कॉलोनी में हम भी जब कार्यक्रम दिया करते थे, तो अपनी बारी के इंतज़ार में दिल धक्-धक् करने लगता था | आज यहाँ जब छोटे-छोटे बच्चे जब अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे तो सभी यादें पानी की एक तरंग बनकर पूरे शरीर को भिगो गई और मैं जैसे वहां खड़ा हुआ बस यह कह रहा हूँ..."अरे खत्म हो गया? ... ज़रा देखो यादों के कुछ और फव्वारे बाकी हों शायद..." लेकिन शायद यहीं उसका अंत था...
"अगर सभी यादें एक ही बार में लौट आएं तो उनका महत्त्व भी तो ख़त्म हो जाएगा ना ?"
इसके बाद मैं नैनो की दिशा में चल पड़ा..यानी बंगाल से गुजरात...FD-II QT ..में गुर्जरी [ गुजरात की असोसिएशन ] ने डांडिया नाईट का आयोजन किया था..मैं वैसे तो केवल देखने ही गया था पर जा कर अपने दोस्त के प्रस्ताव को मना ना कर सका | तो जोश में मैंने भी कुछ घंटे भर डांडिया तोडी | जिन लोगों ने इसे छोड़ा, उनके लिए मेरे ख्याल से दुर्भाग्य ही रहा | कमरे पे कंप्यूटर के सामने बैठकर आप सब कुछ तो नहीं पा सकते हैं ना? मैं आप लोगों से गुजारिश करता हूँ कि बाहर आ कर इन सब चीज़ों का भी आनंद लें..शायद आज से दो-तीन साल पहले जब हमारे कमरों पर कंप्यूटर नहीं हुआ करते थे तो यही सब छोटी-छोटी चीजें हमारी ज़िन्दगी को रंगीन बनाती थी, इसका महत्त्व समझाती थी...यह तो आपके ही ऊपर है कि आप भी इस बेरंग होती ज़िन्दगी में कुछ रंग भरना चाहते हैं कि नहीं ?
और उन लोगों के लिए जो कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति से भ्रमित हो रही है, आप केवल एक दिन के लिए यहाँ आ कर देखिये | अगर आपको हम सब बिट्सियन ने ग़लत नहीं ठहरा दिया तो कम-स-कम मैं अपने आप को बिट्सियन कहलाने से शर्मा जाऊंगा..ये मेरा वादा है आपसे |
हम यहाँ पढ़ाई के साथ भी अपनी संस्कृति को बरकरार रखने की जितनी कोशिश करते हैं, शायद उतनी मेहनत तो उन्होंने भी नहीं की होगी जिन्होनें इस संस्कृति की नींव रखी है |
सभी बिट्सियन को मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई और आशा करता हूँ की वो इसी जोश के साथ हमारी अमूल्य संस्कृति को बरकरार रखने के लिए हमेशा ही कार्यरत रहेंगे |
-प्रतीक
फ़िर से वो श्रद्धा के साथ माँ भवानी के सामने नतमस्तक होना,वो बंगाल, जो की यहाँ से कोसों दूर है, वहां की चहल-पहल का एक छोटा सा नमूना, थोड़ी-थोड़ी भीड़ में बढ़ता कोलाहल, लोगों के बीच हँसी-ठहाके, बच्चों का बेफिक्र इधर-उधर दौड़ लगाना और वो गुब्बारे को देख कर अनायास ही रो पड़ना, छोटों का आदर के साथ बड़ों के पाँव छूना और बड़ों का भी उतने ही प्यार से उनके सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना, वो धीरे-धीरे आरती के बाद का धुंआ पंडाल में चारों ओर उड़ना और उसकी महकती खुशबु जैसे शरीर के हर कण-कण को भेदती हुई ह्रदय में प्रवेश कर रही हो, वो घंटी का पूरे ज़ोर से बजना जो की बदन की हर रुकावट को भेदती हुई मस्तिष्क के एक कोने में जा कर गूंजने लगती है, वो पंडित का अपने पारंपरिक तरीके के वस्त्र पहनना और पूरे एकाग्रता के साथ आरती में ध्यान लगा होना...यह सब पूजा पंडाल और उसके आस-पास के हाल-चाल थे |
थोड़ा आगे भड़ते ही पता चला की एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होने वाला है | हम भी अपने पैर जमा कर बैठ गए और कार्यक्रम का लुत्फ़ उठाया | अचानक से बैठे-बैठे ही यह ख्याल आया कि स्कूल या घर के कॉलोनी में हम भी जब कार्यक्रम दिया करते थे, तो अपनी बारी के इंतज़ार में दिल धक्-धक् करने लगता था | आज यहाँ जब छोटे-छोटे बच्चे जब अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे तो सभी यादें पानी की एक तरंग बनकर पूरे शरीर को भिगो गई और मैं जैसे वहां खड़ा हुआ बस यह कह रहा हूँ..."अरे खत्म हो गया? ... ज़रा देखो यादों के कुछ और फव्वारे बाकी हों शायद..." लेकिन शायद यहीं उसका अंत था...
"अगर सभी यादें एक ही बार में लौट आएं तो उनका महत्त्व भी तो ख़त्म हो जाएगा ना ?"
इसके बाद मैं नैनो की दिशा में चल पड़ा..यानी बंगाल से गुजरात...FD-II QT ..में गुर्जरी [ गुजरात की असोसिएशन ] ने डांडिया नाईट का आयोजन किया था..मैं वैसे तो केवल देखने ही गया था पर जा कर अपने दोस्त के प्रस्ताव को मना ना कर सका | तो जोश में मैंने भी कुछ घंटे भर डांडिया तोडी | जिन लोगों ने इसे छोड़ा, उनके लिए मेरे ख्याल से दुर्भाग्य ही रहा | कमरे पे कंप्यूटर के सामने बैठकर आप सब कुछ तो नहीं पा सकते हैं ना? मैं आप लोगों से गुजारिश करता हूँ कि बाहर आ कर इन सब चीज़ों का भी आनंद लें..शायद आज से दो-तीन साल पहले जब हमारे कमरों पर कंप्यूटर नहीं हुआ करते थे तो यही सब छोटी-छोटी चीजें हमारी ज़िन्दगी को रंगीन बनाती थी, इसका महत्त्व समझाती थी...यह तो आपके ही ऊपर है कि आप भी इस बेरंग होती ज़िन्दगी में कुछ रंग भरना चाहते हैं कि नहीं ?
और उन लोगों के लिए जो कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति से भ्रमित हो रही है, आप केवल एक दिन के लिए यहाँ आ कर देखिये | अगर आपको हम सब बिट्सियन ने ग़लत नहीं ठहरा दिया तो कम-स-कम मैं अपने आप को बिट्सियन कहलाने से शर्मा जाऊंगा..ये मेरा वादा है आपसे |
हम यहाँ पढ़ाई के साथ भी अपनी संस्कृति को बरकरार रखने की जितनी कोशिश करते हैं, शायद उतनी मेहनत तो उन्होंने भी नहीं की होगी जिन्होनें इस संस्कृति की नींव रखी है |
सभी बिट्सियन को मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई और आशा करता हूँ की वो इसी जोश के साथ हमारी अमूल्य संस्कृति को बरकरार रखने के लिए हमेशा ही कार्यरत रहेंगे |
-प्रतीक
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
आत्महत्या, घोट और हम [जो घोटते नहीं हैं]
नमस्ते दोस्तों,
अचानक ही दिल में ख्याल आया और यह मैं आप लोगों के साथ बांटना चाहता हूँ | पिछले कुछ सालों में मैंने [और आपने भी] कॉलेजों में आत्महत्या [suicide] के बारे में काफ़ी कुछ सुना होगा, पढ़ा होगा | लेकिन हम में से काफ़ी कम लोगों ने ही उस पर ध्यान देने की कोशिश की होगी क्योंकि यह शायद हमारे आस-पास नहीं हुआ होगा और ना ही हम उस इंसान को पहचानते/जानते होंगे | खैर यह तो हर इंसान में एक दुर्गुण है [मैं भी शामिल हूँ जनाब] कि जब तक कोई बात आपसे या आपके जान पहचान वाले से ना हो तो उस पर ध्यान देना एक फिजूल बात हो जाती है |
मेरे ख़याल से तनाव दो कारणों से आप पर बढ़ता है :
1.) आप पढ़ाई में काफ़ी अच्छे हैं और आपको अपने स्तर को बरकरार रखना है | इस लिए आप पर काफ़ी दबाव पड़ रहा है |
2.) आप अपनी पढ़ाई सही से नहीं कर पा रहे हैं और आप अच्छा करना चाहते हैं तब भी आप पर काफ़ी दबाव आ सकता है |
अगर सभी आत्महत्याओं पर सोच-विचार किया जाए तो शायद ऊपर के दो कारण प्रमुख होंगे |
काफ़ी बार यह देखने में आया है कि एक विद्यार्थी अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पता है और इस कारण भी वह एक दुखद कदम उठा लेता है |
आज अगर बिट्स की पढ़ाई पद्दति को देखें तो इसको कोसते हुए भी हम काफ़ी हद तक आत्महत्या जैसे चरम कदम से बचे हुए हैं | कारण ?
कारण साफ़ है | यहाँ इतने Tuts, Tests, Comprees, Evaluation Components, बॉस्म, ओएसिस, अपोजी इत्यादि होते हैं कि तनाव नाम की चिड़िया हमारे दिल-ओ-दिमाग से उड़ जाती है | कभी हम परिक्षाओं में फोड़ देते हैं और कभी ZUC से ही काम चलाना पड़ता है लेकिन हमें टेंशन किसी बात की नहीं होती है क्योंकि हम यह कहकर अपने आप को सांत्वना देते रहते हैं कि अभी तो टेस्ट-2, Quiz,Compree बाकी है तो कुछ ना कुछ तो कर ही लेंगे |
जैसा कि मैंने कहा कि हम आत्महत्या जैसी चीज़ से तो बच जाते हैं लेकिन इसमें भी कुछ कमी है | जैसे की हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ठीक उसी तरह | हममें चीज़ों को, काम को टालने की बुरी आदत लग जाती है जो की भावी जीवन में जा कर हमारे लिए लाभकारी सिद्ध ना हो |
लेकिन अगर सम्पूर्ण नतीजे की बात करें तो आत्महत्या करने से तो अच्छा है कि हम कुछ काम को थोड़े दिनों के लिए टाल दें |
इस लेख से यह बात तो स्पष्ट होती है कि किसी चीज़ की हद आपकी सेहत और दूसरों के तनाव स्तर के लिए हानिकारक है | इसलिए सभी घोटुओं [बिट्स में जो दिल खोलकर केवल एक ही काम करते हैं, पढ़ना, उन्हें यह उपाधि दी गई है] से आग्रह है कि पढ़ाई और बाकी कार्यों का अच्छा संतुलन बनाएं ताकि लोग आत्महत्या जैसी चीज़ों से दूर ही रहे [अगर ऐसी कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसके जिम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही होंगें] |
बाकी लोगों [जो घोटुओं की श्रेणी में नहीं आते हैं, मुझे पता है कोई अपने आपको घोट कहलवाना पसंद नहीं करता है] से यह कहना चाहता हूँ की आप [मेरे सहित] खुशनसीब हैं की कभी-कभी कम नम्बर ला कर आपने अपने अन्दर से वह तनाव को जड़ से निकाल फेंका है {और मुझे घोटुओं से काफ़ी सहानुभूति है कि वो अभी तक इस ज़बरदस्त अनुभव [की कम नम्बर ला कर भी शान से कहना - "अगली बार देखना, फोड़ के आऊंगा" (आऊँगी नहीं हो सकता है क्योंकि बिट्स में घोट लड़कियों के अलावा किसी और तरह की लड़कियों को प्रवेश नहीं मिलता है) ] और खुदकुशी जैसे कठोर राह की और अपने पैर नहीं बढ़ा रहे हैं |
तो फ़िर खुश रहिये, कभी फोड़िये, कभी पपेरों के सामने ZUC जाइये, लेकिन बस तनावमुक्त रहिये और पढ़ाई और दूसरी चीज़ों का अच्छा ताल-मेल बनाए रखिये [आख़िर घर वालों ने आपको इतनी दूर मुख्यतः पढने के लिए ही भेजा है] |
आप सभी को मेरी तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं ||
-प्रतीक
अचानक ही दिल में ख्याल आया और यह मैं आप लोगों के साथ बांटना चाहता हूँ | पिछले कुछ सालों में मैंने [और आपने भी] कॉलेजों में आत्महत्या [suicide] के बारे में काफ़ी कुछ सुना होगा, पढ़ा होगा | लेकिन हम में से काफ़ी कम लोगों ने ही उस पर ध्यान देने की कोशिश की होगी क्योंकि यह शायद हमारे आस-पास नहीं हुआ होगा और ना ही हम उस इंसान को पहचानते/जानते होंगे | खैर यह तो हर इंसान में एक दुर्गुण है [मैं भी शामिल हूँ जनाब] कि जब तक कोई बात आपसे या आपके जान पहचान वाले से ना हो तो उस पर ध्यान देना एक फिजूल बात हो जाती है |
मेरे ख़याल से तनाव दो कारणों से आप पर बढ़ता है :
1.) आप पढ़ाई में काफ़ी अच्छे हैं और आपको अपने स्तर को बरकरार रखना है | इस लिए आप पर काफ़ी दबाव पड़ रहा है |
2.) आप अपनी पढ़ाई सही से नहीं कर पा रहे हैं और आप अच्छा करना चाहते हैं तब भी आप पर काफ़ी दबाव आ सकता है |
अगर सभी आत्महत्याओं पर सोच-विचार किया जाए तो शायद ऊपर के दो कारण प्रमुख होंगे |
काफ़ी बार यह देखने में आया है कि एक विद्यार्थी अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पता है और इस कारण भी वह एक दुखद कदम उठा लेता है |
आज अगर बिट्स की पढ़ाई पद्दति को देखें तो इसको कोसते हुए भी हम काफ़ी हद तक आत्महत्या जैसे चरम कदम से बचे हुए हैं | कारण ?
कारण साफ़ है | यहाँ इतने Tuts, Tests, Comprees, Evaluation Components, बॉस्म, ओएसिस, अपोजी इत्यादि होते हैं कि तनाव नाम की चिड़िया हमारे दिल-ओ-दिमाग से उड़ जाती है | कभी हम परिक्षाओं में फोड़ देते हैं और कभी ZUC से ही काम चलाना पड़ता है लेकिन हमें टेंशन किसी बात की नहीं होती है क्योंकि हम यह कहकर अपने आप को सांत्वना देते रहते हैं कि अभी तो टेस्ट-2, Quiz,Compree बाकी है तो कुछ ना कुछ तो कर ही लेंगे |
जैसा कि मैंने कहा कि हम आत्महत्या जैसी चीज़ से तो बच जाते हैं लेकिन इसमें भी कुछ कमी है | जैसे की हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ठीक उसी तरह | हममें चीज़ों को, काम को टालने की बुरी आदत लग जाती है जो की भावी जीवन में जा कर हमारे लिए लाभकारी सिद्ध ना हो |
लेकिन अगर सम्पूर्ण नतीजे की बात करें तो आत्महत्या करने से तो अच्छा है कि हम कुछ काम को थोड़े दिनों के लिए टाल दें |
इस लेख से यह बात तो स्पष्ट होती है कि किसी चीज़ की हद आपकी सेहत और दूसरों के तनाव स्तर के लिए हानिकारक है | इसलिए सभी घोटुओं [बिट्स में जो दिल खोलकर केवल एक ही काम करते हैं, पढ़ना, उन्हें यह उपाधि दी गई है] से आग्रह है कि पढ़ाई और बाकी कार्यों का अच्छा संतुलन बनाएं ताकि लोग आत्महत्या जैसी चीज़ों से दूर ही रहे [अगर ऐसी कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसके जिम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही होंगें] |
बाकी लोगों [जो घोटुओं की श्रेणी में नहीं आते हैं, मुझे पता है कोई अपने आपको घोट कहलवाना पसंद नहीं करता है] से यह कहना चाहता हूँ की आप [मेरे सहित] खुशनसीब हैं की कभी-कभी कम नम्बर ला कर आपने अपने अन्दर से वह तनाव को जड़ से निकाल फेंका है {और मुझे घोटुओं से काफ़ी सहानुभूति है कि वो अभी तक इस ज़बरदस्त अनुभव [की कम नम्बर ला कर भी शान से कहना - "अगली बार देखना, फोड़ के आऊंगा" (आऊँगी नहीं हो सकता है क्योंकि बिट्स में घोट लड़कियों के अलावा किसी और तरह की लड़कियों को प्रवेश नहीं मिलता है) ] और खुदकुशी जैसे कठोर राह की और अपने पैर नहीं बढ़ा रहे हैं |
तो फ़िर खुश रहिये, कभी फोड़िये, कभी पपेरों के सामने ZUC जाइये, लेकिन बस तनावमुक्त रहिये और पढ़ाई और दूसरी चीज़ों का अच्छा ताल-मेल बनाए रखिये [आख़िर घर वालों ने आपको इतनी दूर मुख्यतः पढने के लिए ही भेजा है] |
आप सभी को मेरी तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं ||
-प्रतीक
रविवार, 28 सितंबर 2008
A-Z एक विद्युत अभियंता की ज़बानी
एक विद्युत अभियंता....अरे साहब इसका मतलब Electrical Engineer है, का A-Z कुछ इस तरह बदल गया है..
नींद में भी पूछेंगे तो सही जवाब मिलेगा...100 प्रतिशत..
A - Apple to Amplifier (परिवर्धक)
B - Bat/Ball to BJTs
C - Cat to Current (विद्युत धारा)
D - Dog to DANG !!!! (जी हाँ शायद आप लोगों को पता हो DANG के बारे में)
E - Eagle to Electric Field (विद्युत क्षेत्र)
F - Fan to Forward Bias (अग्र अभिनति)
G - Goat to Generators (उत्पादन-यन्त्र)
H - Horse to Hysteresis (शैथिल्य)
I - Ink to Inductor (प्रेरित्र)
J - Jam to Current Density(J) (विद्युत घनत्व)
K - Kite to KCL
L - Lotus to LEDs (प्रकाश उत्सर्जक डायोड)
M - Man to MOSFET (धातु आक्साइड अर्द्धचालक क्षेत्र प्रभावी ट्रांजिस्टर)
N - Nest to NMOS (N-धातु आक्साइड अर्द्धचालक)
O - Owl to Op-Amp(परिचालन परिवर्धक)
P - Pen to PMOS (P-धातु आक्साइड अर्द्धचालक)
Q - Queen to Charge(Q)
R - Rabbit to Resistance (प्रतिरोधक)
S- Ship to SPICE
T- Tomato to Tesla
U - Umbrella to Unity Gain (ऐक्य लाभ)
V - Van to Voltage (विद्युत दाब)
W - Watch to Wires, Wires and Wires (तार तार कर दिया)
X - Xylophone to Reactance(X)
Y - Yatch to Admittance(Y) (प्रवेशाज्ञा)
Z - Zebra to Impedance(Z) (प्रतिबाधा)
आभार : Maverickks
. . . .
नींद में भी पूछेंगे तो सही जवाब मिलेगा...100 प्रतिशत..
A - Apple to Amplifier (परिवर्धक)
B - Bat/Ball to BJTs
C - Cat to Current (विद्युत धारा)
D - Dog to DANG !!!! (जी हाँ शायद आप लोगों को पता हो DANG के बारे में)
E - Eagle to Electric Field (विद्युत क्षेत्र)
F - Fan to Forward Bias (अग्र अभिनति)
G - Goat to Generators (उत्पादन-यन्त्र)
H - Horse to Hysteresis (शैथिल्य)
I - Ink to Inductor (प्रेरित्र)
J - Jam to Current Density(J) (विद्युत घनत्व)
K - Kite to KCL
L - Lotus to LEDs (प्रकाश उत्सर्जक डायोड)
M - Man to MOSFET (धातु आक्साइड अर्द्धचालक क्षेत्र प्रभावी ट्रांजिस्टर)
N - Nest to NMOS (N-धातु आक्साइड अर्द्धचालक)
O - Owl to Op-Amp(परिचालन परिवर्धक)
P - Pen to PMOS (P-धातु आक्साइड अर्द्धचालक)
Q - Queen to Charge(Q)
R - Rabbit to Resistance (प्रतिरोधक)
S- Ship to SPICE
T- Tomato to Tesla
U - Umbrella to Unity Gain (ऐक्य लाभ)
V - Van to Voltage (विद्युत दाब)
W - Watch to Wires, Wires and Wires (तार तार कर दिया)
X - Xylophone to Reactance(X)
Y - Yatch to Admittance(Y) (प्रवेशाज्ञा)
Z - Zebra to Impedance(Z) (प्रतिबाधा)
आभार : Maverickks
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रविवार, 21 सितंबर 2008
मैं MuE पॉज़िटिव हूँ
आज आपको दो ऐसे लोगों से मिलवाता हूँ जो 2 अलग-अलग बिमारियों से पीड़ित हैं :
पहला इंसान(A) HIV+ है और दूसरा(B) MuE का मारा MuE+ है :
उनके बीच एक वार्तालाप चल रही है :
A : क्या तुम्हें पता है, HIV होने के कारण क्या-क्या है ?
B : [थोड़ा हिचकिचाते हुए - भारतीय समाज की max जनता अभी भी इन सब मुद्दों के बारे में चुप्पी साधे हुए है] - हाँ हाँ पता है न..HIV होने के मुख्य कारण कुछ इस प्रकार हैं :
1.) Unprotective Sexual Relations
2.) Unsecure Blood Transfer
3.) From Mother to Baby
4.) Use of Unsterilized Syringes
A : भाई वाह यह तो काफ़ी अच्छी बात है की तुम्हे HIV के बारे में इतना कुछ पता है..
B : अच्छा HIV तो एक जगह है..क्या तुम्हें पता है मैं MuE+ कैसे हुआ..
A : [अचरज करते हुए] यह किस बिमारी का नाम है ??
B : [बहुत खुश हो के बताते हुए]...नहीं पता तो सुनो यह दर्द भरी कहानी...
MuE+ होने के मुख्य कारण कुछ इस प्रकार हैं :
1.) Unprotective MOS(exual) Relations
2.) Unsecure Discipline Transfer to A3/A8.
3.) From GHOT Senior to Ultra GHOT Junior
4.) Use of Unbiased Transistors
A : [दुःख जताते हुए] यह तो बहुत ही बुरा हुआ तुम्हारे साथ.
B : यह केवल मेरे साथ ही नहीं बल्कि तमाम 3rd year के EEE/EnI वालों के साथ हुआ है..
अगर अफ्रीका मैं हर 3 इंसान में से 1 इंसान HIV+ है तो यहाँ मालवीय भवन में हर 2 कमरों में से 1 MuE+ है..
A : यह तो बहुत ही बुरा हो रहा है तुम सभी लोगों के साथ..मुझे तुम लोगों से बहुत हमदर्दी है..
[B MuE के गुरु को याद करके सोच रहा है..यह देख HIV+ बन्दे की सहानुभूति भी हमारे साथ है...आख़िर हमने ऐसा कौन सा जुर्म किया है जो हमें MuE+ होने की सज़ा दे दी है..??.क्यों क्यों...]
A : अच्छा एक जानकारी और दे दूँ..
HIV इन सब कारणों से नहीं फैलता है :
1. Casual contacts,Shaking hands
2. Sharing utensils while eating together,Sharing of bathroom, toilet etc
3. Coughing, sneezing onto the face of any person..
4. Regular body tests...
B : अच्छा मैं भी एक जानकारी दे दूँ..
MuE इन सब कारणों से फैलता है :
1. Casual Chit-Chatting about MOS circuits..
2. Sharing computers of O-Lab...
3. Concentrating, sneaking into the MuE lectures every T/Th/Sat..
[includes extra class]
4. Regular MuE tuts/tests/labs/examinations..
A : अरे एक बात और..लोगों तक यह बात पहुँचा दो कि HIV+ भी आम लोगों कि तरह ही हैं..
और उन्हें बाकी लोगों की तरह प्यार और मोहब्बत मिलनी चाहिए..
B : मैं भी एक बात कहना चाहता हूँ कि MuE+ लोग आम लोगों की तरह नहीं हैं..
उन्हें बाकी लोगों से काफ़ी ज़्यादा प्यार,मोहब्बत और सांत्वना की ज़रूरत है..
A : अरे हाँ यह बिमारी कुछ सालों बाद AIDS में बदल जाती है जिसके बाद इंसान के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है..
B : लेकिन MuE+ किसी और बिमारी में नहीं बदलती है...आदमी के बारे में अंदाजा सेमेस्टर
के शुरुआत में ही पता चल जाता है...इंसान को कुछ 4.5 महीनों में ही NC लग जाता है जो कि
मरने से भी बुरा है..फिलहाल..
इसी बिमारी(MuE+) को लेकर फिलहाल कुछ 100-120 बच्चे जी रहे हैं..कृपया इन सभी लोगों के लिए प्रार्थना करते रहिये..आख़िर ये भी हमारे समाज का ही हिस्सा है..कुछ महान लोगों की गलतियों को ये बेचारे बच्चे क्यों भुगतें???
N.B. - इस article का श्रेय मेरे अलावा मेरे कुछ wingies को भी जाता है..हम सभी के विचारों को मैंने अपने ब्लॉग के ज़रिये आप सभी तक पहुँचाया है..
अगर किसी को इस article से ठेस पहुँची हो तो मैं उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ....यह बिल्कुल भी personal नहीं है..
अगले ब्लॉग तक circuit बनाते रहिये, bias करते रहिये, source को drain,drain को gate और gate को source से जोड़ते रहिये और सबसे पहले MuE+ रहिये.
**** अगर आप मेरा ब्लॉग regularly पढ़ते हैं तो अनुयायी-Followers में ख़ुद को add कर लें..
-प्रतीक
पहला इंसान(A) HIV+ है और दूसरा(B) MuE का मारा MuE+ है :
उनके बीच एक वार्तालाप चल रही है :
A : क्या तुम्हें पता है, HIV होने के कारण क्या-क्या है ?
B : [थोड़ा हिचकिचाते हुए - भारतीय समाज की max जनता अभी भी इन सब मुद्दों के बारे में चुप्पी साधे हुए है] - हाँ हाँ पता है न..HIV होने के मुख्य कारण कुछ इस प्रकार हैं :
1.) Unprotective Sexual Relations
2.) Unsecure Blood Transfer
3.) From Mother to Baby
4.) Use of Unsterilized Syringes
A : भाई वाह यह तो काफ़ी अच्छी बात है की तुम्हे HIV के बारे में इतना कुछ पता है..
B : अच्छा HIV तो एक जगह है..क्या तुम्हें पता है मैं MuE+ कैसे हुआ..
A : [अचरज करते हुए] यह किस बिमारी का नाम है ??
B : [बहुत खुश हो के बताते हुए]...नहीं पता तो सुनो यह दर्द भरी कहानी...
MuE+ होने के मुख्य कारण कुछ इस प्रकार हैं :
1.) Unprotective MOS(exual) Relations
2.) Unsecure Discipline Transfer to A3/A8.
3.) From GHOT Senior to Ultra GHOT Junior
4.) Use of Unbiased Transistors
A : [दुःख जताते हुए] यह तो बहुत ही बुरा हुआ तुम्हारे साथ.
B : यह केवल मेरे साथ ही नहीं बल्कि तमाम 3rd year के EEE/EnI वालों के साथ हुआ है..
अगर अफ्रीका मैं हर 3 इंसान में से 1 इंसान HIV+ है तो यहाँ मालवीय भवन में हर 2 कमरों में से 1 MuE+ है..
A : यह तो बहुत ही बुरा हो रहा है तुम सभी लोगों के साथ..मुझे तुम लोगों से बहुत हमदर्दी है..
[B MuE के गुरु को याद करके सोच रहा है..यह देख HIV+ बन्दे की सहानुभूति भी हमारे साथ है...आख़िर हमने ऐसा कौन सा जुर्म किया है जो हमें MuE+ होने की सज़ा दे दी है..??.क्यों क्यों...]
A : अच्छा एक जानकारी और दे दूँ..
HIV इन सब कारणों से नहीं फैलता है :
1. Casual contacts,Shaking hands
2. Sharing utensils while eating together,Sharing of bathroom, toilet etc
3. Coughing, sneezing onto the face of any person..
4. Regular body tests...
B : अच्छा मैं भी एक जानकारी दे दूँ..
MuE इन सब कारणों से फैलता है :
1. Casual Chit-Chatting about MOS circuits..
2. Sharing computers of O-Lab...
3. Concentrating, sneaking into the MuE lectures every T/Th/Sat..
[includes extra class]
4. Regular MuE tuts/tests/labs/examinations..
A : अरे एक बात और..लोगों तक यह बात पहुँचा दो कि HIV+ भी आम लोगों कि तरह ही हैं..
और उन्हें बाकी लोगों की तरह प्यार और मोहब्बत मिलनी चाहिए..
B : मैं भी एक बात कहना चाहता हूँ कि MuE+ लोग आम लोगों की तरह नहीं हैं..
उन्हें बाकी लोगों से काफ़ी ज़्यादा प्यार,मोहब्बत और सांत्वना की ज़रूरत है..
A : अरे हाँ यह बिमारी कुछ सालों बाद AIDS में बदल जाती है जिसके बाद इंसान के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है..
B : लेकिन MuE+ किसी और बिमारी में नहीं बदलती है...आदमी के बारे में अंदाजा सेमेस्टर
के शुरुआत में ही पता चल जाता है...इंसान को कुछ 4.5 महीनों में ही NC लग जाता है जो कि
मरने से भी बुरा है..फिलहाल..
इसी बिमारी(MuE+) को लेकर फिलहाल कुछ 100-120 बच्चे जी रहे हैं..कृपया इन सभी लोगों के लिए प्रार्थना करते रहिये..आख़िर ये भी हमारे समाज का ही हिस्सा है..कुछ महान लोगों की गलतियों को ये बेचारे बच्चे क्यों भुगतें???
N.B. - इस article का श्रेय मेरे अलावा मेरे कुछ wingies को भी जाता है..हम सभी के विचारों को मैंने अपने ब्लॉग के ज़रिये आप सभी तक पहुँचाया है..
अगर किसी को इस article से ठेस पहुँची हो तो मैं उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ....यह बिल्कुल भी personal नहीं है..
अगले ब्लॉग तक circuit बनाते रहिये, bias करते रहिये, source को drain,drain को gate और gate को source से जोड़ते रहिये और सबसे पहले MuE+ रहिये.
**** अगर आप मेरा ब्लॉग regularly पढ़ते हैं तो अनुयायी-Followers में ख़ुद को add कर लें..
-प्रतीक
मंगलवार, 16 सितंबर 2008
बचाओ "कोई" तो बचाओ..
कल सुबह MuE का ट्यूट है और अभी सब कुछ लाइट लेने का मन कर रहा है और क्यों न करे...
पढ़ के जाओ तो भी ZUC नहीं पढ़ के जाओ तो भी ZUC...आगे कुँआ पीछे खाई...
हे भगवान् कोई बचाओ MuE के इंस्ट्रक्टर से ....मैं भी पागल हूँ...भगवान् से कह रहा हूँ और आगे "कोई" लगा दिया..
MuE Fact फाइल :
1. यही एक कोर्स है जिसमें आप एक्जाम हॉल में सबसे ज़्यादा confidence के साथ जाते हैं और निकलते भी हैं..आख़िर क्यों नहीं ??? जब "ZUC" पक्का है तो क्या बाकी रहा...इसका मतलब MuE instills confidence in u...
2. इंस्ट्रक्टर चाहती है कि आप सेम भर MuE ही पढ़ें..बाकी हर कोर्स बकवास है..
3. इंस्ट्रक्टर का यह मानना है कि ज़िन्दगी में जिसने O-lab में 100-150 घंटे नहीं बिताए उसे मोक्ष कि प्राप्ति नहीं होगी..
4. आपकी ज़िन्दगी O-Lab के O से शुरू होकर O-Lab के O पर ही ख़त्म हो जाती है अगर आप EEE/EI में हों तो...zuc से शुरू हुई ज़िन्दगी zuc पे खत्म...
5. आगे अगर कोई कुछ जोड़ना चाहे तो आप से विशेष आग्रह है...जल्दी से जल्दी करें...
भगवान् "कोई" तो बचाए इस कोर्स से...
वो "कोई" और कोई नहीं पर ख़ुद हमारी इंस्ट्रक्टर ही है..
जय भवानी जय AG....
टाटा...चला मैं MuE पढने..
*एक बात बताऊँ....जब indic transliteration mein "MuE" type करके space मारते हैं तो "मुए" लिखा हुआ आता है..
how appropriate Mr.Google...hats off !!!!
-प्रतीक
पढ़ के जाओ तो भी ZUC नहीं पढ़ के जाओ तो भी ZUC...आगे कुँआ पीछे खाई...
हे भगवान् कोई बचाओ MuE के इंस्ट्रक्टर से ....मैं भी पागल हूँ...भगवान् से कह रहा हूँ और आगे "कोई" लगा दिया..
MuE Fact फाइल :
1. यही एक कोर्स है जिसमें आप एक्जाम हॉल में सबसे ज़्यादा confidence के साथ जाते हैं और निकलते भी हैं..आख़िर क्यों नहीं ??? जब "ZUC" पक्का है तो क्या बाकी रहा...इसका मतलब MuE instills confidence in u...
2. इंस्ट्रक्टर चाहती है कि आप सेम भर MuE ही पढ़ें..बाकी हर कोर्स बकवास है..
3. इंस्ट्रक्टर का यह मानना है कि ज़िन्दगी में जिसने O-lab में 100-150 घंटे नहीं बिताए उसे मोक्ष कि प्राप्ति नहीं होगी..
4. आपकी ज़िन्दगी O-Lab के O से शुरू होकर O-Lab के O पर ही ख़त्म हो जाती है अगर आप EEE/EI में हों तो...zuc से शुरू हुई ज़िन्दगी zuc पे खत्म...
5. आगे अगर कोई कुछ जोड़ना चाहे तो आप से विशेष आग्रह है...जल्दी से जल्दी करें...
भगवान् "कोई" तो बचाए इस कोर्स से...
वो "कोई" और कोई नहीं पर ख़ुद हमारी इंस्ट्रक्टर ही है..
जय भवानी जय AG....
टाटा...चला मैं MuE पढने..
*एक बात बताऊँ....जब indic transliteration mein "MuE" type करके space मारते हैं तो "मुए" लिखा हुआ आता है..
how appropriate Mr.Google...hats off !!!!
-प्रतीक
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