नया क्या?

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

भौतिकवाद की दोस्ती

बात ज्यादा पुरानी नहीं है, या यूँ कहें की ज़हन में तरोताज़ा है।

कॉलेज का प्रथम वर्ष समाप्ति पर था। कई नए दोस्त बने थे, उनमें से धीरज भी एक था।
प्रथम सेमेस्टर की समाप्ति पर मैं घर से कीबोर्ड (पियानो) खरीद लाया था क्योंकि हारमोनियम के बाद अब यह सीखने की बड़ी इच्छा थी।

एक दफे मैं और धीरज क्लास से लौट रहे थे और तभी मैंने उसकी संगीत रूचि को देखते हुए बताया कि मैं घर से पियानो ले कर आया हूँ। वह बहुत खुश हुआ और उसके बारे में पूछने लगा। मैंने भी ख़ुशी-ख़ुशी उसे जानकारी दी कि कौन सी कंपनी का है और कौन सा मॉडल है, वगैरह-वगैरह।

मेरे रूम के पास पहुँचते हुए एक दूसरे को कल तक के लिए अलविदा कह रहे थे कि उसने कहा - "मुझे पता नहीं था कि तुम्हारे पास पियानो है, नहीं तो हम और भी बेहतर दोस्त हो सकते थे।" और इतना कह कर वह आगे हो लिया।

कुछ देर तक मैं स्तब्ध सा खड़ा रहा और सोचता रहा कि आजकल दोस्ती भौतिकता की गुलाम हो गयी है? किसी के पास किसी वस्तु का होना, न होना दोस्ती की डोर को मज़बूत या कमज़ोर करता है? ये हम किस दिशा की ओर जा रहे हैं?

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वह वाक्या याद आ जाता है क्योंकि हर जगह आजकल भौतिकवाद ही दोस्ती का मापदंड हो चुका है। "भौतिकवाद की दोस्ती" इंसानों को दीमक की तरह खोखला करने में कामयाब नज़र आ रही है। कडुवा, पर सच।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

अपने

सोचा करता था वह "अपने" लोगों के बारे में
वही जिनको वो कई रिश्तों से पहचानता था
माँ, पिता, भाई, बहन, चाचा, दोस्त, जिगरी दोस्त, चड्डी दोस्त..

"अपने"
यह शब्द भेदती थी उसे कभी..
क्या यह शब्द दुनिया का छलावा नहीं है?
इस शब्द ने कईयों की दुनिया नहीं उजाड़ी है?
पर
फ़िर
क्या इन्हीं "अपनों" ने उसकी ये ज़िंदगी हसीन नहीं बनाई है?
क्या वही ये "अपने" नहीं हैं
जो उसके सुख-दुःख में,
उसके गिरते क़दमों
और
कन्धों को सहारा देते रहे हैं?

पर आज उसे "भय" लग रहा है
आज उसके दिल से खून का कतरा सूखा जा रहा है
आँखों का पानी शरीर में ही कहीं सूख रहा है

क्यों..
आज न जाने क्या ख्याल आया
क्या ये "अपने" उसका साथ निभाएँगे?
तब
जब
पंचतत्व
उसके खून के हर कतरे को,
शरीर की हर बूँद को,
रूह के हर कण को,
अंगों की हर सांस को,
अपनी ओज में सुखाएगा
आखिरी आवाज़ लगाएगा?

उस दिन शायद उसे "अपने" छलावा लगेंगे
वो उसका साथ वहीँ छोड़ देंगे
क्या यह ज़िंदगी का छलावा नहीं है?
जो की फिल्म की चरमावस्था (क्लाईमैक्स) को
दुखांत (ऐन्टी-क्लाईमैक्स) कर देगा?
जिनके लिए पूरी ज़िंदगी जी है
बस वही नहीं मिलेंगे..

"अपनों" को "अपना" कहना
क्या उस दिन इस शब्द के खिलाफ नहीं हो जाएगा?
यह सोच कर वह आज घबरा रहा है
पर
फ़िर
जब तक सच्चाई का पता नहीं चलेगा
तब तक इस छलावे को जीना पड़ेगा
यह छलावा जिसे हम "अपने" कहते हैं
आज यही सच्चाई है..
आज यही ज़िंदगी है..