नया क्या?

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

५०० रूपए


सुधीर और मोहन बहुत ही करीबी दोस्त थे... सर्वसम्पन्न तो दोनों के परिवार थे पर एक जगह जा कर दोनों की राहें अलग हो जाती थीं | दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे और जैसा कि एक आम युवा-दिल होता है.. दोनों में काफी बहस छिड़ी रहती थी.. बालाओं को लेकर, परिवार को लेकर, देश को लेकर, नेताओं को लेकर..

एक दिन दोनों देश में भ्रष्टाचार के ऊपर विचार कर रहे थे |
सुधीर ने कहा – इन नेताओं को तो एक ही पंक्ति में खड़े करके गोली मार देनी चाहिए | न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी | भ्रष्टाचार समाप्त !!
मोहन ने कहा – नेताओं को छोड़, पहले खुद को सुधार | टैक्स बचाने के चक्कर में जो तू फर्जी बिल दिखाता है, वो तो मत दिखा | वैसे भी तुझे पैसे की कमी नहीं है फिर `२००-`३०० बचाकर क्या हासिल करना चाहता है? भ्रष्टाचार तेरे अंदर से शुरू हो रही है |
सुधीर ने कहा – अरे वो मैं... छोड़ ना... `२००-`३०० से क्या फर्क पड़ता है? वैसे तूने कह ही दिया है तो अब से मैं हर महीने `५०० दान दूंगा.. खुश?
वृत्तांत वहीँ समाप्त हो गया |

कई महीने बीत गए |
मोहन इमानदारी से टैक्स भर रहा है |
सुधीर आज भी फर्जी बिल दिखाकर `२००-`३०० बचा रहा है | `५०० वह अपने बालों को संवारने में दान कर रहा है |

सुधार दूसरों में नहीं खुद में लाओ

एक विडियो देखते जाइये `५०० पर ही है, आशा है अगली बार आप खर्च करने से पहले सोचेंगे:
यह विडियो अंतरजाल से ली गयी है.. यह मेरी खुद की नहीं है.. बनाने वाले को धन्यवाद...



सोमवार, 13 सितंबर 2010

दर्द-निवारक

छोटा सौरव जब चलना सीख रहा था तो कभी-कभी गिर पड़ता, माँ झट उसे गोद में लेकर उसके दर्द को गायब कर देती...

बचपन में जब चोट लगती थी तो सौरव भागा-भागा अपने माँ-बाप के पास आता था.. वो झट से उसका दर्द दूर कर देते...

कम नंबर आने पर जब सौरव उदास हो जाता तो उसके पिता उसे अच्छे से बैठ कर समझाते और उसका दुःख-दर्द झट ख़त्म हो जाता...

कॉलेज में जब किसी प्रोग्राम में सौरव हताश हो जाता तो उसके माँ-पिताजी उसका मनोबल बढ़ाते, उसकी हौसला-अफजाई करते और उसके दर्द को कम कर देते थे...

नौकरी शुरू की तो संसार की छोटी-मोटी सभी परेशानियां अपने माँ-पिताजी के समक्ष रखता और वो झट उसके दर्द को समझते और सही सलाह दे कर उसे दूर कर देते...

शादी होने के बाद जिम्मेवारी बढ़ गयी तो सौरव और परेशान रहने लगा... पिताजी कभी-कभी उसे बुलाते और उसे हर जिम्मेवारी को सही से निभाने की सलाह देकर उसका बोझ हल्का कर देते... उसका दर्द कम करते...

फिर एक दिन सौरव ने पत्नी की सुन ली और माँ-पिताजी को वृद्धाश्रम छोड़ आया.. वह खुद को आज़ाद महसूस करने लगा और खुश था...
पर एक दिन किस्मत ने पल्टी मारी... एक हादसे में उसने अपने बीवी-बच्चों को खो दिया.. 

उसपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा...

वह भागा-भागा वृद्धाश्रम गया और अपने माँ-बाप को ले आया...

माँ-पिताजी ने निःसंकोच उसके दर्द को अपने में समा लिया और उसके दुःख को हल्का और कम कर दिया...

ज़िन्दगी यूँ ही चल रही है और सौरव को आज भी माँ-बाप सिर्फ और सिर्फ दर्द-निवारक ही लगते हैं...