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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

मसाला चाय | Terms & Conditions Apply | किताब समीक्षा

"दिव्य प्रकाश दुबे", एक ऐसा नाम है जो नए प्रभावशाली युवा हिन्दी लेखकों में अपना नाम शुमार करवा चुके हैं। इनकी दो किताबें, "मसाला चाय" और "Terms & Conditions Apply" अब तक छप चुकी है और हिन्द युग्म ने इन पुस्तकों को प्रकाशित किया है। आज दोनों किताबों के बारे में साथ ही बात करेंगे।
मैं किसी भी किताब के बारे में एक ऐसी सोच पेश करने की कोशिश करता हूँ जो कि एक सामान्य पाठक सोचता हो। यह नहीं कह सकता कि कितना सफल होता हूँ पर सोच की दिशा उसी तरफ रहती है। मैं, ना ही कोई समीक्षक हूँ और ना ही बड़ा लेखक, इसलिए इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी विचार मेरे निजी हैं और इन्हें अन्यथा किसी तरह न लें :)

"मसाला चाय" और "Terms & Conditions Apply" दोनों करीब करीब एक सी किताबें हैं जिसमें हिंगलिश का पुरज़ोर प्रयोग हुआ है। हिन्दी लेखन में वैसे तो मैं 'हिंगलिश' का हिमायती नहीं हूँ क्योंकि मैं इसे भाषा में भ्रष्टाचार मानता हूँ पर लेखक ने शायद इस ख्याल से यह किताबें लिखी हैं कि आज कि जो युवा बोलचाल भाषा है, जो कि ना ही शुद्ध हिन्दी है और ना ही शुद्ध अंग्रेजी है, को लेखन में इस्तेमाल किया जाए जिससे युवा पाठक अपने आप को इन किताबों के साथ जोड़कर देख सके। शायद यह प्रयोग सफल भी रहा है और, और भी कई किताबें इन्हीं पदचिन्हों पर चलते हुए आज पाठक-बाज़ार में प्रवेश कर चुकी हैं। तो पाठक अभिविन्यस्त (oriented) दृष्टि से देखें तो यह एक बढ़िया प्रयोग है पर भाषा की शुद्धता और उच्चता पर विचार करें तो उसमें संशय हो आता है।

दोनों ही किताबों ने कई छोटी-बड़ी कहानियों का एक पुलिंदा पेश किया है और सभी बेहद रोचक और आपको अपने अन्दर समेटने वाली हैं। क्योंकि यह युवाओं को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी कहानियाँ हैं, इसलिए ये इस तबके को तुरंत पसंद आएगी। इन कहानियों के पात्र हमारे ही इर्द गिर्द छोटे-बड़े शहरों में बसते हैं। शायद कोई कहानी आपकी अपनी भी हो, शायद आपके किसी दोस्त कि या फिर अखबार में पढ़े किसी खबर की, पर हैं ये हमारी ही। कई कहानियाँ जो छोटे शहरों की हैं आपको आपके अतीत में ले जाएँगी और वो अल्हड़ दिन याद दिला देंगी। छोटे शहरों में चुप्पी में जीती ये कहानियों को आवाज़ दी है इन किताबों ने तो बड़े शहर के युवाओं की आम ज़िन्दगी को भी बहुत ही सरल शब्दों और विचारों में पेश किया है दिव्य प्रकाश दुबे जी ने।

इस बात पर भी ज़ोर देना चाहूँगा कि ये दोनों किताबें ऐसी हैं जिनको चाहे आप बार बार पढ़ें पर हमेशा नई सी लगेगी वैसे ही जैसे जब भी आप अपने ख़ास दोस्तों से मिलते हैं तो नए नए से लगते हैं। ये कथाएँ आपकी दोस्त हैं क्योंकि ये आप ही के बीच की हैं, आपकी हैं।

संपूर्णतः कहूँ, तो मुझे ये दोनों किताबें बेहद आकर्षक लगी क्योंकि हल्का-फुल्का पढ़ने का भी अपना ही मज़ा है वरना प्रेमचंद, निराला, इत्यादि तो हम बचपन से ही पढ़ते आये हैं :)

सोमवार, 29 सितंबर 2014

सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगल
राहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई है पर कार्य प्रगति पर है.

हमारी ही तरह राहुल भी सोशल मीडिया का भोगी है, आसक्त है. जो करता है, वहाँ बकता है. लोगों को लगता है कितना बोलता है, हर बात यहाँ खोलता है. कभी फेसबुक तो कभी ट्विटर तो कभी व्हाट्सऐप. हर जगह उसकी मौजूदगी है. करोड़ों-अरबों लोगों की तरह ही वो भी दिन भर बकर बकर करता रहता है.

ऐसा लगता है जैसे सुनने वाले तो बचे ही नहीं, सब बोलने वाले और इज़हार करने वाले ही इस दुनिया में रह गए हैं. अगर बोलना कला है तो सुनना उससे भी बड़ी कला है पर आज की अगड़म-बगड़म ज़िन्दगी में लोगों को विश्वास ही नहीं होता है कि सुनना भी एक कला है क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ बकना ही सीखा है.

इस आसक्ति का शिकार हुए राहुल को यह पता ही नहीं चला कि जो वो सोशल मीडिया और फ़ोन पर तरह तरह के ऐप्स से दुनिया से जुड़ा हुआ है, दरअसल वह इस सिलसिले में खुद से ही कट चुका है. नौकरी करने, घर चलाने और सोशल मीडिया के भ्रमित दिखावे की बराबरी करने के चक्कर में कब वह अन्दर से टूट गया यह उसे एक दिन पता चला जब वह अपने कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठा था. अचानक उसे अपने भविष्य की चिंता होने लगी कि वो करना क्या चाहता है, कर क्या रहा है और भी न जाने कैसे-कैसे उटपटांग सवाल.

ऐसा पहली बार हुआ था जब वो खुद का विश्लेषण कर रहा था और करते करते बेहद डर गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे बात करे, क्योंकि यहाँ सुनने वाला तो कोई है ही नहीं, सिर्फ बोलने वाले लोग ही बचे हैं. वह अपने फेसबुक की लिस्ट खंगालता है, ट्विटर पर अनजान दोस्तों के फेहरिस्त जांचता है और फ़ोन पे अनगिनत नंबरों को टटोलता है पर एक ऐसा इंसान नहीं ढूंढ पाता जो सिर्फ और सिर्फ उसे सुने, कुछ कहे नहीं, अपनी सलाह न थोपे. उसका मन उदास हो जाता है और वह सब कुछ बंद करके सोने की नाकाम कोशिश करता है.

ऐसा कई दिन चलता है. कई चीज़ें आप अपने घरवालों से नहीं अपितु अपने दोस्तों के साथ साझा करते हैं पर राहुल तो इस वैकल्पिक जद्दोजहद में एक दोस्त भी न बना पाया था. सब पानी के बुलबुले की तरह इधर उधर उड़ते दिखे और अंततः मानसिक तनाव, नौकरी के दबाव और ज़िन्दगी से बिखराव ने राहुल के दिमाग को चरमरा दिया और उसे उदासी (डिप्रेशन) के गड्ढे में गिरा दिया.

एक हँसता, बोलता, खिलखिलाता नौजवान भरी जवानी में उदासी का शिकार हुआ क्योंकि उसको सलाह देने वाले तो बहुत थे पर सुनने वाला एक भी नहीं.