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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

६ साल: ब्लॉग, लेखन, तजुर्बा

१५ अप्रैल २००८ की एक रात को एक कमरे में बैठा था। सोच रहा था कि आज इस काम को अंजाम दे ही दिया जाए। रात भर खोज करता रहा और इस नवीन तकनीक का इस्तेमाल करने को आरूढ़ हो गया। कुछ भी घिसा-पिटा लिखा और अपनी ऊंघती हुई फोटो भी डाल दी और सुबह करीब-करीब ६ बजे १६ अप्रैल २००८ को बिट्स पिलानी के कमरा क्रमांक २९० से ज़िन्दगी का पहला पोस्ट हो गया!

मुझे नहीं पता था कि एक छोटा सा पोस्ट मुझे हिन्दी ब्लॉगिंग में अपनी बात रखने और पहचान बनाने में सक्षम कर देगा। पर देख लीजिये, आज उस बात को ६ साल बीत गए हैं और यह अनवरत आज भी चल रहा है।

इन ६ सालों में ब्लॉगिंग से जुड़ी कई बातों को देखा, समझा, सीखा और सुना है। चंद बातें बताना चाहूँगा:
  1. ब्लॉगिंग का मकान बनाना बेहद आसान है। ब्लॉग को घर बनाना बेहद मुश्किल है।
  2. लगन, निष्ठा और जुझारूपन, ब्लॉगिंग के घर में इन सबकी निःसंदेह ज़रूरत है।
  3. प्रयोग करते रहें। अगर आप मेरी तरह ही नौसीखिए हैं तो प्रयोग करिए। तरह-तरह के लेख लिखिए और देखिये उसका आनंद!
  4. खूब पढ़ें। खूब सुनें। खूब सोचें। कम लिखें।
  5. टिप्पणियों के लिए ब्लॉग न करें। मोह माया है जी :)
  6. दूसरों के ब्लॉग्स पर अपने विचार छोड़ें। खुद लिखें और दूसरों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करें। तभी भाषा की उम्र बढ़ेगी।
  7. ब्लॉग आपकी निजी जगह है। न ही किसी को इसमें व्यर्थ की सेंध लगाने दें और ना ही किसी और के निजी ब्लॉग पर ऐसा करें। व्यर्थ की राजनीति कम-स-कम यहाँ से दूर रखें।
  8. जब मन करे तब लिखें पर निरंतर लिखें। (मैंने हर मास कम-स-कम एक पोस्ट डालने का नियम बना रखा है)
अब मैं ब्लॉग-पोस्ट सिर्फ स्वयं के लिए लिखता हूँ। वैसे विशेष लेखन तो सभी के लिए करता हूँ। मुझे काफी देर से याद आया कि १६ अप्रैल को ब्लॉग का ६ठाँ वर्षगाँठ निकल गया। पर देर आये दुरुस्त आये। और यह भी अभी-अभी देखा कि यह ब्लॉग का १००वां पोस्ट है! :)

 

अंत में ज़िन्दगी और ब्लॉगिंग की स्थिरता पर २ पंक्तियाँ कहना चाहूँगा:
"मेरे सन्नाटे को यूँ कमज़ोर न समझना ऐ दोस्त,
किसी दिन सन्नाटे का बवंडर इस भ्रम को तहस-नहस कर देगा"

जाते जाते गुड़गाँव में गाया हुआ "एक चतुर नार" भी देख लीजिये!

रविवार, 30 मार्च 2014

हो रहा महिला सशक्तिकरण!

अनिता और पूनम पहली बार कॉलेज में ही मिली थी और समय के साथ बहुत ही गहरी दोस्त बन गयी थीं। चूँकि उनकी संकाय भी एक ही थी तो क्लास जाना, परीक्षा के लिए पढ़ना, असाइनमेंट पूरा करना, इत्यादि इत्यादि सब साथ में होता था।

जब इतनी देर साथ रहते थे तो कई सारी चर्चाएं भी दोनों के बीच होती जो कि लड़कों, रिश्तों, प्रोफेसर्स, घर, देश, इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमता था। महिला दिवस के आसपास मार्किट में महिला सशक्तिकरण को लेकर बेहद गरम लू चली। अख़बार, टीवी, ब्लॉग, फेसबुक, हर जगह कोई न कोई अपने मन की भड़ास उढ़ेल रहा था।

चित्र: साभार गूगल बाबा
एक बार कॉलेज की छुट्टी होने के बाद दोनों घर को निकली तो रास्ते में अनिता ने कहा, "महिला सशक्तिकरण के नाम पर जो आरक्षण का ढकोसला सरकार ने किया है, वह हमें सशक्त नहीं बनाएगा।"
इसपर पूनम ने भी हामी भरते हुए कहा, "सही कह रही हो। हम लड़कियों को पुरुषों की तरफ से विशेष व्यवहार या सुविधाओं की ज़रूरत नहीं है। हम खुद में सक्षम हैं और यह हम हर क्षेत्र में करके भी दिखा रही हैं।"

दोनों में इसी तरह सरकार की नीतियों और महिलाओं को ख़ास सुविधाएं दे कर महिलाओं को और कमज़ोर करने की बात पर रास्ते भर वार्तालाप हुई और वो ऐसी व्यवस्था को कोसती रहीं।

फिर दोनों घर जाने के लिए मेट्रो में चढ़ीं और तुरंत ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे दो नौजवानों को उठने को कहा और खुद वहाँ बैठकर महिला सशक्तिकरण पर विचार को आगे बढ़ाने लगीं।


जब तक ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाएं इस सशक्तिकरण का सही अर्थ ढूंढती हैं, तब तक मेरी आवाज़ में एक गीत (राबता) सुनते चलिए यहाँ पर!