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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

दो दिन ज़िन्दगी के

याद है वो कहावत, "चार दिन की है ये ज़िन्दगी.."? याद तो होगा ही, पर मुझे लगता है कि समय आ गया है इस कहावत को बदलने का। अब क्या कहें, समय और समाज में जो बदलाव आये हैं उसमें तो ये बदली हुई पंक्तियाँ ही सटीक लग रही हैं "दो दिन ज़िन्दगी के.."

कितनी आसान थी उस छोटे से शहर में अपने छोटे ख़्वाबों को चुनते, एक दूसरे से बुनते हुए वो साधारण सी ज़िन्दगी। आह! सरल, सुखी और समृद्ध सा अलसाया हुआ जीवन। मुझे याद नहीं आता कि कभी हम हफ्ते के उन दो दिनों का इतने बेसब्री से इंतज़ार करते हों जितना आज करते हैं। बड़े शहर में आ कर सपने तो बड़े हो गए पर समय? समय दिन-ब-दिन छोटा होता जा रहा है।

सुबह से शाम कब हो जाती है, AC के डब्बे में बैठकर पता ही नहीं चलता। मौसम को आखिरी बार बदलते हुए कब देखा था पता नहीं। अब तो सिर्फ सर्दी-जुखाम-बुखार से ही बदलते मौसम का अंदेशा होता है। 5 दिन कब हवा बन के नज़रों के सामने से गुज़र जाती है ये खबर कानों को भी नहीं मिलती। खबर बस यही गरम रहती है कि "भाई, Saturday-Sunday आ गया"! ऐसा लगता है मानो हम इन दो दिनों के सेवक बन गए हैं। 5 दिन किसी और की सेवा करते हैं और 2 दिन शनि-रवि की।

कैसी घिसती हुई सी ये ज़िन्दगी हो गई है जो
हर हफ्ते उन दो दिनों की मोहताज हो जाती है,
हर हफ्ते वही दो दिन जिसमें हम जीने की कोशिश करते रहते हैं,
वही दो दिन जब हम अपने आसपास एक छलावे भरा जाल बुनकर समझते हैं कि इसमें हम जी लेंगे,
वही दो दिन जब हम अपने परिवार के साथ कुछ वक़्त बिताने की कोशिश करते हैं!

पर सोमवार आते ही रटते वही हैं कि "यार ये दो दिन कब उड़ गए पता ही नहीं चला"। सवाल ये है कि क्या हम अपनी ज़िन्दगी को बस उड़ते हुए ही देख रहे हैं या असल में जी भी रहे हैं?

क्या ज़िन्दगी का मकसद बहुत पैसे कमाना और उन दो दिनों में उनको बेहिसाब खर्च कर देना ही है? सुबह 8 से शाम की 8 बजाकर अगली सुबह की उधेढ़बुन में ही मचलते रहना, क्या यही है वो ज़िन्दगी जिसकी आप तलाश कर रहे हैं? सवाल तो बहुत बड़ा है पर जवाब इससे भी बड़ा होगा और यह जवाब हमें खुद के गिरेबान में झांककर ही मिलेगा।

ज़िन्दगी आसान तो नहीं ही है पर कम से कम इसे उलझन तो न बनाएं। 2 दिन की छुट्टी मिलेगी या नहीं, यही परेशानी आपको महीनों पहले खाने लगती है। आज घर जल्दी चला जाऊँ क्या? इस बार सैलरी कितनी बढ़ेगी? मेरा बॉस मेरे बारे में क्या सोचता है? मैं ऐसा क्या करूँ की प्रमोशन जल्दी हो जाए? आज हम वो 5 दिन इन्हीं सब सवालों से घिरकर निकाल रहे हैं। किसी ने सच ही कहा है, हम सादी कमीज़ और काली पतलून डाले हुए, हैं तो बंधुआ मजदूर ही। गले में एक कॉर्पोरेट पट्टा डालकर हम बन जाते हैं पूर्णतः एक कॉर्पोरेट कुत्ता!

अपनी जीवन की भीतरी अभिलाषाओं का खून करके, उसका गला घोंटकर, अपने ज़मीर को दबाकर, अपने भीतर के बचपन को मारकर, सलीकेदार बने रहकर, समाज की सीमाओं में बंधकर, एक-एक दिन दासों की तरह काटकर, अपनी उँगलियों को कीबोर्ड पर घिसकर आखिर कब तक हम अपने आपको धोखा देते रहेंगे? कभी सोचा है कि आखिरी साँस लेते वक़्त ये धोखा हमें अपनी मौत से पहले ही मार देगा? कहावत तो बदलते रहेंगे। कभी चार दिन, तो कभी दो दिन की हो जाएगी ज़िन्दगी पर आपके पास तो सिर्फ एक ही ज़िन्दगी है। आप कब इसे हर दिन, हर पल, हर साँस के साथ जीने की ललकता दिखाएँगे? जवाब आप ही के अन्दर है। आने वाले Saturday-Sunday में खोजने की कोशिश कीजियेगा!

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

रिश्तों की डोर

रश्मि उन लाखों लड़कियों की तरह है जो आज बेबाक, आज़ाद और खुले माहौल में रहना पसंद करती हैं और रहती भी हैं। पहले पढ़ाई के लिए कई साल घर से दूर रही और उसके बाद से नौकरी करते हुए भी घर से दूर रहती है। रश्मि के मम्मी-पापा ने कभी उसके निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया बस अपने सुझाव भर दिए. आज एक अच्छी कंपनी के एक अच्छी पोस्ट पर रश्मि आसीन है।

जैसा कि अक्सर होता है, माँ-बाप दूर रहने वाले अपने बच्चों से दिन में दो मिनट बात कर दिल को तसल्ली दे देते हैं, वैसा ही यहाँ भी था। हर रोज़ एक-दो दफे माँ और पापा, दोनों से रश्मि की बात हो ही जाती थी। जब बात हाल-चाल तक कि रहती, तब तक तो ठीक था पर जब माँ के सवाल ऑफिस, वहाँ के लोग, दूसरे दोस्त और अन्य निजी मामलों पर पहुँचती तो रश्मि थोड़ी खीज जाती थी। उसे लगने लगता जैसे कोई उसके पंखों को पकड़ कर नीचे गिराने की कोशिश कर रहा है परन्तु ऐसा था नहीं। रश्मि केवल एक बेटी होने की हैसियत से ही सोचती थी। सच ही है, जब तक आप खुद माँ या बाप नहीं बन जाते, आप अपने माँ-बाप का आपके प्रति व्यवहार को समझ नहीं सकते। इसी खीज की वजह से कई बार वह बहाना बना कर फ़ोन काट देती।

ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा और रिश्ता यूँ ही संभालता रहा। पर एक दिन उसके पापा का फ़ोन आया और अगले ही दिन वो अपने घर पर थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा उसके साथ भी हो सकता है। पिछले रोज़ ही माँ घर पर काम करती हुई अचानक ज़मीन पर फिसली और दुर्भाग्यवश उनका सिर पास ही रखे टेबल की नोक से जा टकराया। विधि का विधान ही था कि एक चोट ने रश्मि से उसकी माँ को छीन लिया। यह घटना जितनी दर्दनाक थी, उतनी ही ये सभी के लिए भयावह थी। महीने भर तक घर में सन्नाटा पसरा रहा और फिर ज़िन्दगी के क्रूर नियम के हिसाब से सबने अपनी अपनी डोर फिर संभाल ली

रश्मि वापस अपने शहर आ गई और ऑफिस में व्यस्त हो गई पर हर रात वो अपने कमरे के कोने में बैठकर रोती थी। अपने फ़ोन को देखते हुए सोचती थी कि शायद यह सब एक अनचाहा सपना हो और उसके माँ के नाम से यह फ़ोन फिर से बज उठे। वो अपनी माँ से बात करना चाहती थी, उनकी आवाज़ सुनना चाहती थी, अपने ऑफिस, अपने दोस्तों, अपने बारे में, सब कुछ बताना चाहती थी। अब उसके पास कोई बहाना नहीं था पर समय का चक्र निर्दयी होता है। आज एक तरफ जब उसके पास बात न करने का बहाना नहीं था तो दूसरी और उसके फ़ोन के दूसरी ओर से अब कभी माँ की आवाज़ नहीं आती थी। वह ग्लानि और पश्चाताप में जीने को मजबूर थी। अब वो दिन ढल गए थे जब यह सब कितना आसान था।

सोमवार, 29 सितंबर 2014

सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगल
राहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई है पर कार्य प्रगति पर है.

हमारी ही तरह राहुल भी सोशल मीडिया का भोगी है, आसक्त है. जो करता है, वहाँ बकता है. लोगों को लगता है कितना बोलता है, हर बात यहाँ खोलता है. कभी फेसबुक तो कभी ट्विटर तो कभी व्हाट्सऐप. हर जगह उसकी मौजूदगी है. करोड़ों-अरबों लोगों की तरह ही वो भी दिन भर बकर बकर करता रहता है.

ऐसा लगता है जैसे सुनने वाले तो बचे ही नहीं, सब बोलने वाले और इज़हार करने वाले ही इस दुनिया में रह गए हैं. अगर बोलना कला है तो सुनना उससे भी बड़ी कला है पर आज की अगड़म-बगड़म ज़िन्दगी में लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि सुनना भी एक कला है क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ बकना ही सीखा है.

इस आसक्ति का शिकार हुए राहुल को यह पता ही नहीं चला कि जो वो सोशल मीडिया और फ़ोन पर तरह तरह के ऐप्स से दुनिया से जुड़ा हुआ है, दरअसल वह इस सिलसिले में खुद से ही कट चुका है. नौकरी करने, घर चलाने और सोशल मीडिया के भ्रमित दिखावे की बराबरी करने के चक्कर में कब वह अन्दर से टूट गया यह उसे एक दिन पता चला जब वह अपने कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठा था. अचानक उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी कि वो करना क्या चाहता है, कर क्या रहा है और भी न जाने कैसे-कैसे उटपटांग सवाल.

ऐसा पहली बार हुआ था जब वो खुद का विश्लेषण कर रहा था और करते करते बेहद डर गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे बात करे, क्योंकि यहाँ सुनने वाला तो कोई है ही नहीं, सिर्फ बोलने वाले लोग ही बचे हैं. वह अपने फेसबुक की लिस्ट खंगालता है, ट्विटर पर अनजान दोस्तों के फेहरिस्त जांचता है और फ़ोन पे अनगिनत नंबरों को टटोलता है पर एक ऐसा इंसान नहीं ढूंढ पाता जो सिर्फ और सिर्फ उसे सुने, कुछ कहे नहीं, अपनी सलाह न थोपे. उसका मन उदास हो जाता है और वह सब कुछ बंद करके सोने की नाकाम कोशिश करता है.

ऐसा कई दिन चलता है. कई चीज़ें आप अपने घरवालों से नहीं अपितु अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं पर राहुल तो इस वैकल्पिक जद्दोजहद में एक दोस्त भी न बना पाया था. सब पानी के बुलबुले की तरह इधर उधर उड़ते दिखे और अंततः मानसिक तनाव, नौकरी के दबाव और ज़िन्दगी से बिखराव ने राहुल के दिमाग को चरमरा दिया और उसे उदासी (डिप्रेशन) के गड्ढे में गिरा दिया.

एक हँसता, बोलता, खिलखिलाता नौजवान भरी जवानी में उदासी का शिकार हुआ क्योंकि उसको सलाह देने वाले तो बहुत थे पर सुनने वाला एक भी नहीं.

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

सस्ती जान

राकेश और मोहित, पक्के दोस्त. स्कूल में ११वीं में एक साथ थे. वैसे तो दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे पर युवावस्था में आ कर सभी शौकीन हो जाते हैं क्योंकि ये समय ही होता है बेपरवाह उड़ने का.

दोनों को चौपाटी में जा कर खाने का बड़ा शौक था. शहर के एक व्यस्त बाजार में सड़क किनारे खाने का वो आनंद किसे नहीं होगा? पर चूँकि यह जगह उनके घर से दूर था, तो कभी-कभार बस पकड़ के पहुँच जाते था. चंद महीनों पहले मोहित के पापा ने घर के लिए स्कूटी खरीद ली थी और मोहित के लिए 'लर्नर्स लाइसेंस' भी बनवा दिया था. गाहे-बगाहे दोनों इसी स्कूटी पर मस्ती मारने निकल पड़ते पर घर से यह सख्त हिदायत थी कि दोनों को हेलमेट पहनना पड़ेगा. शहर में भी यही नियम था.

घर से निकलते वक़्त तो दोनों हेलमेट पहने हुए निकलते पर अगले ही नुक्कड़ पर पीछे बैठा यात्री अपना हेलमेट अपने हाथों में टांग लेता. फिर तो बस उन चौराहों पर जहाँ पुलिस खड़ी होती, वहीँ पर हेलमेट सिर पर सजता था नहीं तो हाथ पर. कई महीनों तक ऐसा चलता रहा और अब तो यह आदत सी बन चुकी थी. वैसे भी हिंदुस्तान में जान जाने से ज़्यादा चालान कटने का डर लगता है.

बस काल को इसी एक दिन का इंतज़ार था. दोनों चौपाटी की ओर बढ़ चले थे और पुलिस चौराहा पार करते ही पीछे बैठे राकेश ने अपना हेलमेट सिर से उतारकर हाथों में टिका लिया था. सड़क के अगले कोने पर ही एक बदहवास कुत्ता न जाने कहाँ से उनके सामने आ गया और तीव्र गति में चल रही स्कूटी को मोहित संभाल न सका और कुत्ते से बचने के चक्कर में पास ही में चल रहे डिवाइडर पर स्कूटी दे मारी.

इसके बाद दोनों हवा में उछल के सड़क के उस पार और फिर मोहित को कुछ याद नहीं. शायद कई दिन बीत गए थे और आज जा कर अस्पताल में उसकी आँखें खुली. कमरे में इस वक़्त कोई नहीं था. बस एक अखबार पड़ा था जिसमें एक फोटो थी एक नौजवान की. वह गिरा पड़ा था सड़क पर और उसके हाथों में एक हेलमेट अटका हुआ था. उसके सिर से खून का तालाब सड़क पर बन चुका था. नीचे लिखा था:

"जान सिर में होती है, हाथों में नहीं" -ट्रैफिक पुलिस

साभार: गूगल

 

रविवार, 30 मार्च 2014

हो रहा महिला सशक्तिकरण!

अनिता और पूनम पहली बार कॉलेज में ही मिली थी और समय के साथ बहुत ही गहरी दोस्त बन गयी थीं। चूँकि उनकी संकाय भी एक ही थी तो क्लास जाना, परीक्षा के लिए पढ़ना, असाइनमेंट पूरा करना, इत्यादि इत्यादि सब साथ में होता था।

जब इतनी देर साथ रहते थे तो कई सारी चर्चाएं भी दोनों के बीच होती जो कि लड़कों, रिश्तों, प्रोफेसर्स, घर, देश, इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमता था। महिला दिवस के आसपास मार्किट में महिला सशक्तिकरण को लेकर बेहद गरम लू चली। अख़बार, टीवी, ब्लॉग, फेसबुक, हर जगह कोई न कोई अपने मन की भड़ास उढ़ेल रहा था।

चित्र: साभार गूगल बाबा
एक बार कॉलेज की छुट्टी होने के बाद दोनों घर को निकली तो रास्ते में अनिता ने कहा, "महिला सशक्तिकरण के नाम पर जो आरक्षण का ढकोसला सरकार ने किया है, वह हमें सशक्त नहीं बनाएगा।"
इसपर पूनम ने भी हामी भरते हुए कहा, "सही कह रही हो। हम लड़कियों को पुरुषों की तरफ से विशेष व्यवहार या सुविधाओं की ज़रूरत नहीं है। हम खुद में सक्षम हैं और यह हम हर क्षेत्र में करके भी दिखा रही हैं।"

दोनों में इसी तरह सरकार की नीतियों और महिलाओं को ख़ास सुविधाएं दे कर महिलाओं को और कमज़ोर करने की बात पर रास्ते भर वार्तालाप हुई और वो ऐसी व्यवस्था को कोसती रहीं।

फिर दोनों घर जाने के लिए मेट्रो में चढ़ीं और तुरंत ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे दो नौजवानों को उठने को कहा और खुद वहाँ बैठकर महिला सशक्तिकरण पर विचार को आगे बढ़ाने लगीं।


जब तक ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं इस सशक्तिकरण का सही अर्थ ढूंढती हैं, तब तक मेरी आवाज़ में एक गीत (राबता) सुनते चलिए यहाँ पर!

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मेरा वोट, मेरा देश

वैसे तो ४ राज्यों में चुनाव हो गए हैं पर अभी लोक सभा चुनाव जैसा शेर आने को तैयार हो रहा है तो यह कृति तब के लिए भी उतना अर्थ रखेगी।
यह कविता एक प्रतियोगिता के तहत लिखी थी पर उसका परिणाम आया नहीं है सो अब ब्लॉग पर डाल रहा हूँ। आशा है कि आप भी एक जागरूक भारतीय कि तरह अपने हक यानी "वोट" का इस्तेमाल ज़रूर करेंगे।
माना कि हम में से कईयों के १-२ दिन की छुट्टी ले कर अपने अपने इलाके में जा कर वोट करना होगा पर देश के लिए ५ साल में १-२ दिन निकालना हमारा फ़र्ज़ है।
और ज्यादा नहीं कहूँगा, आप कविता पढ़ सकते हैं और स्व-संगीतबद्ध सुन भी सकते हैं
बताइयेगा कैसा लगा।




"दसवीं पास है लड़का"
सुनकर, नाक-भौं सिकोड़ते हो
"इंजीनियर है लड़का" सुनकर, पूरे तुम अकड़ते हो
पर
"अंगूठा छाप है नेता" सुनकर
क्यों आती नहीं चेहरे पर सिकुड़न?
पांचवी फेल नेता को चुनकर
भी क्यों है ये तुममें अकड़न?
जो पढ़ नहीं सकता "क ख ग़ घ"
क्या गढ़ पाएगा वह इतिहास?
चुनो पढ़े-लिखे सच्चों को
तभी होगा देश का विकास!

"वो है बलात्कारी" सुनकर, थूकते नहीं तुम थकते हो
"वो है व्यभिचारी" सुनकर, बंद दरवाज़े करते हो
पर
बलात्कार करता नेता तो
थूक को क्यों पी लेते हो?
अनाचारी नेता को घर में
क्यों तुम घुसने देते हो?
दामिनियों की लूटता इज्ज़त
क्या कर पाएगा उनकी रक्षा?
चुनो सदाचारी नेता को
तभी मिलेगी हमें सुरक्षा!


"एक गुंडा पकड़ा चौराहा पर", सुनके हाथ गरमते हो
"एक चोर पकड़ा पब्लिक में", तब तो खूब गरजते हो
पर
जब जीते चुनाव एक गुंडा
तब तुम क्यों नरमते हो?
जब चोर बनता है साहूकार
तब क्यों नहीं तुम गरजते हो?
जो लूटता है अपने लोगों को
क्या जुट पाएगा देश के लिए?
चुनो साफ छवि नेता को
बदलने परिवेश के लिए!


चंद पैसे खरीदे इज्ज़त तुम्हारी, तब बातें बड़ी तुम करते हो
चंद सिक्के तोले ज़मीर तुम्हारी, तब ज्ञानी बड़े तुम बनते हो
पर
जब बिकता है परिवार वोटों में
तब बातों से क्यों छुपते हो?
जब नेता करता लोभ पर शासन
तब ज्ञान कुँए में ढकेलते हो?
खरीदता है वोट जो नेता
क्या देश को न बेच आएगा?
चुनो सशक्त, अभिमानी नेता
भ्रष्टाचार मिट्टी में मिलाएगा!


चुनो उसे जो भ्रष्ट दिलों में
कहर बन कर छाएगा
चुनो उसे जो तुममें, मुझेमें
सुरक्षा भाव फैलाएगा
चुनो उसे जो कल के युग में
शिक्षा समृद्धि लाएगा
चुने उसे जो गरीबों को भी
स्वाभिमानी बनाएगा
चुनो उसे जो लोगों की खातिर
तन-मन अपना लुटाएगा
चुनो उसे जो देश की खातिर
जीवन अपना बिताएगा!

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

मुझसे होगी शुरुआत!

यह गीत एक प्रतियोगिता के लिए लिखा और संगीतबद्ध किया था. इस स्वतंत्रता दिवस पर सबको उम्मीद है एक बदलाव की और वो बदलाव की शुरुआत खुद से होगी.

सब ओर है भ्रष्टाचार की बात
देश को जकड़े जिसके दांत
आओ अब सब कहें
मुझसे होगी शुरुआत!

लूटा है नेताओं ने देश तो क्या?
बदला है सच्चाई ने भेष तो क्या?
उठा यह नेकी का पुलिंदा तू
दहाड़ दे भ्रष्ट कानों में तू
अब हम भी लगा बैठे हैं घात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत!

महंगाई की ये मार हम पर क्यों?
भ्रष्टों को खुली, आज़ाद हवा क्यों?
दृढ़ को निश्चित कर ले तू
डिगा दे हर गद्दार को तू
अब दे देंगे हर पापी को मात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत

गूंगों को इन्साफ मिला है कब?
बिन बोले सुकूं से मरा है कब?
उँगलियों की मुट्ठी बना ले तू
राजाओं की गद्दी हिला दे तू
न रंग, न धर्म और न जात
बोल! मुझसे होगी शुरुआत
हाँ! मुझसे होगी शुरुआत!


इस संगीतमय कविता का विडियो भी आप देख सकते हैं (राजा पुंडलिक अंकल का धन्यवाद इसके लिए)

और केवल ऑडियो भी सुन सकते हैं!


स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं!

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

मधुशाला की राह

नौकरी में रमे हुए राकेश को १ ही साल हुआ था.. अपने कॉलेज में सबसे अच्छे छात्रों में शुमार था और नौकरी में भी अव्वल..

जब अंटे में दो पैसे आने लगे तो मनोरंजन के साधन बदलने लगे.. जहाँ एक ढाबा ही काफी हुआ करता था दोस्तों के साथ, आज बड़े-बड़े होटलों में जाता था..
कभी दारु-सिगरेट नहीं पी पर कुछ ही दिन पहले दोस्तों के उकसाने पर शुरू कर दी.. सोचा कि अब आज़ाद है.. और दोस्तों ने कहा कि शराब पीने से दोस्ती बढ़ती है, रुतबा बढ़ता है... थोड़े पैसे भी हैं.. कुछ नया करते हैं.. कई बेहतर विकल्पों को दर-किनार करते हुए मधुशाला की राह चुनी..

कुछ ही महीनों में भारी मात्र में मय-सेवन होने लगा.. बेवक़ूफ़ दोस्तों ने उसे और उकसाया और अब तो वह पीकर हुड़दंग भी मचाता, आस-पास के लोग परेशान होने लगे..

एक दिन रात को लौटते वक़्त एक कार को अपनी बाईक से टक्कर दे मारी.. नशे में कहा-सुनी भी कर ली.. घर पहुँचने से कुछ पहले पीछे से बाईक पर उसी कार का ज़बरदस्त धक्का लगा और सुनसान रास्ते पर राकेश की लहू से लथपथ लाश अगली सुबह शहर भर में चर्चा में थी.. मधुशाला की राह का अंत हो चुका था..

राकेश के जनाज़े में वही लोग नदारद थे जो कुछ दिनों पहले उसके साथ बैठकर पीते थे.. वो मधुशाला में बैठे, किसी और राकेश का इंतज़ार कर रहे थे..

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

मौत से ज़िन्दगी

मनोज, एक सीधा-साधा मेहनती इंसान... कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्नातक और फिलहाल नौकरी पेशा..
घर पर माँ, एक छोटा भाई और एक छोटी बहन का पूरा बोझ उसके ऊपर..

प्रथम श्रेणी से पास होने के बावजूद एक मामूली नौकरी मिली थी बड़े शहर में.. कुछ से अपना गुज़ारा चलाता और बाकी घर पर भेजता..
बहन की शादी और छोटे भाई के लिए एक दुकान खोल के देने की अंतर-इच्छा थी पर इस नौकरी के भरोसे संभव नहीं था..

कुछ साल बीते तो सर पर जिम्मेवारी मार करने लगी.. अब थोड़ा तंग-तंग रहने लगा था.. और ना ही उसकी काबिलियत के मुताबिक़ उसे नौकरी मिल रही थी...
शहर के दोस्त सिर्फ शहरी थे, दिली नहीं.. किसी से अपना दुःख नहीं बाँट पाता और दिन-ब-दिन परेशानी से घिरता जा रहा था...
कभी-कभी अखबार पढ़ता तो पता चलता कि फलां दुर्घटना में पीड़ित के परिवार को ५ लाख मिले.. फलां बम धमाके में मृत के परिजनों को ७ लाख मिले..

सोचता, कि कभी उसके साथ भी ऐसा हो जाए तो इतने पैसों से उसकी अंतर-इच्छा शायद पूरी हो जाए.. आत्महत्या के लिए कोई पैसे नहीं मिलते थे पर सरकारी दुर्घटना में ज़िन्दगी को चंद पैसों में तोला जाता था जो कि मनोज के परिवार के लिए बहुत था...

पर उसे क्या खबर थी कि यह सोच एक दिन सच्ची खबर में बदल जाएगी..
घर लौट रहा था और ट्रेन दुर्घटना में ज़िन्दगी ने मौत को गले लगाया और फिर सरकार ने मृत के परिवार को ५-५ लाख रूपए धनराशी देने की घोषणा की...

आज एक मौत ने तीन जिंदगियों को जान दी थी पर क्या यही एक रास्ता था? क्या ज़िन्दगी, मौत की मोहताज हो गयी थी?
शायद मनोज के लिए इसके अलावा कोई विकल्प न था और उसका उत्तर "हाँ" ही होता...

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

५०० रूपए


सुधीर और मोहन बहुत ही करीबी दोस्त थे... सर्वसम्पन्न तो दोनों के परिवार थे पर एक जगह जा कर दोनों की राहें अलग हो जाती थीं | दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे और जैसा कि एक आम युवा-दिल होता है.. दोनों में काफी बहस छिड़ी रहती थी.. बालाओं को लेकर, परिवार को लेकर, देश को लेकर, नेताओं को लेकर..

एक दिन दोनों देश में भ्रष्टाचार के ऊपर विचार कर रहे थे |
सुधीर ने कहा – इन नेताओं को तो एक ही पंक्ति में खड़े करके गोली मार देनी चाहिए | न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी | भ्रष्टाचार समाप्त !!
मोहन ने कहा – नेताओं को छोड़, पहले खुद को सुधार | टैक्स बचाने के चक्कर में जो तू फर्जी बिल दिखाता है, वो तो मत दिखा | वैसे भी तुझे पैसे की कमी नहीं है फिर `२००-`३०० बचाकर क्या हासिल करना चाहता है? भ्रष्टाचार तेरे अंदर से शुरू हो रही है |
सुधीर ने कहा – अरे वो मैं... छोड़ ना... `२००-`३०० से क्या फर्क पड़ता है? वैसे तूने कह ही दिया है तो अब से मैं हर महीने `५०० दान दूंगा.. खुश?
वृत्तांत वहीँ समाप्त हो गया |

कई महीने बीत गए |
मोहन इमानदारी से टैक्स भर रहा है |
सुधीर आज भी फर्जी बिल दिखाकर `२००-`३०० बचा रहा है | `५०० वह अपने बालों को संवारने में दान कर रहा है |

सुधार दूसरों में नहीं खुद में लाओ

एक विडियो देखते जाइये `५०० पर ही है, आशा है अगली बार आप खर्च करने से पहले सोचेंगे:
यह विडियो अंतरजाल से ली गयी है.. यह मेरी खुद की नहीं है.. बनाने वाले को धन्यवाद...



शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

A Young India, A Rising India

इस पोस्ट को केवल वही लोग पढ़ें जो उम्र से नहीं पर दिल से जवान है - एक जवान भारत को बुजुर्गियत का चोगा अब उतारना होगा !!! जवानी सर पर है और इसमें केवल जवान दिल और मन का ही प्रवेश है !!! बाकी सबको प्रवेश वर्जित है !!!

क्या सब सो रहे हैं ? क्या देश अभी और भी कुछ देखना चाहता है ? क्या कुछ और भाइयों, बहनों, माँ, पिता... की लाश बिछने के बाद ही हम इस चिर-निद्रा से जागेंगे ? क्या देश के उस शहर में ये सब कुछ देखने के बाद आप जागेंगे जहाँ आप फिलहाल चैन की साँस ले रहे है ?

कुछ इन्हीं सब सवालों की बौछार कुछ लोगों के मन को टटोल रही है | यह मैं लोगों के Gtalk "Status Message" से तो समझ ही सकता हूँ | हर जगह लोग बस यही जानना चाहते हैं कि अब मुंबई में क्या हो रहा है ? कितने मरे, कौन से होटल में आतंकवादी घुसे, कितना बड़ा आदमी शहीद हुआ | सब एक आम-जनता की तरह, हर दिन का पेपर उठाती है, टीवी खोलती है, इन्टरनेट पर पढ़ती है | सब कुछ आज भी आम सा ही लग रहा है | कुछ अलग नहीं करना चाहते लोग ? या फ़िर कुछ कर नहीं पा रहे हैं ? पता नहीं शायद पहला सवाल ज़्यादा सही लग रहा है |

हम अलग करने के नाम पर हम "अपने" अच्छे नम्बर लाने पर आतुर रहते हैं, "अपने" व्यवसाय में कुछ नया करना जानते है, "अपने" दोस्त सभी से हटकर हों - यही कोशिश करते है, "अपना" घर अलग सा हो - सबका यही सपना है | यह अपने से इतना अपनापन सभी को रास आता है | सब अपने लिए जी रहे थे,हैं और शायद जीते भी रहेंगे | सबको अपना नाम, काम और दाम की बहुत चिंता है |
और हो भी क्यों ना ? किसी और ने आपके लिए क्या किया है ? किसी और ने कभी आपके लिए 2/- भी खर्च नहीं किए हैं तो फ़िर आप उनके लिए किस मुंह से ये सब काम करें ? बात में ग़लत कुछ भी नहीं है - जैसे को तैसा |
पर कभी सोचा है, आपके सामने एक छोटा सा बच्चा गिड़गिड़ाता हुआ आपसे दो घूँट पानी मांग रहा है - ज़िन्दगी के और आपने यह सोचकर की कोई भिखारी को पानी क्यों पिलाएं, उसे दुत्कार दिया हो ?
क्या कभी सोचा है, आपके सामने एक लड़की हाथ फैलाए हुए अपने इज्ज़त की भीख मांग रही हो क्योंकि उसके पीछे कुछ निहायती गिरे हुए इंसान...नहीं नहीं इंसान नहीं..हैवान लगे हुए हैं..और आपने यह सोचकर कन्नी काट ली कि मेरी बहन थोड़े ही ना है जो मैं ज़बरदस्ती इस पचड़े में पडूँ |

नहीं साहब/साहिबा यह सब बातें कौन सोचता है ? किसके पास इतना समय है - "U know todays world is competitive...U need to b fast..U need to utilise your time..I am busy..." शायद यही वाक्य आज का सबसे सफल बहाना बन गया है कोई काम ना करने का | अरे बातें तो मैं भी इतनी नहीं सोचता पर जब मुंबई जैसी जगह में बेखौफ हमले हो सकते हैं और वो भी इतने उत्कृष्ट जगहों पर, तो दिल दहल कर यह सब बातें सोचने पर मजबूर हो ही जाता है | शायद कुछ और लोगों का मन भी यह सोच रहा है | शरीर गुस्से और बदले की भावना से भर गया है पर एक मिनट, यह गुस्सा किसके लिए ? बदला किस से लेना है ? साहब/साहिबा आप तो यह तक नहीं जानते की कौन आपके बाजू में रहता है और आप कुछ ऐसे लोगों से बदला लेने चले हैं जिनका अता-पता तो पुलिस भी नहीं लगा पा रही है ?

यह हम इंसानों में बड़ी त्रुटी है...बड़ी ऊँची-ऊँची सोचेंगे, ऊँची-ऊँची फेकेंगे और जब समय आएगा उतना ही बड़ा पिछवाड़ा दिखाकर कहीं छुपकर भागेंगे | साहब सोचना है तो अपने आस-पास के बारे में सोचिये | अगर हर इंसान अपनी छोटी सी दुनिया को जन्नत बनाने की "कोशिश" भर भी करे तो शायद किसी अनजाने से बदला लेने की नौबत ही नहीं आएगी |

पता नहीं इतना बड़ा पोस्ट कौन पढेगा | साहब टाइम किसके पास है ? सब अपनी ज़िन्दगी में मस्त हैं पर अगर थोड़ी सी "कुछ अलग करने" की प्रवृत्ति से कुछ और लोगों की ज़िन्दगी मस्त हो जाए तो कोई हर्ज़ है क्या ?

लोगों के Status Message से तो लग रहा है की अब भारत जाग रहा है :

indians desperately need super-heroes...........


tough tym for both..... me n INDIA

I hope that this is the worst and last....Now its our turn

terror attacks again in mumbai....wat d hell is happening

Now 'Financial capital' at gunpoint

Hotel Oberoi attacked, Colaba petrol pump blown up...Mumbai...how safe?


लोग वाकई में कुछ करना चाहते हैं | अब लोग केवल अहिंसा से कुछ निर्बल लोगों को जवाब नहीं देना चाहते | अहिंसा और ग़दर का सही मिश्रण ही अब आतंकवादियों को मिटा सकता है जो कि आज के युवा वर्ग के लोगों में भरपूर नज़र आता है | किया तो मैंने भी आज तक कुछ नहीं है - यह सब सोचने के अलावा | पर कुछ करना ज़रूर चाहूँगा - अपने सुधार के लिए, इस देश के सुधार के लिए, पूरे विश्व के सुधार के लिए |

"अब आँखें खुली रख कर दिन में ही सपने देखने का समय आ गया है |"


इस जोशीले युवा-वर्ग को साथ मिलकर "लडकियां और लड़कों के बातों" के अलावा इन सब विषयों पर भी साथ मिलकर चर्चा करनी पड़ेगी जो की वाकई में एक उत्साहवर्द्धक कदम होगा |
अब धीरे-धीरे भारत जागेगा | जब हम कुछ थोड़े बहुत पढ़े-लिखे लोग जागेंगे तभी हम बाकी लोगों को जगा सकेंगे | ज़रूरत पहले इस जवान भारत को जागने की है - "It is the most ripe time to buid up A Young India, A Rising India"

शायद यह पोस्ट एक परिचर्चा में बदल जाए जहाँ सभी young लोग अपने-अपने विचार रखेंगे - एक सपने को सच में बदलने के लिए | ज़रूरी है जोश को बरकरार रखने का, सक्रीय और कार्यशील रहने का |

आपसे आग्रह है कि "A Young India, A Rising India" के लिए अपने विचार सभी के साथ इस पोस्ट के ज़रिये बाँटें | एक सफल परिचर्चा ही अब इस भारत को महाशक्ति बना पाने में सफल हो सकता है |
अपने दोस्तों से कहें कि वो भी अपने ideas हम सभी के साथ share करें |

भारत जाग रहा है - इस जागते भारत के चाँद, सूरज, सितारे बनें और इस विश्व को रोशन करें |
"India is Rising and the Rise is Young" - "AYoung India, A Rising India"
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पढने लायक - हम अभी कहाँ हैं ?