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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

उम्मीदें

काश ये ऐसा हो जाता, काश वो ऐसा हो जाये। पर ये, वो क्यों नहीं? पर वो, ये क्यों नहीं?

सबके मन में एक तूफ़ान फड़कता रहता है कि जो वो चाहे वैसा हो। "उम्मीद" एक इतना सशक्त और दृढ़ शब्द है जिसके दम पर ये दुनिया टिकी हुई है। उठते ही दिन के अच्छे होने की उम्मीद के साथ और रात को अच्छी नींद की उम्मीद के साथ, हमारा समस्त जीवन इसी के इर्द-गिर्द घूमता रहता है।

बचपन से माँ-बाप की निगाहें बच्चों पर टिक जाती हैं कि मेरा बच्चा बड़ा हो कर नाम रोशन करेगा, मेरी बच्ची अपने काम में बाकी सब से आगे निकलेगी। क्लास में थोड़ा अच्छा करो तो शिक्षक की उम्मीदें बढ़ जाती हैं और फ़िर पूरा समाज आप पर नजरें गड़ाए देखता रहता है कि ये इंसान ज़रूर उसका नाम रोशन करेगा।

उम्मीद! उम्मीद! उम्मीद!
कभी कभी तो इंसान इसी उम्मीद से इतना घबरा और टूट सा जाता है कि वह खुद ये उम्मीद करने लगता है कि इन उम्मीदों से उसका पीछा छूट जाये, पर ऐसा हो नहीं पाता है। वह इसी ख्वाहिशों के अथाह समंदर में तड़पता हुआ सा हाथ-पैर मारता रहता है पर किनारा कभी नहीं मिल पाता। वह तो उसकी आखिरी सांस पर ही उसे किनारा दिखता है।

वैसे तो यह उम्मीद है बेहतरीन चीज़। इसके बिना दुनिया का कोई काम नहीं हो सकता। अगर मैं इस उम्मीद के साथ डॉक्टर के पास न जाऊं कि वो मुझे ठीक कर देगा, तो मैं कभी ठीक नहीं हो पाऊंगा। अगर मैं कारोबार में मुनाफे की उम्मीद कभी न करूँ तो उसका ठप्प होना तय है। अगर आज रात मैं कल सुबह उठने की उम्मीद के साथ न सोऊं तो मेरी मृत्यु निश्चित!

उम्मीद, विश्वास, ख्वाहिश! यह सब दुनिया के ऐसे सच हैं जो तालमेल में रहे तो जीवन को आनंदमय बनाते हैं पर वही अगर सीमाओं को तोड़ कर निकलने की कोशिश करें तो जिन्दगी में बाढ़ का ऐसा जलजला पैदा कर सकते हैं जो खुद कि ही नहीं वरन् आस पास की जिंदगियां भी बर्बाद करने की काबिलियत रखता है।

पर बढ़ती उम्मीदों का सही समय पर टूट जाने से इंसान को भावी जिन्दगी में बहुत सुकून रहता है। ऐसे लोगों को धन्यवाद देना चाहिए जो आपको ये एहसास दिलाते हैं कि आप कुछ ज्यादा ही उम्मीद कर रहे थे जो कि गलत था। पर इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि आप ऐसे व्यक्तियों को अपने आस पास न फटकने दें जो आपकी छोटी छोटी ख्वाहिशों को समझने में भी नाकाम हैं। ऐसे लोगों से दुनिया टूट जाएगी। अगर दम है तो सामने बोल दें, नहीं तो हमेशा की छुट्टी। पर अगर किनारा न लिया तो आपके उम्मीदों का बाँध फ़िर से भरेगा और एक कणिय उम्मीद से टूट कर आपको बहा ले जाएगा।

उम्मीद तो हम सबको है कि हम अच्छा खाएं, अच्छा पियें, अच्छे मकान में रहे, बढ़िया गाड़ी में घूमें, अच्छी सरकार चुनें, अच्छे लोगों के समक्ष रहें और न जाने क्या क्या। पर अगर यह सबख्वाहिशें पूरी हो गयीं तो उम्मीद का खात्मा हो जाएगा और अगर उम्मीद चीर-निद्रा में सो गयी, तो हर रूह से आत्मा का पलायन निश्चित है।

आज के भौतिकवाद जहां में उम्मीदों का मेला लगा रहता है। प्रचारक कंपनियां लोगों की उम्मीदें बुन रही हैं। लोगों की सोच धूमिल हो चुकी है या फ़िर बिलकुल नदारद। ये उम्मीदों का गुबार इतना महीन है कि एक तिनके की चोट से आपके जीवन की लीला समाप्त कर सकता है। अगर यह भौतिकवाद आपको लील गया तो आपकी आने वाली पीढ़ी शायद आ ही न पाए या फ़िर आए तो आपको जन्मांतर तक कोसे। अपनी उम्मीदों का घड़ा हमेशा कुछ खाली रखें। अगर वह उबल उबल कर गिर रहा है सँभलने का ज्यादा वक्त नहीं है।

ख्वाहिशें होना बुरी बात नहीं है, उसमें सामंजस्य होना ज़रूरी है। पश्चिम को देखकर युवा बहक रहे हैं और युवा तो क्या, एक दशक पुरानी पीढ़ी भी इसके लपेटे में है। आज जाग गए तो भाग जाग उठेंगे नहीं तो रूहें काँप उठेंगे। उम्मीद की उम्मीद भी सीमाओं के भीतर रख कर हम एक बेहतर जीवन की कामना कर सकते हैं।

इसी उम्मीद के साथ कि आगे से थोड़ा और नियमित और बेहतर लिखूंगा आपको आपकी उम्मीदों के पूरी होने की कामना के साथ छोड़े जा रहा हूँ।

*उम्मीद है कि आपके कमेंट्स जोरो-शोरों से आएँगे :)

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

अंतरजाल का जाल

अंतरजाल, आज थोड़े से भी पढ़े लिखे लोगों के लिए उनके जीवन का अभिन्न अंग हो गया है और पढ़े-लिखे ही क्यों, अशिक्षित लोगों के लिए भी यह कोई माया से कम नहीं है जो अपने जादू से उनको मोह लेती है।

कम्प्युटर का प्रचलन भारत में एक विस्तृत पैमाने पर करीब ८-१० साल पहले ही आया था और आज हर इंसान को अपनी गिरफ्त में रखने की क्षमता रख रहा है। जहाँ अंतरजाल के आने से लोगों तक खबर पहुँचने की गति, हर प्रश्न के उत्तर, कणों-कण सवालों के सरलतम जवाब, लोगों की उँगलियों के मोहताज हो गए हैं, वहीँ अंतरजाल ने धोखाधड़ी, उत्पात, व्यभिचार और न जाने कितने असामाजिक तत्वों को भी बढ़ावा दिया है। पर मैं यही समझता हूँ कि अंतरजाल भी एक सिक्का है जिसमें चित और पट दोनों हैं। अच्छा-बुरा, सही-गलत, यह सब हर व्यक्ति पर आ कर रुक जाता है और वही हो जाता है इनमें से किसी एक का स्वामी। वह यह तय करता है कि अंतरजाल से वह अच्छी बातें बटोरना चाहता है या बुरी बातों की गठरी।

पर जिस आसानी और तेज़ी से जानकारी फ़ैल रहा है, सबके लिए बहुत मुश्किल हो गया है खुद को, या फिर अपने परिवार के लोगों को इसकी पकड़ से बचा पाना। आज हर युवा के हाथ में स्मार्ट फ़ोन है, वह चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहना चाहता है, फिर चाहे वो फेसबुक हो, ट्विटर हो, जीटॉक हो, वाट्सऐप हो या अन्य सूचना से रिश्ता रखने वाले ऐप्स।

पहले सो कर उठते थे, हथेलियों को धुंधली आँखों से देखते हुए धरती माँ को धन्यवाद देते थे हमारा भार संभालने के लिए। आज सुबह उठते हैं तो सोते हुए हथेलियों में रह गए फ़ोन को फटी-खुली आँखों से देख कर खुश होते हैं और धन्यवाद देते हैं नेटवर्क का जिसने सही सलामत सारे मैसेजों का आदान-प्रदान किया है। उठने से ले कर नहाने तक बीसियों बार फ़ोन देख लेते हैं कि दुनिया में क्या चल रहा है। किसने क्या पहना, क्या खाया, कहाँ जा रहे हैं, कब पहुंचेंगे, वगैरह, वगैरह। और यह गतिविधि दिन भर चलती है जैसे हमारी सांस चलती है। बेधड़क, बिना रुके (हाँ अगर बैटरी समाप्त हो जाए तो बात अलग है!)

कहने का अर्थ ये है कि अंतरजाल (और फ़ोन) ने हमें ग्रास लिया है और इससे बचने का कोई भी उपाय नहीं है। पर अगर हम इनके गुलाम होने की बजाय, ये अपने ईजाद-कर्ता के गुलाम रहे तो कैसा रहेगा? यह भी सत्य है कि जानकारी के अधिसेवन के कारण हमारी जिंदगियों की कई परेशानियां विशालकाय रूप ले रही हैं जिससे धीरे धीरे लोग परेशान हो रहे हैं (और कई अपनी ज़िन्दगी समाप्त भी कर रहे हैं!)

कुछ हफ्ते पहले मैंने रविवार को अंतरजाल बिलकुल बंद कर दिया (फ़ोन और लैपटॉप, दोनों पर)। सिर्फ एक दिन के लिए। जिस तरह विवाहित लोग अपनी बीवियों को मायके छोड़ आते हैं कुछ दिन के लिए, ठीक उसी तरह। उसे लौट कर तो वापस आना है पर कुछ दिन के लिए ही सही, छुटकारा तो मिला!

दिन भर सुकून रहा। न मेल देखना, न ट्वीट करना, न स्टेटस डालना, न किसी समाचार के सबसे पहले पढ़ने की जद्दोजहद। मन में बड़ी शान्ति थी। आराम से उठा, तन्मयता के साथ खाना खाया और इत्मिनान से अखबार पढ़ा। बाईक पर निकला तो अपनी रफ़्तार से। भागते-दौड़ते लोगों को देख कर हंसी आ रही थी क्योंकि उनको पता ही नहीं था कि भाग क्यों रहे हैं, किसलिए रहे हैं। ट्रैफिक सिग्नल हरी होते ही उत्प्रेरक (एक्सेलरेटर) तेज़ी से घुमाने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई। अपने आसपास के वातावरण का पूरा आनंद उठाते हुए अच्छा लग रहा था। कई सदियों बाद चिड़िया के चहचहाने की आवाज़ कानों तक पहुंची। ज़िन्दगी बह रही थी और मैं बह रहा था उसके साथ। ऐसा लगा जैसे पहले मैं उलटी धारा में बह रहा था ज़िन्दगी के, आज सुल्टा हुआ हूँ।

उस दिन एहसास हुआ कि "ज़िन्दगी जीने" और "ज़िन्दगी काटने" में बहुत अंतर है और ९९ फीसदी लोग दूसरे तबके के हैं। एक दिन की अंतर्जालीय मुक्ति ने दिल हल्का कर दिया था। पढने, हंसने, परखने, गाने और जीने की आज़ादी, भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी नहीं दे सकती है। अब लगता है कि हर इतवार अंतरजाल से ज्यादा से ज्यादा दूर रहूँगा और ज़िन्दगी जियूँगा।

ज़रूरत है इस एहसास को आज के तड़पती आत्माओं तक पहुँचने की। १० मिनट रुक कर पहले यह तो तय कर लो कि भाग कहाँ रहे हो? निशाना क्या है? अंतरजाल ज्ञान का माध्यम ज़रूर है पर अगर उसका गलत या अत्याधिक सेवन हर एक के जीवन को तबाह करने में सक्षम है। यह सिक्का आपके हाथ में हैं और तय करना है कि आप चित चाहते हैं या पट। यही आपके जीवन को सफल और शांतिपूर्ण बनाएगी। अंतरजाल आपका गुलाम होना चाहिए ना कि आप उसके।